माँ

रोज की तरह
छत की मुंडेर पर
धोती फैलाकर
किसी कोने में खुद को निचोड़ती
बच्चों की चिंता में
दिनभर
सूखती रहती है माँ।


हवा के झोंके से गिरकर
घर की बाहरी दीवार पर गड़े

खूँटे से अटकी धोती सी लहराती
बच्चों के प्यार में
दिनभर
झूलती रहती है माँ।


शाम ढले
आसमान से उतरकर धोती में लिपटते
अंधेरों को झाड़ती
तारों की पोटली बनाकर
सीढ़ियाँ उतरती
देर तक
हाँफती रहती है माँ।

चुनती है जितना
उतना ही रोती
गमों के सागर में
यादों के मोती
जाने क्या बोलती
न जागी न सोती
रातभर
भींगती रहती है माँ।
——————–देवेन्द्र कुमार पाण्डेय।

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9 thoughts on “माँ

  1. देवेन्द्र जी … दिल को छु गयी आपकी कविता ………. माँ के बारे में जितना भी लिखा जाए कम है …….. आपने भी बहुत कोमल लम्हों को pakda है is rachna में ………..

  2. बहुत ही सुंदर, शानदार और भावपूर्ण रचना लिखा है आपने ! माँ हमारे जीवन में एक महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं और उनके बारे में जितना भी कहा जाए कम है ! बहुत बढ़िया लिखा है आपने ! इस बेहतरीन रचना के लिए बधाई !!

  3. जाने क्या बोलतीन जागी न सोतीरातभरभींगती रहती है माँ।बहुत सुन्दर ! माँ जोडती है टूट-टूटकर

  4. देवेन्द्र जी जिस सादगी और सरलता से आपने माँ की कोमल भावनाओं और एक अटूट प्रेम का दर्शाया है क़ाबिले तारीफ़ है मैं ज़्यादा क्या कहूँ आप जैसे शब्दों और भावनाओं के महान जादूगर के बारे में आपकी लेखनी इस बात का एक सक्षम प्रमाण है बेहद संजीदा भाव..और एक खुबुसरत कविता..माँ से बढ़ कर दुनिया में कोई हो नही सकता….बहुत अच्छा लगा …बहुत बहुत धन्यवाद

  5. शाम ढलेआसमान से उतरकर धोती में लिपटतेअंधेरों को झाड़तीतारों की पोटली बनाकरसीढ़ियाँ उतरतीदेर तकहाँफती रहती है माँ।लाजवाब….!!देवेन्द्र जी बहुत खूब…..!!आपने जिस तरह माँ की भावनाओं को अभिव्यक्ति को शब्दों में बांधा है कमाल है ….नमन आपको ….!!

  6. देवेंद्र जी आपकी यह बेमिसाल कविता फ़्रेम करवा कर स्टडी रूम मे स्थापित कराने लायक है..माँ के बारे मे जो कुछ लिखा है आपने उससे बेहतर कुछ नही कहा जा सकता…..जितनी खूबसूरत है आपकी कलम उतने ही खूबसूरत आपके विचार हैं..आभार.

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