चिड़िया

आज रविवार है। कविता पोस्ट करने का दिन। पिछली कविता नारी क्रंदन को जो स्नेह मिला इसके लिए मैं सभी का आभारी हूँ। आज जो कविता पोस्ट करने जा रहा हूँ वह इसके पूर्व हिन्द युग्म में प्रकाशित हो चुकी है । इसकी आलोचना भी हुई है लेकित मुझे इतनी प्रिय है कि इसे मैं अपने ब्लाग पर प्रकाशित करने का मोह नहीं छोड़ पा रहा हूँ। मुझे लगा कि बेचैन आत्मा के जन्म के बाद मुझे पाठकों का एक नया समूह मिला है जिन्हें यह कविता अवश्य पढ़ाई जानी जानी चाहिए। प्रस्तुत है कविता जिसका शीर्षक है-चिड़िया।
………………………………………………………………………………………………………………………………

चिड़ि़या उडी
उसके पीछे दूसरी चिड़िया उड़ी
उसके पीछे तीसरी चिड़िया उड़ी
उसके पीछे चौथी चिड़िया उड़ी
और देखते ही देखते पूरा गांव कौआ हो गया।

कौआ करे कांव-कांव ।
जाग गया पूरा गांव ।

जाग गया तो जान गया
जान गया तो मान गया
कि जो स्थिति कल थी वह आज नहीं है
अब चिड़िया पढ़-लिख चुकी हैं
किसी के आसरे की मोहताज नहीं है ।

अब आप नहीं कैद कर सकते इन्हें किसी पिंजडे़ में
ये सीख चुकी हैं उड़ने की कला
जान चुकी हैं तोड़ना रिश्तों के जाल
अब नहीं फंसा सकता इन्हें कोई बहेलिया
प्रेम के झूठे दाने फेंक कर
ये समझ चुकी हैं बहेलिये की हर इक चाल
कैद हैं तो सिर्फ इसलिये कि प्यार करती हैं तुमसे ।
तुम इसे
इनकी नादानी समझने की भूल मत करना ।
इन्हें बढ़ने दो,
इन्हें पढ़ने दो,
इन्हें उड़ने दो,
इन्हें जानने दो हर उस बात को जिन्हें जानने का इन्हें पूरा हक़ है ।

ये जानना चाहती हैं
कि क्यों समझा जाता है इन्हें ‘पराया धन’ ?
क्यों होती हैं ये पिता के घर में ‘मेहमान’ ?
क्यों करते हैं पिता ‘कन्या दान’ ?
क्यों अपने ही घर की दहलीज़ पर दस्तक के लिए
मांगी जाती है ‘दहेज’ ?
क्यों करते हैं लोग इन्हें अपनाने से ‘परहेज’ ?

इन्हें जानने दो हर उस बात को
जिन्हें जानने का इन्हे पूरा हक है ।

रोकना चाहते हो,
बांधना चाहते हो,
पाना चाहते हो,
कौओं की तरह चीखना नहीं,
चिड़ियों की तरह चहचहाना चाहते हो….
तो सिर्फ एक काम करो
इन्हें प्यार करो।
इतना प्यार करो कि ये जान जायँ
कि तुम इनसे प्यार करते हो !

फिर देखना…
तुम्हारा गांव, तुम्हारा घर, तुम्हारा आंगन,
खुशियों से चहचहा उठेगा।

Advertisements

नारी क्रंदन

आज रविवार है। कविता पोस्ट करने का दिन। पिछली कविता “आज वे…… ” में जो स्नेह मिला उसके लिए मैं सभी का आभारी हूँ। विशेषकर उन टिप्पणियों का जो मेरी कविता के शब्द-शब्द को आत्मसात करने के पश्चात ह्रदय से बाहर आई हैं। विशेष रूप से दो टिप्पणियों की चर्चा करना चाहूँगा ….आदरणीय अपनत्व जी, आपने जिस एक वाक्य का समर्थन नहीं किया वह मैं बिना लिखे भी समझ सकता हूँ। जैसा आपने आगे लिखा ..कि सभी की अपनी-अपनी राय है.. यही बात सही है। अभिव्यक्ति के लिए मात्र बिंब का ही सहारा लिया गया है। श्री बृज मोहन श्रीवास्तव जी ने जिस प्रकार व्याख्यात्मक टिप्पणी करी है उसने भी मुझे रोमांचित किया है।

पिछली बार की गंभीर कविता के पश्चात इस बार मेरा मन एक हल्की-फुल्की कविता पोस्ट करने का हो रहा है। जब मैने “मेरी श्रीमती” पोस्ट की तो बहुत से पाठकों ने इस प्रकार संवेदना प्रकट किया मानों मैं कोई पत्नी शोषित पुरूष हूँ। नीलम जी तो मानों तलवार लेकर भाजने लगीं। इसी नारी-विमर्श को ही आगे बढ़ाते हुए प्रस्तुत है हास्य-व्यंग्य विधा पर आधारित कविता – नारी क्रंदन।
————————————————————————————–

तुम सैंया ‘यू०पी०’ की बिजली
मैं ‘नरक पालिका’ की टोंटी
तुम मनमर्जी चल देते हो
मैं टप-टप नीर बहाती हूँ

तुम सैंया सरकारी बाबू
मैं हूँ भारत की जनता सी
तुम रोज देर से आते हो
मैं भूखी ही सो जाती हूँ

तुम अच्छे खासे नेता हो
मैं भोली-भाली वोटर हूँ
तुम झूठ बोलते रहते हो
मैं कलियों सी खिल जाती हूँ

तुम छुट्टे सांड़ बनारस के
मैं खूँटे पर की गैया हूँ
तुम हो प्रतीक आजादी के
मैं प्रश्न-चिन्ह बन जाती हूँ

जब मैं आई थी धरती पर
माँ तड़प रही थीं तानों में
इक सर्पदंश था सीने में
मैं बीन बनी थी कानों में

जब तुम आए थे धरती पर
तब गूँज रही शहनाई थी
माँ झूम रही थी खुशियों में
तुम झूल रहे थे बाहों में

जब से धरती पर हुआ जनम
खुशियाँ तेरी मेरे हैं गम
तुम दमके हो मोती बनकर
मैं छलकी हूँ आंसू बनकर

मैं अब भी अबला नारी को
लुटते जलते ही पाती हूँ
दिल नफरत से भर जाता है
बस जल-भुन कर रह जाती हूँ

अब नहीं-नहीं हे पती देव
अब आगे लक्ष्मण रेखा है
तुमने अब तक शायद केवल
बिजली गिरते ही देखा है

जो बुझ न सके इंसानों से
मैं प्रलयकारिणी दंगा हूँ
अच्छा है भ्रम बना रहे
तुम परमेश्वर मैं गंगा हूँ

आज वे…..

आज रविवार है और छोटे से ‘ब्लाग अनुभव’ के बाद मैंने यह निश्चय किया है कि मैं प्रत्येक रविवार को एक रचना पोस्ट करूँ ताकि पाठकों को भी मालूम हो कि रविवार को ‘बेचैन आत्मा’ अपनी ‘नई बेचैनी’ के साथ उपश्थित होगा।

चलते-फिरते सामान्य आदमियों से जब भय लगने लगता है तो मन करता है कि कोई बेचैन आत्मा मिले जिससे मन की बेचैनी कही जा सके, जिसके मन की बेचैनी सुनी जा सके और क्षमा करें चाहे वे खुद को किसी नाम से पुकारें मुझे तो सभी ब्लागर अपनी तरह ‘बेचैन आत्मा’ ही नज़र आते हैं।

आज मैं ‘पिता’ और ‘माँ’ के क्रम में उन अनाम पिताओं-माताओं की बात करना चाहता हूँ जिन्होंने मुझे तो नहीं जना लेकिन जिन्हें देखकर मेरे मन में गहरी पीड़ा होती है और उन कपूतों पर गहरा क्षोभ जिन्होंने उन्हें घर से निकाल कर एक वृद्धाश्रम के कमरे में मरने के लिए छोड़ दिया। यह कविता ऐसे ही एक वृद्धाश्रम से आकर बेचैन हुए मन की उपज है। प्रस्तुत है कविता जिसका शीर्षक है- ‘आज वे’ ।
……………………………………………………………………………

आज वे
आश्रम के कमरों में
मानवता की खूँटी से
लटके हुए हैं
ज्यों लटकते हैं घड़े
नदी तट पर
पीपल की शाख से
माटी के ।

एक दिन वे थे
जो देते गंगाजल
एक दिन ये हैं
जो मारते पत्थर
दर्द से जब तड़पते हैं
एक-दूजे से कहते हैं
अपने सिक्के ही खोटे हैं
रिश्ते
जाली के ।

थे जिनके
कई दीवाने
थे जिनके
कई अफ़साने
आज
दर-ब-दर भटकते हैं
सबकी आँखों में
खटकते हैं
अब न मय न मयखाने
होंठ प्यासे हैं
साकी के ।

धूप से बचे
छाँव में जले
कहीं ज़मी नहीं
पाँव के तले
नई हवा में
जोर इतना था
निवाले उड़ गए
थाली के ।

क्या कहें!
क्यों कहें!!
किससे कहें!!!

ज़ख्म गहरे हैं
माली के ।

विश्वास

यह एक सच्ची घटना पर आधारित है। इसे आप संस्मरण कह सकते हैं।

————————————————————–

मैं
एक अदद पत्नी और तीन बच्चों के साथ
झांसी ‘प्लेटफॉर्म’ पर खड़ा था
भीड़ अधिक थी
खतरा बड़ा था
मेरे पास कुछ ज्यादा ही सामान था
जो कुली मिला वह भी एक बूढ़ा मुसलमान था !
पचास रूपये में ट्रेन में चढ़ाने का सौदा तय था
मगर मन में एक अनजाना सा भय था

रेल के आते ही आ गया रेला
भागम-भाग, ठेलम-ठेला
कुली ने फुर्ती से
पहले पत्नी-बच्चों को
फिर मुझे
यूँ सामान सहित ट्रेन में धकेला
मानों मै भी हूँ
कोई सामान जैसा
फिर जोर की आवाज लगाई
साहब पैसा !!

मैं चीखा-
बच्चे कहाँ हैं ?
वह बोला-
ट्रेन के अंदर !
बच्चों की अम्मा कहाँ है ?
ट्रेन के अंदर !!
मेरा सामान कहाँ है ?
कुली झल्लाया-
आपका सामान आपके पास है
और आप भी हैं ट्रेन के अंदर !!!
मेरा पैसा दीजिए
फुर्सत में
सबको ढूँढ लीजिए।

तभी बीबी-बच्चों की आवाज कान में आई
मेरी भी जान में जान आई
जेब टटोला
बस् सौ का नोट था
बोला-
सौ का नोट है
पचास रूपये दो
वह भीड़ में चीखा-
नोट दीजिए आपके पैसे लौटा दुँगा
मैने कहा-ये लो।
उसने सौ का नोट लिया
और गायब हो गया
मैं मन मसोस कर
अपना सामान और जहान समेटने लगा

सोंचा
मेरी ही गलती थी
पचास का छुट्टा रखता
तो धोखा नहीं खाता
आज के ज़माने में
किस पर यकीन किया जाय !
यह क्या कम है
कि मेरा सभी सामान सही-सलामत है !!

सीटी बजी
ट्रेन पटरी पर सरकने लगी
सह यात्रियों की हंसी
मुझे और भी चुभने लगी
हें ..हें…हें… आप भी कमाल करते हैं !
ऐसे लोगों पर भी विश्वास करते हैं !!

तभी खिड़की से
एक मुठ्ठी भीतर घुसी
कान में हाँफती आवाज आई
साहब
आपका पैसा
फुटकर मिलने में देर हो गई थी…
मैने जल्दी से नोट लपका
और खिड़की के बाहर झाँक कर देखने लगा…..

प्लेटफॉर्म पर
दूर पीछे छूटते ”ईमान” के चेहरे पर
गज़ब की मुस्कान थी !
उसके दोनो हाथ
खुदा की शुक्रिया में उठे थे
मानों कह रहे हों
हे खुदा
तू बड़ा नेक है
तूने मुझे
बेइमान होने से बचा दिया

हम
बहुत देर तक
पचास रूपये के नोट को देखते रहे

मेरे क्षुद्र मन और सहयात्रियों के चेहरे की हालत
देखने लायक थी।

पचास रूपये का नोट तो कहीं खर्च हो गया
मगर आज भी
मैं अपनी मुठ्ठी में
विश्वास और भाईचारे की
उस गर्मी को महसूस करता हूँ
जो उस गरीब ने
नोट में लपेटकर मुझे लौटाया था

जिसे
जीवन की आपाधापी में
सहयात्री
गुम होना बताते हैं।

मेरी श्रीमती

गंभीर कविताएँ पढ़कर भारी हुए मन को हल्का करने के लिए प्रस्तुत हास्य-व्यंग्य विधा पर एक कविता जिसका शीर्षक है -मेरी श्रीमती।

—————————————————————————-

प्रश्न-पत्र गढ़ती रहती है
वह मुझसे लड़ती रहती है।

मुन्ना क्यों कमजोर हो गया ?
शानू को कितना बुखार है ?
राशन पानी खतम हो गया
अब किसका कितना उधार है ?

दफ्तर से जब घर जाता हूँ
वह मुझको पढ़ती रहती है।

सब्जी लाए भूल गए क्या ?
चीनी लाए भूल गए क्या ?
आंटा चक्की से लाना था
खाली आए भूल गए क्या !

मुख बोफोर्स बनाकर मुझ पर
बम-गोले जड़ती रहती है।

प्रश्नों से जब घबड़ाता हूँ
कहता अभी थका-मांदा हूँ
कहती कैसे थक सकते हो
तुम नर हो, मैं ही मांदा हूँ !

मुझको ही झुकना पड़ता है
वह हरदम चढ़ती रहती है।

पूरे घर की प्राण वही है
हाँ मेरी भी शान वही है
हीरो-होण्डा दिल की धड़कन
चेहरे की मुस्कान वही है

बनके सतरंगी रंगोली
आँगन में कढ़ती रहती है।

प्रश्न-पत्र गढ़ती रहती है

वह मुझसे लड़ती रहती है।