नारी क्रंदन

आज रविवार है। कविता पोस्ट करने का दिन। पिछली कविता “आज वे…… ” में जो स्नेह मिला उसके लिए मैं सभी का आभारी हूँ। विशेषकर उन टिप्पणियों का जो मेरी कविता के शब्द-शब्द को आत्मसात करने के पश्चात ह्रदय से बाहर आई हैं। विशेष रूप से दो टिप्पणियों की चर्चा करना चाहूँगा ….आदरणीय अपनत्व जी, आपने जिस एक वाक्य का समर्थन नहीं किया वह मैं बिना लिखे भी समझ सकता हूँ। जैसा आपने आगे लिखा ..कि सभी की अपनी-अपनी राय है.. यही बात सही है। अभिव्यक्ति के लिए मात्र बिंब का ही सहारा लिया गया है। श्री बृज मोहन श्रीवास्तव जी ने जिस प्रकार व्याख्यात्मक टिप्पणी करी है उसने भी मुझे रोमांचित किया है।

पिछली बार की गंभीर कविता के पश्चात इस बार मेरा मन एक हल्की-फुल्की कविता पोस्ट करने का हो रहा है। जब मैने “मेरी श्रीमती” पोस्ट की तो बहुत से पाठकों ने इस प्रकार संवेदना प्रकट किया मानों मैं कोई पत्नी शोषित पुरूष हूँ। नीलम जी तो मानों तलवार लेकर भाजने लगीं। इसी नारी-विमर्श को ही आगे बढ़ाते हुए प्रस्तुत है हास्य-व्यंग्य विधा पर आधारित कविता – नारी क्रंदन।
————————————————————————————–

तुम सैंया ‘यू०पी०’ की बिजली
मैं ‘नरक पालिका’ की टोंटी
तुम मनमर्जी चल देते हो
मैं टप-टप नीर बहाती हूँ

तुम सैंया सरकारी बाबू
मैं हूँ भारत की जनता सी
तुम रोज देर से आते हो
मैं भूखी ही सो जाती हूँ

तुम अच्छे खासे नेता हो
मैं भोली-भाली वोटर हूँ
तुम झूठ बोलते रहते हो
मैं कलियों सी खिल जाती हूँ

तुम छुट्टे सांड़ बनारस के
मैं खूँटे पर की गैया हूँ
तुम हो प्रतीक आजादी के
मैं प्रश्न-चिन्ह बन जाती हूँ

जब मैं आई थी धरती पर
माँ तड़प रही थीं तानों में
इक सर्पदंश था सीने में
मैं बीन बनी थी कानों में

जब तुम आए थे धरती पर
तब गूँज रही शहनाई थी
माँ झूम रही थी खुशियों में
तुम झूल रहे थे बाहों में

जब से धरती पर हुआ जनम
खुशियाँ तेरी मेरे हैं गम
तुम दमके हो मोती बनकर
मैं छलकी हूँ आंसू बनकर

मैं अब भी अबला नारी को
लुटते जलते ही पाती हूँ
दिल नफरत से भर जाता है
बस जल-भुन कर रह जाती हूँ

अब नहीं-नहीं हे पती देव
अब आगे लक्ष्मण रेखा है
तुमने अब तक शायद केवल
बिजली गिरते ही देखा है

जो बुझ न सके इंसानों से
मैं प्रलयकारिणी दंगा हूँ
अच्छा है भ्रम बना रहे
तुम परमेश्वर मैं गंगा हूँ

Advertisements

30 thoughts on “नारी क्रंदन

  1. अरे ऊपर इतनी जगह क्यॊ खाली छोड दी? उसे देख कर शायद सब चले जाते है, आप की कविता बहुत सुंदर लगी, धन्यवाद

  2. बहुत सुन्दर… अपर संभावनाएं हैं आपमें… लिखते रहें… शैली और तेवर दोनों अच्छे हैं… प्रयोग भला है… और मनोरंजक भी… दिल की बात भी इसी बहाने कह दी… पर बहिन जी को शायद पसंद ना आये…. :)…

  3. बहुत खुबसूरत प्रयोग है ..शुरू में हास्य व्यंग का पुट और बाद में नारी की गंभीर अन्तर वेदना ..काफी अच्छे बन पड़े हैं…..शुरू के २ पेराग्राफ बहुत पसंद आये.

  4. लाजवाब बहुत खुबसूरत रचना है …….हास्य व्यंग से शुरू हो कर …….. गंभीर फिर नारी मन की अन्तर वेदना को दर्शाती ……… अच्छी रचना है ……..

  5. kavi chahe apne dil ki ho ya kisi ke dukh ka mahsus kar likhata ho uski samvednayen sabke liye hoti hai… bahut achha lagi aapki kavita.. kabhi purush krandan bhi likhiyegaa……Shubhkamnayen

  6. जो बुझ न सके इंसानों सेमैं प्रलयकारिणी दंगा हूँअच्छा है भ्रम बना रहेतुम परमेश्वर मैं गंगा हूँये हलकी पुलकी है??? मुझे तो बहुत ही बेहतर लगी एक एक शब्द मन में उतर गया जो आपने दलीलें दी काबिले तारीफ़ है | एकदम सत्य निरासत्य ! सांड ऐसा चारा बड़े शौक से खाता है !!!

  7. वाह क्या खूब कहा है शुभकामनायेंजो बुझ न सके इंसानों सेमैं प्रलयकारिणी दंगा हूँअच्छा है भ्रम बना रहेतुम परमेश्वर मैं गंगा हूँबधाई

  8. मुझे ये समझ में नहीं आया की आपने किसी और शायर की पंक्तियाँ मुझे लिख कर क्यूँ दिया! अगर आपको पसंद न आए तो कोई बात नहीं पर मेरी शायरी के साथ किसी और शायर का कोई वास्ता नहीं! अगर आपको मेरी बातों का बुरा लगा तो माफ़ कीजियेगा!जब से धरती पर हुआ जनमखुशियाँ तेरी मेरे हैं गम तुम दमके हो मोती बनकरमैं छलकी हूँ आंसू बनकर…बहुत सुंदर पंक्तियाँ! इस उम्दा रचना के लिए बधाई!

  9. जो बुझ न सके इंसानों सेमैं प्रलयकारिणी दंगा हूँअच्छा है भ्रम बना रहेतुम परमेश्वर मैं गंगा हूँबहुत ही सुन्‍दर पंक्तियों से सजी बेहतरीन अभिव्‍यक्ति ।

  10. जो बुझ न सके इंसानों सेमैं प्रलयकारिणी दंगा हूँअच्छा है, भ्रम बना रहेतुम परमेश्वर मैं गंगा हूँमुझे याद नहीं कि कविता में इस से अधिक चुभता हुआ व्यंग्य पहले कभी पढ़ा हो ! बधाई हो हाथरसी-अवतार !!

  11. कई अंतर्विरोधों को अंतर्मन की गहराई से महसूस कर शब्दों को उनके सही ठिकाने पर रख कर जोड़ा गया है बधाई लेकिन उपरी १६ पंक्तियाँ कविता स अलग की जा सकती है इस तरह दो कवितायें अपने अलग अंदाज और तेवर में थोड़े से बदलाव के साथ बन सकती है ..बस ये सुझाव है अन्यथा ना लें फिर भी अपने अर्थ को सार्थक करती इस रचना के लिए धन्यवाद

  12. वाह सर जीयह तो तालियों की गड़गड़ाहट के बीच सुनी जाने लायक कविता है…अहोकाव्य..यू पी की बिजली ’परदेसी सैंया’ है..खुद कभी नही आती..भूले-बिसरे खत आ जाते हैं बस..

  13. और यह पंक्तियाँ तो हकीकत को भी शर्मसार कर देंतुम छुट्टे सांड़ बनारस केमैं खूँटे पर की गैया हूँतुम हो प्रतीक आजादी केमैं प्रश्न-चिन्ह बन जाती हूँ

  14. देवेंद्र जी ,अच्छा व्यंग किया है .देश के सामने आज कई समस्याएँ मुँह बाए खड़ी हैं .लोगों की प्राथमिक ज़रूरतें तक पूरी नहीं हो पा रही हैं .औरत की दशा आज भी सोचनीय है .आप मेरे ब्लॉग पर आए , खुशी हुई .

  15. जब से धरती पर हुआ जनमखुशियाँ तेरी मेरे हैं गमतुम दमके हो मोती बनकरमैं छलकी हूँ आंसू बनकरमैं अब भी अबला नारी कोलुटते जलते ही पाती हूँदिल नफरत से भर जाता हैबस जल-भुन कर रह जाती हूँदेवेन्द्र जी नतमस्तक हूँ आपकी इस कविता पर …..दो,चार पंक्तियों में ही आपने नारी जाति की सारी व्यथा कह डाली ….बहुत ही सशक्त रचना …हर बंद अपने आप में पूर्ण है …अपूर्व जी ने सही कहा …..तालियाँ …..!!

  16. नारी की व्यथा को बहुत ही सहजता से प्रस्तुत किया हैअब नहीं-नहीं हे पती देवअब आगे लक्ष्मण रेखा हैतुमने अब तक शायद केवलबिजली गिरते ही देखा हैजो बुझ न सके इंसानों सेमैं प्रलयकारिणी दंगा हूँअच्छा है भ्रम बना रहेतुम परमेश्वर मैं गंगा हूँकिंतु इन पंक्तियों ने नारी को अपनी ख़ुद की पहचान दे दी \बहुत सशक्त रचना ||

  17. Ha,ha,ha! Bade dinon baad aisee hansee niklee..UP kee kya Maharashtr me bhi yahee haal hai…poore desh kee bijlee..saare deshke nalke..waah! Aisee tulna kahin nahee padhee..!

  18. जब से धरती पर हुआ जनमखुशियाँ तेरी मेरे हैं गमतुम दमके हो मोती बनकरमैं छलकी हूँ आंसू बनकरbahut khoob ,der se comment preshit karne ke liye maafi chaahungi .

  19. अगर तूफ़ान में जिद है … वह रुकेगा नही तो मुझे भी रोकने का नशा चढा है ।

  20. मैं प्रलयकारिणी दंगा हूँअच्छा है, भ्रम बना रहेतुम परमेश्वर मैं गंगा हूँबहुत सुंदर । नारी के आक्रोश की गहरी अभिव्यक्ती ।

  21. देवेन्द्र जी मेरे ब्लॉग पर आपने अपनी प्रतिक्रिया डाली थी वहीं से ढूंढते- ढूंढते पहुँच गयी हूँ और आकर ऐसा लगा की कहाँ आ गयी ?अभी तक क्या कर रही थी ?यकीन मानिये जो कुछ पढ़ा इतना अछ्हा लगा की शब्द ही नहीं मिल रहे है

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s