"दंश"

आज रविवार है कविता पोस्ट करने का दिन। आपकी प्रशंसा से अभिभूत हूँ। लेकिन एक बात समझ में नहीं आई कि एक भी टिप्पणी आलोचनात्मक समीक्षा के रूप में सामने नहीं आई। यह संभव नहीं लगता कि मैने इतनी सारी कविताएँ पोस्ट कीं उनमें कहीं कोई त्रुटि न हो । भाषा की अग्यानता, टंकण संबधी त्रुटियाँ या वैचारिक मतभेद…. कुछ तो अवश्य होंगे। मात्र प्रशंसा के पीछे ब्लागर्स बंधुओं का यह भय भी हो सकता है कि यदि आलोचना करी तो फिर यह मेरे ब्लाग में नहीं आएगा या यह मेरी आलोचना शुरू कर देगा लेकिन मैं आप सभी को आश्वस्त करना चाहता हूँ कि अपनी कमियाँ जानकर मेरा आपके प्रति स्नेह और भी बढ़ेगा। मैं गज़ल नहीं लिख पाता लेकिन आपकी प्रशंसा के कारण एक शेर अनायास जेहन में उतर गया-

यूँ तो चढ़ाइए ना चने की झाड़ पर
सर जमीन पर हो पैर आसमान पर

कहने का मतलब यह नहीं कि कल से मेरी निंदा करना शुरू कर दीजिए लेकिन यह अवश्य चाहता हूँ कि मेरी कमियाँ उजागर हों और मैं कुछ और सीख सकूं। इतिहास साक्षी है कि स्वस्थ आलोचना से कवि का सदैव भला ही हुआ है। यदि आपको मेरी बातें अच्छी न लगीं हों तो इसके लिए क्षमा चाहता हूँ ।
आपका ज्यादा समय नष्ट किया अतः कविता की भूमिका में न जाते हुए प्रस्तुत है आज की कविता जिसका शीर्षक है–


“दंश”

गली के मोड़ पर
उजा़ले में
कुतिया ने बच्चे दिए
जाड़े में

एक-दो नहीं पूरे सात
ठंड से बचाती रही वह उन्हें
पूरी रात
सबके सब सुंदर प्यारे थे
माँ की आँखों के तारे थे
सुबह तक एक खो चुका था
शायद अल्लाह का प्यारा हो चुका था

बचे छः
सह गयी वह
कष्ट दुःसह।

कोई पास से गुजरता तो गुर्राती
दिन भर यहाँ-वहाँ छुपाती
फिर आती हाड़ कंपा देने वाली काली रात
बच्चों को चिपकाती अपने स्तन से
सारी रात
उफ !
रात भर उसका रोना
मुश्किल था हमारा सोना

सुबह तक एक और खो चुका था
शायद किसी का हो चुका था

यमराज ले जाए या आदमी
बच्चे गुम हो रहे थे
कुतिया को गिनती नहीं आती
पर इतना जानती
कि बच्चे
कम हो रहे थे

कातर निगाहों से
उन्हीं से मदद की उम्मीद करती
जो अब
हल्की गुर्राहट से भी डरने लगे हैं
हाथों में डंड़ौकी ले
घरों से निकलने लगे हैं।

दिन गुजरते जाते हैं
एक-एक कर पिल्ले गुम होते जाते हैं।

एक दिन बर्तन माजने वाली बताती है-
कुतिया का सिर्फ एक पिल्ला बचा
उसे भी उठा ले गए
पान वाले चचा….!

मेरी पत्नी पूछती है-
पिल्ले को छोड़, तू बता
तेरा छोटू आज काम पर क्यों नहीं आया ?
वह बताती है-
उसका बाप उसे मुम्बई ले गया है
वहाँ एक बहुत बड़ा साहब रहता है
अब वह वहीं रहेगा
एक हैजा से मर गया
दूसरा अपने से भाग गया
यही बचा था
इसे भी इसका बाप ले गया
कहते-कहते उसकी आँखें डबडबा गईं।

मैने सुना
बर्तन मांजते-मांजते

बीच-बीच में बड़बड़ाती जाती है-

कुतिया का सिर्फ एक बच्चा बचा
उसे भी उठा ले गए
पान वाले चचा..!

मैने महसूस किया
एक वफादारी
दूसरे निर्धनता का दंश
झेल रहे हैं।

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29 thoughts on “"दंश"

  1. dil ko choo jane walee sath hee sach ko ujagar karatee rachana .vaise hakeekat ye bhee hai ki kutiya navjat shishu ko aahar banane me nahee hachakatee ye bhee kaduva saty hee hai .aur jaha tak naukaranee ke bacche ka sawal hai papee pate jo na karae thoda hai .janha tak galtiyo vyakaran ka sawal hai ye koi test to hai nahee . bhavo kee abhivyaktee sarvoparee hai aisa mujhe lagata hai .acche acche hindi bloger's kee rachanao me ki, aur kee me koi farak nahee..hindi padane likhane ko mil rahee hai south me rahate use hee bada saubhagy manatee hoo mai .aapakee rachana acchee lagee .

  2. बहुत ही मार्मिक लिखा है …….. ग़रीबी का दंश …….. कुटिया के बच्ची को माध्यम बना कर पूरी बात उकेर दी है आपने ….. बहुत खूब लिखा है ………. आलोचना की कोई जगह नही ………..

  3. वे रहते तो भी क्या और ले गया कोई तो भी क्या?! मेरी गली में भी थे चार पिल्ले पिछली साल। एक बचा है। कुतिया दो चार दिन भटभटाती रोती रही थी। फिर सामान्य। वह भूल गयी होगी। हम याद रखने को अभिशप्त हैं! स्मृति क्यों होती है मित्र!

  4. वाह देवेन्द्र जी, ये खूब रही, कि कोई आलोचना नहीं?जनाब एक तरकीब बतायें आपको,इतना मार्मिक भाव रखने के बजाय 'घटिया' लिखकर तो देखिये..आपके चाहने वाले ये ख्वाहिश भी पूरी कर देंगेशाहिद मिर्ज़ा शाहिद

  5. जहां तक मेरा मानना है वैचारिक मतभेद पर आलोचना आधारित नही होनी चाहिये ,एक गरीब के बच्चे की कुत्ते के पिल्ले से तुलना करके जो आपने चित्रण किया है ,आलोचना के लिये गुंजाइश ही कहां छोडी है ।सर जमीन और पैर आसमान पर मतलब शीर्षासन । निंदा से इतना घवराते क्यों हो जो निंदा करने की मनाही कर रहे हो ,ब्लोगर का तो ओखली मे सिर होता ही है ,फिर भी उनकी गलती बतादो तो बहुत जल्द बुरा मानते है ।खैर उसके रोने से हमारा सोना मुश्किल और आदमी ले जाये या यम गिनती तो कम होना ही है में आपने बहुत गहरी बात कहदी है ,उत्तम रचना

  6. मैने महसूस कियाएक वफादारीदूसरे निर्धनता का दंशझेल रहे हैं।अब इस मे झूठ क्या है? बहुत सुन्दर कुतिया के माध्यम से जिस बेबसी का मार्मिक चित्र उकेरा है बहुत अच्छा लगा। आप बहुत अच्छा लिखते हैं कहाँ से गलती निकालें? शुभकामनायें

  7. चलिए हम आपकी गलतियां ही खोजते हैं ,वैसे ऊपर एक भाई ने सच ही कहा है कि आप किसी को गलतियां बताओ तो वह नाराज हो जाता है जबकि इंसान गलतियों का पुतला है ,हम बचपन में ही रटे होते हैं ,खैर…….अल्लाह का प्यारा नहीं अल्लाह को प्याराअंतिम पंक्तियों में– दूसरा…………………. झेल रहा है बुरा लग रहा हो तो माफी की तलबगार हूँ मैं इस कविता ने मुझे अपने मायके की याद दिला दी ,मेरा कुतिया के शिशुओं से बड़ा अद्भुत नाता हुआ करता था ,पूरे मोहल्ले में बदनाम थी मैं ,फिनाईल ,शैम्पू ,और तौलिये अलग से इन दिनों मेरे घर में होते थे ,और साथ में मम्मी की बडबड और मेरे भावी पति का मेरा छुआ हुआ पानी न पीना ……………

  8. देवेन्द्र जी एक अत्यंत मार्मिक चित्रण. पर जिस पर बीती उसका मर्म न जाने कोई. बधाई स्वीकारें मेरी एक अत्यंत संवेदनशील व मार्मिक कविता "आज भी " जरुर पढ़ें मेरे ब्लॉग पर

  9. मैंने आप का कहा मान कोशिश की कहीं कोई कमी नज़र आये मुझे आपकी रचना में लेकिन सफल नहीं हो पाया…आपके शब्द और भाव दोनों ने बांध लिया इस रचना ,में…मेरी बधाई स्वीकार करें..नीरज

  10. धन्यवाद अलका जी,गलतियाँ ढूँढने के लिए…'अल्लाह को प्यारा' तो ठीक लेकिन 'दूसरा' से मैं सहमत नहीं हूँयहाँ 'दूसरे' निर्धन वर्ग के लिए प्रयोग किया गया है।बुरा मानने की कोई बात ही नहीं है ऐसा होता तो मैं गलतियाँ ढूँढने के लिए क्यों कहता!

  11. devendra ji shukriya apka aur mera saubhagye ki aap mere blog per aaye jike thru me bhi aapke blog tak pahuch paayi aur aapki itni samvendansheel abhivyakti padh payi.bahut acchha laga apko padhna.baaki aalochna ki to koi gunjaish nahi hai. aur hindi me likhte huai chhoti chhoti galtiya ho jati hai. aur aisi rachnao me man ke bhaav ahem hote hai na ki galtiya. bahut bahut shukriya ek bar fir se.

  12. ये तो आपने पाठकों को बडे संकोच में डाल दिया । भूमिका में यह लिखकर । वैसे बात ठीक ही लिखी है । लेकिन आलोचना करना आसान काम तो है नहीं । अब हम रचना का आनंद लेने से ज्‍यादा गलती खोजने पर ध्‍यान दें । बहुत अच्‍छा कहेंगे तो खुशामद के अपराध बोध से ग्रसित होने की संभावना । देखिए हो गई न आलोचना । रही कविता तो बहुत संवेदनशील कविता लिखे है । छोटे छोटे पिल्‍ले बडे प्‍यारे लगते हैं ।

  13. कितने सहज शब्‍दों में आपने व्‍यक्‍त कर दिया इस अनुपम सच्‍चाई को, बहुत ही अच्‍छा लिखा है आपने, बधाई ।

  14. बहुत ही संवेदन शील रचना। कुतिया और बाई दोनों की एक ही व्यथा है । अब आप ही बतायें इसकी क्या आलोचना करें ।

  15. देवेन्द्र जी, आपके कमेन्ट का आभारी हूँ जो मुझे प्रति रविवार प्रकट होने वाली बेचैन आत्मा के घर तक ले आया. पहली कविता को शंकित स्वभाव से पढ़ा. कविता बेहद धीरे चल रही थी या यूं समझिये कि मैं ही उसे अपने साथ आगे खींच रहा था बस यही भूल हुई, एक लेंड माइन तक पहुंचा और कविता ने विस्फोट से परखच्चे उड़ा दिए. इसके बाद रेंडमली कुछ पोस्ट देखी, उनमे एक बेहद शानदार कविता थी जो कन्याभ्रूण हत्या से आरंभ हो कर बलिवेदी तक के तमाम विषयों को खूबसूरती से प्रस्तुत कर रही थी, समझ नहीं आया कि कविता के शिल्प और भावों पर बधाई दी जाये या फिर कुछ देर के लिए मन-संवेदन को दिलासा दी जाये.इस बेचैन आत्मा को शिड्यूल बेचैन आत्मा कहना मुफीद लग रहा है के लिए ढेर सारी शुभकामनायें. वैसे अगले रविवार के बीच एक ही दिन है.

  16. आज पहली बार आ रहा हूँ शायद आपकी ब्लौग पर। ऊपर की तस्वीर ने कई क्षणों तक बाँधे रखा। फिर कविता के ऊपर भूमिका ने मुस्कुराने पर बाध्य किया। मेरी भी यही शिकायत है अपने इस ब्लौग-जगत से।कविता पे आते हुये..सच कहूं देवेन्द्र जी तो आजकल की इस मुक्त-छंद, छंद-मुक्त, अकविता, नई कविता के नाम पर परोसे जाने वाले गद्य मुझे समझ में नहीं आते। बस उनका भाव पक्ष देखता हूँ और प्रस्तुतिकरण को सराहता हूं।आपका अंदाज भाया। अब आते रहूँगा।

  17. देवेन्द्र जी, याकिन मानिए! आपको पढना संवेदनाओं और सत्य को करीब से कुरेदना है.भाषा और व्याकरण दोष की बात मुझे बहुत कम नज़र आती है. क्योंकि मैं भी भावों में बहकर ही रचता हूँ, और बड़ी मुश्किल से शुद्ध ग़ज़ल कह पाता हूँ.आप बस लिखते रहे, सिखने सिखाने का दौर यूँ ही परस्पर चलता रहेगा. – सुलभ

  18. यह संभव नहीं लगता कि मैने इतनी सारी कविताएँ पोस्ट कीं उनमें कहीं कोई त्रुटि न हो । aur…. मेरी भी यही शिकायत है अपने इस ब्लौग-जगत से।is kataar main mujhe bhi maan liya jaaiye.Kavita ne mujhe prabhavit kiya. Aur koi burai isliye nahi kar pa raha hoon kyunki wo samikshakon ka kaam hai, kuch log kewal kavita ka anand lene bhi aate hain .Aur wo log (jiase ki main) aapse kum jaankar ho sakte hain.'upma ya upma sadrishya kuch'accha laga……waise vafadari aur nirdhanta ek sikke ke do pehlu hote hain (kabhi kabhi). Nirdhan kitne dino tak vafadar (samaj, boss, desh, dharm aadi ke prati) rehta hai yeh prashn sochniya hai.aapki patni ke dwara kavita ke beech main aaiya samvedanhinta ka put samayik laga:मेरी पत्नी पूछती है-पिल्ले को छोड़, तू बतातेरा छोटू आज काम पर क्यों नहीं आया ?(kis kis ko yaad karein, kis kis ko roieye?)

  19. Hi Devendraji! You have a broad heart and a good consciousness so that u have felt the feelings of two mothers,one of animal and other of human being. And not only felt it but also expressed it to others by the composition.You are a great person.

  20. देवेन्द्र जी यह विचारों का खजाना मैं देर से पा सका क्षमा चाहता हूँ कितनी गंभीर और सोचनीय बात कह गये आप इस कविता से कुतिया को एक माँ के रूप में प्रस्तुत करना एक बहुत ही भावनात्मक और मार्मिक प्रस्तुति लगी बहुत ही बढ़िया अनुभव है आपको अपने आस पास के वातावरण का और उन अनुभव को कविता में सज़ा कर प्रस्तुत करना यह भी एक लाज़वाब कला है जो आपके पास है ..मुझे आप जैसे कवि से बहुत प्रेरणा मिलती है…आज की यह कविता मुझे बहुत ही बढ़िया लगी..बहुत बहुत धन्यवाद

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