जाड़े की धूप

इस कविता का सृजन आज से 25 वर्ष पूर्व, सन 1985 में मकरसंक्रांति के दिन , एक प्रेमी ने अपनी प्रेमिका को देखकर किया था. आज… जब मैं अपनी पुरानी डायरी पलटने लगा… तो इसे देखकर… उसी दुनियाँ में खो गया. मन हुआ, समर्पित कर दूं इसे अपनी श्रीमती जी को …..वो भी क्या याद करेंगी कि किससे पाला पड़ा है.





जाड़े की धूप
षोडसी को नहलाकर

प्यार से सहलाकर

छत की मुंडेर से

उतरने लगी है

जाड़े की धूप.


स्वेटर बुनती

गोरी उंगलियाँ

आँखों में अनगिन

ख्वाबों की गलियाँ

ऊन के गोले सा

गोरी की बाँहों से

लुढ़कने लगा है

सूरज .


पंछियों में बदल गए

सभी पतंग सहसा

शर्म से

लाल हुआ जाता है

दिन !
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16 thoughts on “जाड़े की धूप

  1. धन्यवाद अपनत्व जी, टंकण की त्रुटी बताने के लिए…मैंने सुधार दिया है.

  2. वाह, बहुत खूब……ऊन के गोले सागोरी की बाँहों सेलुढ़कने लगा हैसूरज…….अब 25 साल बाद क्या हाल हैं, 'प्रेमी' जी के? आगामी रचना में खुलासे का इंतजार रहेगा…

  3. अब तक छुपा कर रखे थे डायरी में इस खूबसूरत कविता को…प्रेम और भावनाओं की एक खूबसूरत अभिव्यक्ति..बढ़िया कविता के लिए बहुत बहुत धन्यवाद.. सादर प्रणाम देवेन्द्र जी!!

  4. स्वेटर बुनतीगोरी उंगलियाँआँखों में अनगिनख्वाबों की गलियाँऊन के गोले सागोरी की बाँहों सेलुढ़कने लगा हैसूरज …..सोचिए मत …….. जल्दी ही समर्पित करें इस दिलकश रचना को ………. खूबसूरत शब्दों से बुनी है यह कविता ….. मासूम एहसास हैं इसमें ……….. लाजवाब ………

  5. लाजवाब !!! सूरज की सुन्दर महिमा!! और एक अछि बात आपके ब्लॉग पे ये लगी की आपने जो ब्लॉग हेडिंग में तस्वीर लगा रखि है आहा! हा!! जी करता हैं वही जाकर बैठ जाऊं!!!!

  6. वाह भाई आपकी रचना हमारे सूर्य देव की गरिमा को बढ़ा रही है एक सांड सूर्य देव का ही होता है ! अगर इजाजत हो तो ऊपर की घाटी की हरियाली में ज़रा आराम फरमा लूँ!

  7. बेहतरीन..एक दम सर्दी की गुलाबी प्रेम कविता लग रही है यह….विशेषकर सूरज का ऊन के गोले सा लुढ़कना..जनवरी के सूरज मे ऊन सी गरमी ही होती है..स्पर्शयुक्त..और पक्षियों की पतंगें..जो ऊँचे आकाश मे भी धरती की डोर से जुड़ी रहते हैं..और शाम होते ही उतर आती हैं नीचे…और भी खूबसूरत…समर्पण भी कर ही डालिये इसका..

  8. वाह डियर…बहुत सुन्दर लगी ये रचना….स्वेटर बुनतीगोरी उंगलियाँआँखों में अनगिनख्वाबों की गलियाँऊन के गोले सागोरी की बाँहों सेलुढ़कने लगा हैमजा ही आ गया बस….

  9. शर्म से लाल हुआ जाता है दिन !सुभानाल्लाह……२५ साल पहले भी आप इतना अच्छा लिखते थे ……????एक प्रेमी…..???????कहीं आप ही तो नहीं थे….??????????????

  10. प्रेम में सराबोर कविता. क्या उपमाएं हैं,क्या दिलकश नज़ारा है,कहीं ये मकर संक्रांति के दिन छत पे पतंग उड़ाते हुए तो नहीं लिख डाली ये सुंदर रचना. ह….हा…

  11. पतंग पंछियों में बदल गए ….यानि की गोरी के ख्वाब पंछी बन कर उड गए दूर दिशाओंमे….तभितो वो शर्म से लाल हो गई…..वो पंछी आप ही पाल रहे हैं न ?

  12. इस कविता के लिए कोई भी तारीफ़ कम है … नासरी नाले की तरह सीधे एक ऊंचाई से गिरती है और भावक के मन में निर्विरोध गहरे तक उतर कर बहने लगती है ..वाह! वाह ! मेरी बेचैन आत्मा !

  13. बहुत सुन्दर रचना लिखा है आपने! हर एक पंक्तियाँ बहुत अच्छी लगी ! इस लाजवाब और बेहतरीन रचना के लिए बधाई!

  14. धन्यवाद शोभना जी, आपका आशीर्वाद पाकर हमारा मन प्रफुल्लित हो गया.

  15. ukera hain sayad aapne apne lafzo ko thand se tang hokerlouta hain jaise aapka man ,gami ki bachani se hokerbahut khub sir ,aapse sayad kafi kuch seekh paunga

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