आयो रे बसंत चहुँ ओर.

अपने शहर में, घने कोहरे और हाड़ कंपा देने वाली ठंड के बीच ‘वसंत पंचमी’ का त्यौहार कब आया और चला गया पता ही नहीं चला. हाँ, ब्लॉग जगत में बसंत झूम कर आया. इधर ४-५ दिनों से इस शहर के मौसम में ऐसा बदलाव आया कि लगा ..यही तो है बसंत. आज मैंने भी ठान लिया कि बसंत पर कुछ लिखा जाय. २ घंटे की मेहनत के बाद जो भी बन सका उसे ज्यों का त्यों पोस्ट कर दे रहा हूँ ..अभी इस पर संपादक की नज़र भी नहीं गयी है अतः यह गुरुतर दायित्व भी मैं आप पर ही छोड़ता हूँ. प्रस्तुत है एक गीत.

आयो रे बसंत चहुँ ओर
धरती में पात झरे
अम्बर में धूल उड़े

अमवां में झूले लगल बौर
आयो रे बसंत चहुँ ओर.

कोयलिया ‘कुहक’ करे
मनवां का धीर धरे

चनवां के ताकेला चकोर
आयो रे बसंत चहुँ ओर.

कलियन में मधुप मगन
गलियन में पवन मदन

भोरिए में दुखे पोर-पोर
आयो रे बसंत चहुँ ओर.
………………………………………………….
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28 thoughts on “आयो रे बसंत चहुँ ओर.

  1. भई वाह, बसंत का भी अपना ही मज़ा है। लगता है एक बार गाँव की सैर करके आना पड़ेगा।पीले पीले सरसों के खेत देखकर आनंद आ जाता है।

  2. बधाई बसंत के स्वागत मे इतने खूबसूरत बसंतमय गीत के लिये..एक लोकगीत सी मधुरता लिये इस गीत की गेयता पर बसंत खुद भी मुग्ध हुए बिना नही रह सकता…हाँ चनवां के ताके लगल चोर नही समझ आया कुछ..

  3. देवेन्द्र जी …. जो गुरुतर हैं वो संपादकीय नज़र डालेंगे ………. हमे तो बस रस-स्वाद करना है …….. सो वो हम कर रहे हैं आपकी इस खूबसूरत लोक-भाषा में रची रचना का ………. मज़ा आ गया …….. सचमुच लग रहा है बसंत आ गया …..

  4. chanawa ko takal lage chor to khet me chane ko dekhakar likha gaya hoga magar basant ke geet me dukhal lage por por kuchh jama nahin ,thandi me aagayaa basantpanchami…..magar basant to falgun aur chaitr ke mahino me aata hai ,fir ye basant panchami itane jaldi kaise aa gaya? Ye basant-panchami nischit karane wale log lagata hai kuchh galti kar gaye….ha….ha

  5. अपूर्व जी,'पहले चनवां के ताकेला चकोर' लिखा था फिर सोंचा, बिचारा 'चकोर' अकेला ही बदनाम है! चाँद को तो हर कोई चुप-छुप देखता है….सो 'चनवां के ताके लगल चोर' लिख दिया.अब आप और गिरजेश जी मिल के जो तय करें वही बना दूँ. वैसे भी संपादन का अधिकार तो मैंने पहले ही दे रक्खा है.

  6. गीत का लालित्य चोर ले उड़ा है। इसे ‘चकोर’ के ही हवाले कीजिए। सबकुछ भूलकर चाँद को अपलक निहारने का काम कोई चोर कैसे कर पाएगा। ऐसा दीवानापन उसी के पास है जो चकोर है।

  7. लीजिए कर दिया 'चकोर' के हवाले…बसंती हवा में बहक गया था…आप सब ने संभाल दिया…..आभार.

  8. सही कहा सिद्धार्थ जी ने, यह सचमुच संक्रमनकारी कविता है -चकोर ही होना था -कभी चकवा चकई को रात में भी वसंत में मिलवा दे न प्लीज -यी कवी लोग कुछौ कर सकते हैं .चकवा चकई मिल जायं बसंत में तबई हम मानी की बसंत आयी गवा !

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