फागुन का त्यौहार


फागु का त्यौहा

जले होलिका भेदभाव की, आपस में हो प्यार
तब समझो आया है सच्चा, फागुन का त्यौहार

हो जाएँ सब प्रेम दीवाने
दिल में जागें गीत पुराने
गलियों में सतरंगी चेहरे
ढूँढ रहे हों मीत पुराने

अधरों में हो गीत फागुनी, वीणा की झंकार
तब समझो आया है सच्चा, फागुन का त्यौहार

बर्गर, पीजा, कोक के आगे
दूध, दही, मक्खन को खाये !
कान्हां की बंसी फीकी है
राधा को मोबाइल भाये !

इन्टरनेट में शादी हो पर, रहे उम्र भर प्यार
तब समझो आया है सच्चा, फागुन का त्यौहार

अपने सोए भाग जगाएँ
दुश्मन को भी गले लगाएँ
जहाँ भड़कती नफ़रत-ज्वाला
वहीं प्रेम का दीप जलाएँ

भंग-रंग पर कभी चढ़े ना, महंगाई की मार
तब समझो आया है सच्चा, फागुन का त्यौहार.
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45 thoughts on “फागुन का त्यौहार

  1. 'जहाँ भड़कती नफ़रत-ज्वालावहीं प्रेम का दीप जलाएँ'अच्छी भावनायें अभिव्यक्त की हैं आपने !

  2. bahut sunder man ke bhav liye hai ye fagun ka geet .जले होलिका भेदभाव की, आपस में हो प्यारतब समझो आया है सच्चा, फागुन का त्यौहारati sunder !

  3. बर्गर, पीजा, कोक के आगेदूध, दही, मक्खन को खाये !कान्हां की बंसी फीकी हैराधा को मोबाइल भाये !इन्टरनेट में शादी हो पर, रहे उम्र भर प्यारतब समझो आया है सच्चा, फागुन का त्यौहारwah wah.

  4. 'बर्गर, पीजा, कोक के आगेदूध, दही, मक्खन को खाये !कान्हां की बंसी फीकी हैराधा को मोबाइल भाये ! 'वाह! क्या बात है! फागुनी कविता,बहुत बढ़िया !

  5. देवेन्द्र जी इतन सुंदर, प्रेरक, गेय, फाग गीत मैंने नहीं पढा है। अपको सलाम!!असाधारण शक्ति का पद्य। वैचारिक ताजगी लिए हुए रचना विलक्षण है।

  6. बहुत ही सुन्दर भाव और अभिव्यक्ति के साथ आपने शानदार रचना लिखा है! बधाई!

  7. फागुन की इंतेज़ार का मज़ा भी लाजवाब होता है …. खूबसूरत गीत है फाग का …. हमारी तरफ से भी मुल्हाइज़ा फरमाएँ …. दिल ही दिल में उतर रहे हों चंचल नैन कटार तब समझो आया है सच्चा, फागुन का त्यौहार

  8. भंग-रंग पर कभी चढ़े ना, महंगाई की मार——— भला है कि अभी बनारसी भंग पर महगाई की मार नहीं चढ़ी है बर्गर, पीजा, कोक के आगेदूध, दही, मक्खन को खाये !कान्हां की बंसी फीकी हैराधा को मोबाइल भाये !———– सही कहा है , नयी चीजों में फागुन कम असरदार थोड़े ही है ! …आभार !

  9. इन्टरनेट में शादी हो पर, रहे उम्र भर प्यारतब समझो आया है सच्चा, फागुन का त्यौहारबहुत सुंदर जी, मजेदार

  10. जले होलिका भेदभाव की, आपस में हो प्यार तब समझो आया है सच्चा, फागुन का त्यौहारसुंदर रचना ।

  11. चंद पंक्तियों ने बहुत कुछ कह दिया, सुन्दर प्रस्तुति. रंगारंग होली की शुभकामनाये !

  12. जोरदार और जानदार रचना..अगर ऐसा हो तो सच में होली यादगार होगी…खूबसूरत और बढ़िया अंदाज़े-बयाँ बधाई देवेन्द्र जी..हो सका तो होली मुबारक मिल कर देंगे….बनारस में ही..

  13. इन्टरनेट में शादी हो पर, रहे उम्र भर प्यारतब समझो आया है सच्चा, फागुन का त्यौहारक्या बात है बिलकुल आज के नब्ज़ पे हाथ रख दिया…सुन्दर रचना…

  14. "do patan ke Bich" par aane ke liye shukriya. main apke sujhaw par nishchit rup se vichar karunga…. Banaras se mera vishesh lagawa rah hi… apke bare me jankar bahut kushee huee.sadhnyawadRanjit(A Gold Medalist allumini of BHU Varanasi)

  15. अपने सोए भाग जगाएँदुश्मन को भी गले लगाएँजहाँ भड़कती नफ़रत-ज्वालावहीं प्रेम का दीप जलाएँभंग-रंग पर कभी चढ़े ना, महंगाई की मारतब समझो आया है सच्चा, फागुन का त्यौहार. सही बात है हमारे हौसले ऐसे ही होने चाहिये । हर मुश्किल से बेखबर होली के रंग जैसे बधाई इस रचना के लिये

  16. बर्गर, पीजा, कोक के आगेदूध, दही, मक्खन को खाये !कान्हां की बंसी फीकी है राधा को मोबाइल भाये ! इन्टरनेट में शादी हो पर, रहे उम्र भर प्यार तब समझो आया है सच्चा, फागुन का त्यौहारmaza aa gaya is rang ko padh ,umag dooguni ho gayi is tyohaar ki .

  17. इन्टरनेट में शादी हो पर, रहे उम्र भर प्यार तब समझो आया है सच्चा, फागुन का त्यौहारहोली की मंगलमयता को दिया गया यह नया दायित्व अद्भुत है ! अच्छा लगा !

  18. बर्गर, पीजा, कोक के आगेदूध, दही, मक्खन को खाये !कान्हां की बंसी फीकी हैराधा को मोबाइल भाये !इन्टरनेट में शादी हो पर, रहे उम्र भर प्यारतब समझो आया है सच्चा, फागुन का त्यौहारहोली के बहाने बड़ा तीखा व्यंग्य है।बधाई!

  19. तब समझो आया है सच्चा, फागुन का त्यौहारबढ़िया कविता , उत्तम विचार से सजी-धजी.कुल मिला कर सच्चा फागुन तो प्रकृति है वर्ष ही लेकर आती है, पर हम क्षुद्र स्वार्थियों ने उसके सच्चे पन को भी आज कटघरे में खड़ा कर दिया…………….होली पर आपको हार्दिक शुभकामनाएं.चन्द्र मोहन गुप्त

  20. होली मैं छिपा सही अर्थ आपने कविता के माध्यम से शूट सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया है |बधाई आशा

  21. फागु की भीर, अभीरिन ने गहि गोविंद लै गई भीतर गोरीभाय करी मन की पद्माकर उपर नाई अबीर की झोरीछीने पीतांबर कम्मर तें सु बिदा कई दई मीड़ि कपोलन रोरी।नैन नचाय कही मुसकाय ''लला फिर आइयो खेलन होरी।“

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