तू है कौन, कौन हैं तेरे

आज रविवार है. कविता पोस्ट करने का दिन. मार्च ..वित्तीय वर्ष का अंतिम महिना, बच्चों की परीक्षा और उसपर चैत की मस्ती. अपने ‘नववर्ष’ के आगमन की आहट भी पुलकित कर दे रही है मन को. माँ दुर्गा की पूजा, नवरात्री का मेला और नव दिन का व्रत. गेहूँ की लहलहाती सुनहरी फसलें, आम के बौर में दिखते छोटे-छोटे टिकोरे और…और भी बहुत कुछ जो इस वक्त याद नहीं आ रहा. एक यह नववर्ष है और एक वो …हाड़ कंपा देने वाली ठंड वाला…! अरे, अपने देश के लोगों ने अपने मौसम के खूबसूरत पलों को नववर्ष और त्योहारों के लिए चुना, अंग्रेजों ने अपने मौसम के अनुसार. हम उनकी नक़ल करने के चक्कर में अपनी अच्छाईयों, अपने आनंद और अपने नववर्ष को क्यों भूलें..!


आज मन कुछ आध्यात्मिक हो रहा है . मैंने भी नवगीत की तर्ज पर एक भजन लिखा है जिसे आज पोस्ट करता हूँ . आपकी प्रतिक्रिया मुझे राह दिखाती है . प्रस्तुत है भजन ……

तू है कौन, कौन हैं तेरे

ताल-तलैया पी कर जागा
नदी मिली सागर भी मांगा
इतनी प्यास कहाँ से पाई
हिम से क्यों मरूथल तक भागा

क्यों खुद को ही, रोज छले रे
तू है कौन, कौन हैं तेरे

सपनों को अपनों ने लूटा
एक खिलौना था जो टूटा
छोड़ यहीं सब झोला-झंखड़
चल निर्जन में यह जग झूठा

भज ले राम, राम हैं तेरे
तू है कौन कौन हैं तेरे

घट पानी का पनघट ढूँढ़े
भरे लबालब मद में डूबे
सर चढ़ कर जब लगे डोलने
ठोकर खाए खट से फूटे

जो संभले वो पार लगे रे
तू है कौन कौन हैं तेरे।

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44 thoughts on “तू है कौन, कौन हैं तेरे

  1. घट पानी का पनघट ढूँढ़ेभरे लबालब मद में डूबेसर चढ़ कर जब लगे डोलनेठोकर खाए खट से फूटेबहुत अच्छी कविता।

  2. bahut uttam prastuti.घट पानी का पनघट ढूँढ़ेभरे लबालब मद में डूबेसर चढ़ कर जब लगे डोलनेठोकर खाए खट से फूटेजो संभले वो पार लगे रेतू है कौन कौन हैं तेरे।padh kar anand aya, aur bhajan likhen.

  3. ये अंदाज़ भी खूब रहा देवेन्द्र जी…आप हरफ़नमौला हैं सरकार।"घट पानी का पनघट ढूँढ़ेभरे लबालब मद में डूबेसर चढ़ कर जब लगे डोलनेठोकर खाए खट से फूटे"बहुत सुंदर पंक्तियाँ…

  4. मार्च का अंतिम महिना, ???? भाई कुछ समझ नही आया ??आप की रचना बहुत सुंदर लगी, बहुत सुंदर भाव.धन्यवाद

  5. बहुत सही बात कही १६ तारीख से नव वर्ष की शुरुवात हो रही है पर आज के लोगों में से कितने ही लोगों को ये पता भी नहीं होगा अंतिम पंक्तियाँ बहुत अच्छी लगीं घट पानी का पनघट ढूँढ़ेभरे लबालब मद में डूबेसर चढ़ कर जब लगे डोलनेठोकर खाए खट से फूटेजो संभले वो पार लगे रेतू है कौन कौन हैं तेरे।

  6. बहुत अच्छी रचना .यहाँ कोई अपना नहीं है ,सब अकेले हैं ,अपनी अपनी दुनिया में हेर कोई खोया है .मगर एक विडंबना है की हर कोई दूसरे से कुछ पाने की आस लगाए रहता है.यह संसार तब छूट जाता है जब मन का यह मेरा-तेरा भ्रम छूट जाता है.इसे छोडकर कहीं जंगल या किसी एकांत जगह जाने की कोई आवश्यकता नहीं है.

  7. सपनों को अपनों ने लूटाएक खिलौना था जो टूटाछोड़ यहीं सब झोला-झंखड़चल निर्जन में यह जग झूठा.वाह बहुत सुन्दर भजन है। बधाई।

  8. ताल-तलैया पी कर जागानदी मिली सागर भी मांगाइतनी प्यास कहाँ से पाईहिम से क्यों मरूथल तक भागाक्यों खुद को ही, रोज छले रेतू है कौन, कौन हैं तेरे..kya kamal ki rachna hai..!

  9. बहुत सुन्दर और भावपूर्ण रचना! इस बेहतरीन पोस्ट के लिए बधाई!

  10. वाह…..देवेन्द्र जी जैसे आपकी कवितायेँ लाजवाब होती है भजन भी कहीं जगह नहीं छोड़ता ……बहुत खूब …..!!शायद खुली खिडकियों की ताज़ी हवा का करिश्मा हो …..!!

  11. बहुत खूब… नव संवत्सर 2067 व नवरात्रों की हार्दिक शुभकामनाएं |

  12. चित्र मत हटाइये…ब्लॉग भले ही एकाध मिनट देरी से खुले..पर इस चित्र को एक नजर ठहर के देखते हैं हम….हमें कोई जल्दी नहीं होती..कमेन्ट करके भागने की….बाकी बात भजन से पहले..बच्चों की परीक्षाओं की…उनकी कामयाबी के लिए दुआ करते हैं…जो संभले वो पार लगे रेतू है कौन कौन हैं तेरे।ये दो लाइनें…हमारे लिए भी..बच्चों के लिए भी……

  13. घट पानी का पनघट ढूँढ़ेभरे लबालब मद में डूबेBahut hi umdaaaaaaaaah likha hai aapne!!Regards,Dimplehttp://poemshub.blogspot.com

  14. जीवन में कभी-कभी आध्यात्मिक होना ज़रूरी हो जाता है…और कभी जान कर भी पलायन कर लेना चाहिये….सुन्दर भजन…"प्रणव सक्सैनाamitraghat.blogspot.com

  15. लगता है, बार-बार गुजरा हूं इन पंक्तियों से। दोपहर के बाद के घाट जैसी अनुभूति। शुद्ध, शांत और सत्य।

  16. अच्छा है भाई!घट पानी का पनघट ढूँढ़ेभरे लबालब मद में डूबेसर चढ़ कर जब लगे डोलनेठोकर खाए खट से फूटेजो संभले वो पार लगे रेतू है कौन कौन हैं तेरे।गूढ़ व्यंजना है। बधाई!

  17. एक नया रंग नजर आया इस बार..और क्या खूब नजर आया..जैसे कि हर रंग के कुशल चितेरे हैं आप..और रचना को नये स्तर पर ले जाते हैं हर बार..इन पंक्तियों पर पहले भी कई बार रुका कि कुछ कहना संभव नही लगा..और इस बार भी बड़ी देर ठिठका रहाघट पानी का पनघट ढूँढ़ेभरे लबालब मद में डूबेसर चढ़ कर जब लगे डोलनेठोकर खाए खट से फूटेकितनी दूर तक जाती हैं यह पंक्तियां और इसके भाव..एक जलहीन प्यासे घट का पनघट से वही संबंध होता है जो आत्मा का ईश्वर से होता है..मगर जल पा कर वही घड़ा जल के मद मे पनघट से कितनी जल्दी विमुख हो जाता है..मगर यह नही जानता वह कि यह जल उसका अपना नही है..वह मात्र वाहक है..वैसे तो खाली घड़े सर पर कम ही चढ़ाये जाते हैं..मगर सरचढ़ा घड़ा जब मदमत्त हो कर डोलता है..तो समझिये उसका अंतकाल आ गया..यह शरीर भी बस मिट्टी का खाली घड़ा है बस!घर-मंदिर मे गाने लायक है यह भजन!!नवसंवत्सर की हार्दिक शुभकामनाएं व बच्चों की परीक्षाओं की शुभेच्छा सहित!!

  18. दूजी किस्म की अभिव्यक्ति, एक अलग ही रंग ! तू है कौन, कौन है तेरे.. की प्रतिध्वनि लगातार गूंज रही है कानों में ! आभार प्रविष्टि के लिए ।

  19. सपनों को अपनों ने लूटाएक खिलौना था जो टूटाछोड़ यहीं सब झोला-झंखड़चल निर्जन में यह जग झूठाबात तो आपकी सही है … ये जाग झूठा है … पर अगर निर्जन में भी मन न माना तो क्या होगा ….बहुत अच्छा लिखा है …

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