टिकोरे

डाल में आ गए जब टिकोरे बहुत

बाग में छा गए तब छिछोरे बहुत
पेंड़ को प्यार का मिल रहा है सिला
मारते पत्थरों से निगोड़े बहुत
धूप में क्या खिली एक नाजुक कली
सबने पीटे शहर में ढिंढोरे बहुत
एक दिन वे भी तोड़े-निचोड़े गए
जिसने थैले शहद के बटोरे बहुत
वक्त पर काम आए खच्चर मेरे
हमने रक्खे थे काबुल के घोड़े बहुत
फूल खिलने लगे फिर उसी ‌शाख में
आंधियों ने जिन्हें कल हिलोरे बहुत

Advertisements

50 thoughts on “टिकोरे

  1. वक्त पर काम आए खच्चर मेरेहमने रक्खे थे काबुल के घोड़े बहुतफूल खिलने लगे फिर उसी ‌शाख मेंआंधियों ने जिन्हें कल हिलोरे बहुतयथार्थ।बहुत सुन्दर लिखा है देवेन्द्र जी ।

  2. संवेदनशीलता ,अभिव्यक्ति की सहजता और आम फहम जीवन से उठाये गए चिर परिचित बिम्बों के जरिये जीवन के मार्मिक यथार्थों /श्लेष की प्रस्तुति तो कोई आपसे सीखे ….

  3. धूप में क्या खिली एक नाजुक कलीसबने पीटे शहर में ढिंढोरे बहुतBahut sahaj saral abhivyakti! Wah!

  4. वक्त पर काम आए खच्चर मेरेहमने रक्खे थे काबुल के घोड़े बहुत …देवेन्द्र जी … ग़ज़ब के शेर कहे हैं .. ताज़ा तरीन … आप ग़ज़ल ली कला में भी माहिर हैं ….

  5. देवेन्द्र जी, बहुत बढ़िया रचना है आपकी। हमें तो एक पंजाबी गाने की याद आ गई "केड़ा जाऊ खेड गुलाली, आ गये जदों बाग विच माली" यानि बागों के रखवाले आ जायें तो फ़िर कौन गुलेलों से बदमाशी करेगा? बात आपकी भावनाओं से शायद संबद्ध न हो, पर टिकोरे बचाने के लिये भी सजग रहना जरूरी है, यह हमें समझना चाहिये। बाकी, आपकी रचना की हर पंक्ति जानदार रही।आभार।

  6. टिकोरे का मतलब खूब समझ नही आया..मगर आपकी ग़ज़ल पढ़ी तो लगा कि बाग मे बसंत के मौसम मे डालों पर पायी जाने वाली कोई अच्छी चीज होती होगी..जिसमे छिछोरों को काफ़ी रुचि रहती होगी..हर शेर का अपना अंदाज रहा है..आपकी खास चुटीली शैली मे..हालांकि काफ़िया कुछ लड़खड़ाया लगा है कहीं पर..और पहला शेर तो खूबसूरत है ही..यह शे’र भी..सरल शब्दों मे गहरी बातवक्त पर काम आए खच्चर मेरेहमने रक्खे थे काबुल के घोड़े बहुत अपनी जिंदगी अक्सर काबुल के घोड़ों को ही खरीदने और खिलाने मे गुजर जाती है..जबकि ज्यादातर मुकामों पर खच्चरों से ही काम चलता है..और धूप मे एक कली के खिलने का शहर मे खबर बनना गहरे निहितार्थ लिये है…

  7. बहुत ख़ूबसूरत भाव और अभिव्यक्ति के साथ आपने शानदार रचना लिखा है जो काबिले तारीफ़ है! बधाई!

  8. अपूर्व भाई-टिकोरे का अर्थ मैने इसलिए नहीं लिखा कि मैं समझता था कि इससे सभी परिचित होंगे। ओह.. मैं गलत था। यहाँ तो कच्चे आम को 'टिकोरे' कहते हैं। इस वक्त आम के शाख पर बौर की जगंह अनगिनत छोटे-छोटे कच्चे आम निकल आए हैं.. थोड़े बड़े होते ही किशोर लड़के हाथों में गुलेल ले इसे तोड़ने आ जाते हैं बाग का माली उन्हें लाठी ले कर दौड़ाता है. अपने बचपन से यही दृश्य देख रहा हूँ। गज़ल एक कठिन विधा है। इस विधा में लिखने में हाथ-पांव फूल जाते हैं। भाव आ गए तो जबरदस्ती लिख दिया। जानता हूँ कि त्रुटी है मगर सुधारने के चक्कर में भाव गड़बड़ा जा रहा है। भाव का मजा लीजिए। कहीं-कहीं बोलचाल की भाषा में ड़ को भी र बोलते हैं इस दृष्टि से काम चला लिया है।

  9. Hello :)Firstly, thanks a lot for your comments on my blog.Now, coming to your composition:Good work done 🙂 It shows the depth in your thoughts. You have projected it brilliantly.Regards,Dimplehttp://poemshub.blogspot.com

  10. गूगल से ले कर एक चित्र भी लगा दिया। यह पहले ही लगा दिया होता मगर मैं ऐसा चित्र खोज रहा था जिसमें किशोर वय के लड़के पत्थर मार कर टिकोरे तोड़ रहे हों मगर नहीं मिला।

  11. अरे वाह-वाह देवेन्द्र जी…वाह-वाह! एकदम अनूठा। मुँह में पानी आ गया…दाँत "कोत" हो गये मतले को पढ़कर।"वक्त पर काम आए खच्चर मेरेहमने रक्खे थे काबुल के घोड़े बहुत"इस शेर का इशारा, अंदाज़े-बयां पे बिछ गया हूँ।

  12. टिकोरे क्या कैरी को कहते है या आम को ।प्यार का सिला पत्थरो से ही मिलता है ""मै जिसके हाथ में इक फूल देके आया था उसी के हाथ का पत्थर मेरी तलाश में है ""घोड़े या खच्चर जो भी हों वक्त पर काम आजाये वही है अपना | कुछ घोड़े काबुल जा रहे थे उनमे एक खच्चर भी था किसी ने उससे पूछा कहाँ जा रहे हो तो खच्चर ने कहा ""हम सब " घोड़े काबुल जा रहे हैं ।Brij

  13. आम के पेड़ पर लदे टिकोरे का चित्र और उसके साथ यह सुंदर रचना पढ़कर मजा आ गया। आभार।

  14. वाह देवेन्द्र जी,दो दिन पहले आंधी आई थी मैंने सोचा की टिकोरे ले आऊं कुछ पना और चटनी हो जाए.पर बाज़ार से तो टिकोरे गायब थे.आज पता चला की वो सब तो आप के छिछोरे ले गए थे रही बात घोड़े और खच्चर ki तो आप के पास तो दोनों हैं. हम ख्वाब से ही काम चलते हैं,pr ये जरुर है की जब ख्वाब ही देखना हो तो खच्चर का क्यों काबुली घोड़ों का क्यों नहीं.आप की पोस्ट बहुत अच्छी लगी बहुत गहरे भाव छुपे हैं हर पंक्ति में जितनी आसान और सीधी दिख रही है उतनी है नहीं.इस बेहतरीन प्रस्तुती पर बधाई

  15. वाह वाह देवेंद्र जी आप ने बहुत अलग सी कविता लेकिन बहुत सुंदर कही ,ाप ने इस कविता के माध्यम से बहुत कुछ कह दिया बहुत अच्छि लगी धन्यवाद

  16. हुजूर , आत्मा को इतना भी बेचैन मत कीजिये !.@ अपूर्व जी और शेर-शास्त्री जी. राजरिशी जी ,जब लिखने वाले ने अपनी रचना को गजल या शेर का पैराहन नहीं पहनाया है तो आप लोग गजलिया 'मूड' में क्यों देख रहे हैं कविता को ?जहां कहीं तुकबंदी दिखे वहाँ रदीफ़-ओ-काफिया के भाव देखे जांय , यह आवश्यक नहीं है ..लोक लय में जाइए और देखिये कि सीधे सीधे कैसे भावानुसार लय अपने गायन का और उवाच का रास्ता अख्तियार करती है ! लोक – लय अपने आप में पूर्ण है !यहाँ बेचैन आत्मा ( नाम नहीं पता , इसलिए यही लिख रहा हूँ ) जी की कविता में पूर्वी उत्तर प्रदेश की नौटंकी की 'तर्ज' दिखी हमें ( जरूरी नहीं कि लिखने वाले के दिमाग में लिखते समय यह तर्ज रही हो क्योंकि तर्जें अवचेतन में भी धंसी रहती हैं और कभी कभी हम ही वह गुनगुना जाते हैं जिसपे लय-विचार का सचेत चिंतन नहीं रहता ) इस तर्ज को बचपन में नौटंकी में चुप-छुप-लुकके सुना हूँ , जहां अंत के शब्द पर नगारा 'ढम्म' से तीन बार बजता है , और चुटकी का भाव ध्वनि से भी संप्रेषित होता है ! इस कविता को लोक तर्ज में देखना ज्यादा समीचीन होगा ..आप लोग गजल के शिल्प के कमाल के पारखी हैं पर लोक लय की उपेक्षा भी नहीं होनी चाहिए , आपको यह कार्य भी देखना होगा , आप सब ब्लोगिंग को संस्कार दे रहे हैं इसलिए आपसे ज्यादा जिम्मेदारी की दरकार रहती है …ठीक लगे तो गौर कीजिएगा नहीं तो आत्मात्मक बेचैनी समझ कर 'किनरिया' दीजिएगा ..आभार ,,,

  17. "किनरिया " काहे दिया जाय ,भाई अमरेन्द्र, हमहू अवधी भाषा केर जानकार हई,हमहू देखेल है नौटंकी गावें में भैया लोगों के साथ छुप-छुप के ,,पाण्डेय जी की इ लोक कविता बहुत कुछ बचपने मेंपहुंचा दिएअल हई,बहुत कुछ याद आ गया , कईसे आम तोड़ -तोड़ के पूरा बाग़ तहस -नहस कर दिए रहा ,और बहुत कुछ …."एक ही बात कहना चाहूंगी ,जिसने गाँव नहीं देखा उसने कुछ नहीं देखा हिंद्स्तान की आत्मा गाँव में ही है."सच्ची" …………..

  18. "वक्त पर काम आए खच्चर मेरेहमने रक्खे थे काबुल के घोड़े बहुतफूल खिलने लगे फिर उसी ‌शाख मेंआंधियों ने जिन्हें कल हिलोरे बहुतयथार्थ।बहुत सुन्दर लिखा है देवेन्द्र जी ।"mai bhi bas ye hi kehna chaahta hoo!kunwar ji,

  19. फूल खिलने लगे फिर उसी ‌शाख मेंआंधियों ने जिन्हें कल हिलोरे बहुतJiwan ka yatharth yahi hai….Bahut arthpur rachna..Haardik badhai

  20. आपकी रचनाएँ पहले भी पढ़ चुकी हूँ. सब्से खूबसूरत इनका सरल और सहज होना है. शेष, मैं अमरेन्द्र जी की बात से सहमत हूँ, लोक लय इस रचना की विशेषता है.

  21. बहुत बेहतरीन बिम्बो का इस्तेमाल किया है आपने इस गज़ल मे और काबुल के घोड़ों का तो जवाब नहीं । बहुत सटीक व्यंग्य है ।

  22. डाल में आ गए जब टिकोरे बहुतबाग में छा गए तब छिछोरे बहुतऔर फिर ऐसा छिछोरापन करने का जी करने लगा उसका क्या.आह से वाह तकआह इसलिये क्योकि हम अब वंचित हैं वाह इसलिये क्योकि रचना अत्यंत सुन्दर है

  23. पाण्डेय जी डाल में आ गए जब टिकोरे बहुतबाग में छा गए तब छिछोरे बहुत……….उफ़ क्या मतला निकाला है हुज़ूर ने फूल खिलने लगे फिर उसी ‌शाख मेंआंधियों ने जिन्हें कल हिलोरे बहुत……….कमल का शेर कह दिया………सैकड़ों दाद क़ुबूल करें…..शानदार प्रस्तुति के लिए हार्दिक आभार

  24. कितनी सरल भाषा और कितनी गहरी सोच…आपकी ग़ज़ल पढकर लगता है कि शब्दों का भारी भरकम होना आवश्यक नहीं, विचारों की गहराई महत्वपूर्ण है..

  25. टिकोरे का अर्थ स्पष्ट करने के लिये शुक्रिया..कुछ नया जानने को मिला..और अपने इधर के आम के बाग और हाथ के पत्थर याद आ गये….और अमरेंद्र जी की बात से पूरी तरह सहमत..और नगाड़े की यह तीन ’धम्म’ हमारे जेहन मे भी गाहे-बगाहे बज जाती हैं जब तब..हालाँकि नौटन्की मे उतनी रुचि नही जगा पाया..मगर.

  26. पेंड़ को प्यार का मिल रहा है सिलामारते पत्थरों से निगोड़े बहुतबहुत खूबसूरती से लिखा है…बहुत खूब

  27. लोक रंग में रंगी इस रचना का आभार ! इसकी सबसे बड़ी विशेषता ही इसका लोक-रंग-पगना है ! लोक-लय की मोहक रचना ! आभार ।

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s