कार्यालय

कार्यालय में सो रहा है कुत्ता
बकरियाँ आती हैं
बाबुओं के सीट के नीचे
सूखे पान के पत्तों को चबाकर
चली जातीं हैं
अधिकारी आते हैं और चले जाते हैं
लोग आते हैं और चले जाते हैं
काम नहीं होता।

वह कुछ नहीं होता जो होना चाहिए।

अधिकारी है तो बाबू नहीं होता
बाबू है तो अधिकारी नहीं होता
दोनों हैं तो फाइल नहीं होती
फाइल है तो मूड नहीं होता
मूड है‍, फाइल है, बाबू है, अधिकारी है,
तब वह नहीं है जिसकी फाइल है
वह नहीं है तब कुछ नहीं है।

सब कुछ होना और काम होना
संभावना विग्यान का शिखर बिन्दु है।

फाइल रूपी पिंजड़े में कैद हैं-
न जाने कितनी जिन्दगी-संवेदनाएं- आशाएँ।
लोग आते हैं-
कुशल बहेलिए की तरह पिंजड़ा खोल कर
बाबू फेंकता है चारा
सौभाग्य रूपी चिड़िया
मरने नहीं पाती।

बकरियाँ आती हैं
पान के पत्तों के साथ चबाकर चली जाती हैं
लोगों के ख्वाब।
कार्यालय में सो रहा है कुत्ता
उसके साथ सो रहा है-
देश का भविष्य।

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41 thoughts on “कार्यालय

  1. wah ! sarkaree karyalyo ka to aapne chittha hee sare aam badee sahajata se khol diya…………na jane kub insaniyat jagegeeaur files ke bhar tale sapne poore honge ek bada prashn chinh hai………………bahut sunder rachana…………..

  2. पढ़ कर आपकी ही एक पुरानी कविता याद आती है..और याद आता है किसी उपनगर/कस्बे का कोई औंघाता हुआ सा सरकारी ऑफ़िस..जिसका पूरा चित्र कविता मे जीवंत हो जाता है..जहाँ कोई भी काम सरकारी प्रक्रिया का ’कोरम’ पूरा होने के अभाव मे कोमा मे चला जाता है..अब देखते हैं कि यह कुत्ता कब तक सोता रहता है वहाँ..

  3. 'सब कुछ होना और काम होनासंभावना विज्ञानं का शिखर बिन्दु है'क्या बात है …बहुत बढ़िया !

  4. कार्यालय में सो रहा है कुत्ताउसके साथ सो रहा है-देश का भविष्य।……….बहुत बढ़िया

  5. सही है. जो बेचारा इस लालफ़ीताशाही के पचड़े में पड़ा, वही जानता है दफ़्तर का काम-काज. वैसे सारे दफ़्तर एक जैसे नहीं होते, पर अधिकांश तो होते ही हैं. हमेशा की तरह आपकी कविता एकदम सीधी है…सीधे भीतर तक बेध देने वाला सीधापन.

  6. फाइल रूपी पिंजड़े में कैद हैं-न जाने कितनी जिन्दगी-संवेदनाएं- आशाएँ।लोग आते हैं-कुशल बहेलिए की तरह पिंजड़ा खोल करबाबू फेंकता है चारासौभाग्य रूपी चिड़ियामरने नहीं पाती।वाह जी वाह मज़ा आ गया. एक अच्छा करारा व्यंग, पर यही सत्य है क्या करें

  7. सरकारी दफ़्तर का खांचा खींच दिया है आपने …. चित्र बना दिया है …. और फिर देश का भविष्य … बहुत ग़ज़ब का अंत किया है रचना का …..

  8. फाइलों में दबी वेदना का सजीव चित्रण किया है आपने…एक अनुमान के अनुसार आज हमारे न्यायालयों में धूल खाती फाइलों को निबटाने में 320 वर्ष लगेंगे.. और सचिवालय जैसी जगहों पर तो बिना सिक्कों के व्हील चेयर और नोटों की बैसाखी के फैलें घिसटती ही नहीं..

  9. पांडे जी ऑफिस का बड़ा व्यावहारिक चित्र आपने अपनी कविता में खींच दिया…..कष्ट होता है इस व्यवस्था को देखकर……………!

  10. बकरियाँ आती हैंपान के पत्तों के साथ चबाकर चली जाती हैंलोगों के ख्वाब।कार्यालय में सो रहा है कुत्ताउसके साथ सो रहा है-देश का भविष्य।Dil dahal gaya!

  11. सटीक चित्रण सरकारी कार्यालय का….और आपके द्वारा किया गया सूक्ष्म अवलोकन प्रशंसनीय है…

  12. वाह देवेन्द्र बाबू ! आपने तो कमाल का चित्रण किया है ….एक लाजवाब रचना.मगर हँसी आने की जगह मेरा दिल द्रवित हो रहा है देश की दुर्दशा देखकर.

  13. वह कुछ नहीं होता जो होना चाहिए और वह सबकुछ होता है जो नहीं होना चाहिए ।एक है तो दूसरा नही दौनो है तो फ़ाइल नही ।जिन्दगी सम्बेदनायें आशायें फ़ाइल से जुडी होती है ।बाबू ,साहेब,फ़ाइल,कुत्ता ,बकरी , दफ़्तर इन्से जुडा हुआ देश का भविष्य ।बहुत अच्छी व्यंग्य रचना

  14. दोनों हैं तो फाइल नहीं होतीफाइल है तो मूड नहीं होतामूड है‍, फाइल है, बाबू है, अधिकारी है,तब वह नहीं है जिसकी फाइल हैकितने सहज शब्दों में आपने इतना तीखा व्यंग कर दिया ….तभी तो इतने बेचैन रहते है ……!!फाइल रूपी पिंजड़े में कैद हैं-न जाने कितनी जिन्दगी-संवेदनाएं- आशाएँ।कार्यालय में बैठ के आपका दिमाग इधर ही घूमता है लगता है ….सच जिनका इन फाइलों से पाला पड़ता है वही जानते हैं इनकी असलियत …..!!कार्यालय में सो रहा है कुत्ताउसके साथ सो रहा है-देश का भविष्य।इस कुत्ते की नींद में न जाने कितने जनों की आहें छिपी हों ……!!बहुत सुंदर ….बहुत खूब …..!!ओये होए …..!!

  15. Hey Bechain Aatma,Ek gambheer sandesh hasyaspad tareeke se!Sab jagah aisa nahin hai bandhu, Sarkari banko me padhaar kar dekhiye! Hum hain apki sewa mein tatpar!Han, pradesh sarkaro ke daftaron mein aaj bhi kutte sote hain!

  16. kyun aaina dikha rahe ho ?behatriin rachna isse behtar kataksh nahi ho sakta बकरियाँ आती हैंपान के पत्तों के साथ चबाकर चली जाती हैंलोगों के ख्वाब।कार्यालय में सो रहा है कुत्ताउसके साथ सो रहा है-देश का भविष्य।aapke sahyog ke liye shuk,r_gujaar hun

  17. सचमुच आप भी बड़े बेचैन ही हो….शायद इसलिए ये नाम आपने अपना रखा हो….मेरी समझ नहीं आया कि अपनी बेचैनी का क्या करूँ….और कैसे व्यक्त करूँ सो मैं भूत ही बन गया….बेचैन मैं भी हूँ और यह बेचैनी भी ऐसी कि किसी तरह ख़त्म ही नहीं होती….क्या करूँ…क्या करूँ….क्या करूँ….जो कुछ हमारे आस-पास घटता है, जिसमें कभी हम कर्ता भी होते हैं…कभी शरीक…कभी गवाह….किसी भी रूप में हमारी जिम्मेवारी…हमारी जवाबदेही ख़त्म नहीं होती….मगर हम लिखने वाले शायद कभी भी खुद को कर्ता नहीं मानते….और इस नाते कभी भी कसूरवार भी नहीं होते….जो कुछ होता है…किसी दूसरे के द्वारा…किसी और के लिए….होता है…लिखने वाले यह सब किसी और ग्रह से देख रहे होते हैं….उनका काम है देवताओं की तरह सब कुछ देखना और करूणा से आंसू बहाना….उनके आंसू बहते रहते हैं…बहते आंसुओं के बाईस वो खुद भी गोया देवता ही बन जाते हैं…..और पब्लिक द्वारा अपनी चरण-वन्दना करवाते हैं….पब्लिक को आशीष देते हैं और यह आश्वासन कि समय रहते सब ठीक हो जाएगा…ऐसा बरसों से चला आ रहा है और लेखक नाम की जात अपनी पूजा करवाती आत्मरति में मग्न है…इसको अपने लेखक होने का अहसास भले हो मगर उसके लेखन का औचित्य क्या है उसके लेखन में जनता-जनार्दन के लिए क्या भाव है….जनता उससे सचमुच जुडी हुई है कि नहीं…जिनको वो सरोकार कहते हैं….वो दरअसल किसके सरोकार हैं….और लेखक समुदाय के बीच जो तरह-तरह के गुट-समुदाय हैं और उनकी जो राजनीति है…वो किन सरोकारों और किस करुणा से अभिप्रेरित है…यह सब मुझे भी बेचैन करता है आत्मा तो मैं भी बेचैन हूँ मगर इस सबको बदलने के लिए कुछ कर पाने खुद को असमर्थ पाता हूँ सो वर्तमान से भूत हो गया हूँ…..मगर ऐसे सभी लोगों का मैं मित्र हूँ….जो सचमुच बेचैन हैं….और साथ ही सबके भले के लिए प्रयास रत भी….काश उपरवाला हम सबको इतनी बुद्धि भी दे पाता कि हम सब अपने अहंकार से बस ज़रा-सा ऊपर उठकर सोच पाते….सबके सुख के लिए अपने खुद के हितों की थोड़ी-सी बलि दे पाते.. हम सब अपनी आलोचना खुद कर पाते….सचमुच ही सबसे प्यार कर पाते….तब यह सब जो धोखेबाजी वाला ढकोसला हम सब रचते रहते हैं…यह प्रपंच हमें कभी करना ही ना पड़ता…..और इंसान नाम की यह चीज़ सचमुच एक भरोसे की चीज़ बन पाता…..हमने कुत्ते के नाम को आदमियों के बीच गाली बनाया हुआ है….अरे नहीं-नहीं तमाम जानवरों को ही हमने अपने बीच गाली बनाया हुआ है… मगर मैं एक भूत आज यह चुनौती सब आदमियों को देता हूँ कि है कोई माई का लाल जो दुनिया के किसी भी पशु से अपनी वफादारी की तुलना कर सके….प्रकारांतर से मैं यह कहना चाहता हूँ सबको पहले,ki एक सच्चा पशु तो बन कर दिखाए वह…..आदमी होने के लिए तो उसके बाद और भी मंजिलें तय करनी होंगी…..!!http://baatpuraanihai.blogspot.com/

  18. भारतीय सरकारी कार्यालय का आपने बहुत सही चित्रण किया है । व्यंग्य बहुत अच्छा है पर हकीक़त भी है ।ब्लॉग पर पधारकर टिपण्णी के लिए शुक्रिया ! इसी तरह आते रहिये, उत्साह बढ़ाते रहिये । आपने सही समझा, एक पूरा दिन मिल जाना सौभाग्य की बात है, मैं खुदको भाग्यवान समझता हूँ की मुझे इतनी अच्छी सहधर्मिणी मिली हैं, जो एक सम्पूर्णता ले मेरे जीवन में आयी है । वरना ….पूरा एक दिन नसीब होना मुश्किल होता है !कहीं सुबह तो कहीं दोपहर हासिल होता है !!

  19. "Insomnia" ( Anidra ) is a common disease. But unfortunately people sleep in govt offices.what's the solution?…Shall we send the files to their respective homes? Will they do justice with their jobs there?फाइल रूपी पिंजड़े में कैद हैं-न जाने कितनी जिन्दगी-संवेदनाएं- आशाएँ।…People are growing insensitive. Is this we call progress?aatma ko bechain kar dene wali saarthak post.ummeed hai issey padhkar bharat ke do chaar sapoot to jagenge hi !Dhanyawaad !

  20. बकरियाँ आती हैंपान के पत्तों के साथ चबाकर चली जाती हैंलोगों के ख्वाब।कार्यालय में सो रहा है कुत्ताउसके साथ सो रहा है-देश का भविष्य।क्या वास्तव चित्रण है दफ्तरों का । बेहतरीन ।

  21. बकरियाँ आती हैंपान के पत्तों के साथ चबाकर चली जाती हैंलोगों के ख्वाब।कार्यालय में सो रहा है कुत्ताउसके साथ सो रहा है-देश का भविष्य।…. badi sahajta se bina laag lapete aapne Daftaron ka sajeev chitran prastut kar diya…. karara vyang……..

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