नव गीत


रिश्तों के सब तार बह गए
हम नदिया की धार बह गए.

अरमानों की अनगिन नावें
विश्वासों की दो पतवारें
जग जीतेंगे सोच रहे थे
ऊँची लहरों को ललकारें

सुविधाओं के भंवर जाल में
जाने कब मझधार बह गए.

बहुत कठिन है नैया अपनी
धारा के विपरीत चलाना
अरे..! कहाँ संभव है प्यारे
बिन डूबे मोती पा जाना

मंजिल के लघु पथ कटान में
जीवन के सब सार बह गए.

एक लक्ष्य हो, एक नाव हो
कर्मशील हों, धैर्य अपरिमित
मंजिल उनके चरण चूमती
जो साहस से रहें समर्पित

दो नावों पर चलने वाले
करके हाहाकार बह गए.

(लघु पथ कटान =shortcut roots , चित्र गूगल से साभार.)



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‘घसियारिन’

सुबह-सुबह घाटी में उतरकर पहाड़ी नदियों के संगम तट पर बैठा तेज बहती धाराओं की शिल्पकारी देखकर मंत्रमुग्ध हो रहा था कि सहसा दूर सैकड़ों फुट ऊँची घास से लक-दक लदी पहाड़ी की सपाट दीवार पर एक्शन फिल्म के पात्र सी दिख गयी, एक ‘घसियारिन’ .



यहाँ से वह इतनी ऊँचाई पर थी कि उसका एक हाथ से घास के मुट्ठे को पकड़ना, दूसरे हाथ से काटना और नटों की तरह संतुलन बनाये हुए दूसरी कम ऊँची पहाड़ी पर फेंक देना ही देखा जा सकता था. उसके नाक-नक्श यहाँ से नहीं दिख रहे थे किन्तु यह तय था कि वह गठीले ताम्र देह वाली बंदरों सी पहाड़ी पर उछलती घसियारिन, एक नवयौवना थी.


आदमी के लिए नारी का यौवन ही आकर्षण का केन्द्र बिंदु होने के लिए पर्याप्त होता है किन्तु इस निर्जन स्थान पर, घाघरा-चोली पहने उसका हैरतअंगेज ढंग से घास काटना ही मेरी धड़कन बढ़ाने का एकमात्र कारण था . अब गिरी तब गिरी कि संभावना से भयाक्रांत, घाटी के सम्पूर्ण सौंदर्य को विस्मृत कर, मैं अपलक उसे ही निहारने लगा….!


धीरे-धीरे मुझे विश्वास हो गया कि यह उसका दैनिक कर्म है. इसके हाथ-पांव इतने सधे ढंग से थिरकते हैं कि यह कभी गिर ही नहीं सकती . अब मेरे लिए कौतूहल का विषय यह था कि इतने ऊँचे खड़े पहाड़ की सपाट दीवार पर अपना संतुलन बनाये खड़ी यह गिलहरी, अपने ही द्वारा गिराये गये घास के ढेर तक कैसे पहुँचेगी ? कहीं किसी पहाड़ी गुफा में घुसकर आँखों से ओझल तो नहीं हो जायेगी !


विचारों की श्रृंखला में कुछ और भी विचार जुड़ने लगे. यूँ देखा जाय तो हर जगह पाई जाती हैं ‘घसियारिन’. अपने पूर्वी उत्तरप्रदेश के मैदानी इलाकों में, पश्चिम समुन्द्र तटीय गाँवों में, दक्षिण में या फिर हिमालय कि इन घाटियों में . मैं इनकी मेहनत की तुलना करने लगा और तुलनात्मक ढंग से यह निष्कर्ष निकाला कि सबसे कठिन होता है पहाड़ों का जीवन और सबसे मेहनती होती हैं पहाड़ों की स्त्रियाँ. भोर से रात तक पशुओं के चारे से लेकर शराबी पति के लिए रोटी-बोटी के प्रबंध में जुटी, दुरूह श्रम बड़े मनोयोग से करती रहती हैं. पीठ पर बोझ, माथे पर पसीना मगर होठों पर कभी खत्म न होने वाली मुस्कान. हवा का हल्का सा झोंका भी इन पहाड़ी कामकाजी स्त्रियों को ढेर सारी खुशियाँ दे जाता है.
इन पहाड़ी घाटियों में ऐसे स्थानों पर जहाँ जगह का फैलाव ज्यादा होता है, अपने ही द्वारा बहाकर लायी हुई गोल-सुडौल पत्थरों के छोटे-बड़े टुकड़ों में इन नदियों की धाराओं की शिल्पकारी देखी जा सकती है. इन पथरीले मैदानों में नदी की धाराएँ, कई भागों में विभक्त होकर बहने लगती हैं. बिखरने के क्रम में इन धाराओं की रफ्तार भी कम हो जाती है. जगह-जगह बन गये चौड़े-गहरे गड्ढों में पानी गहरा हो जाता है जहाँ मछलियाँ तैरती रहती हैं. इन मछलियों को तैरते देख कर ऐसा लगता है मानों स्वर्ग से उतरकर परियाँ जलक्रीड़ा में निमग्न हैं. आगे जाकर ये बिखरी धाराएँ पुनः एक स्थान पर, दक्षिण भारतीय सुहागन स्त्री की लम्बी वेणी की तरह गुंथकर, एक हो जाती हैं. एक होकर सर्पाकार नदी तेजी से मैदानी इलाकों की ओर भागने लगती है.


घाटियों में आवागमन की सुविधा के लिए लकड़ी या लोहे की चादरों को मोटे-मोटे तारों से बांधकर, दो ऊँची पहाड़ियों से जोड़ दिया जाता है. इस प्रकार एक स्थायी पुल का निर्माण हो जाता है जहाँ से लोग यदा-कदा, एक या दो की संख्या में गुजरते देखे जा सकते हैं.


अरे..! यह क्या…!! मैं विचारों की श्रृंखला में इतना निमग्न हो गया कि कौतुहल बनी अपनी ‘घसियारिन’ को ही भूल गया….!!! वस्तुतः मैं जान ही नहीं पाया कि कब और कैसे वह नीचे वाली पहाड़ी पर उतर गयी और शंकु के आकार की एक बड़ी सी टोकरी में घास के ढेर को भरकर, पीठ पर लादे, सर झुकाये, सधे हुए क़दमों से पुल पार करने लगी ! पुल से गुजरते हुए उसने मेरी ओर ऐसे उपेक्षा से देखा कि मानों मैं कोई ग्रासोफर हूँ और वह एक मेहनती चींटी .


मुझे लगा कि पहाड़ों का असली सौंदर्य तो इन पहाड़ी स्त्रियों के जिस्म से निकलने वाली पसीने की उन नन्ही-नन्ही बूदों में ही छुपा है जो पुल पर से गुजरते वक्त नदी की धारा में मिलकर कहीं गुम हो जाती हैं.

( चित्र गूगल से साभार )

बसंत……!

पढ़ने के दिन बीत गए
आया बच्चों का बसंत !

पतझड़ ज्यों बीते इम्तहान
लौटी है विस्मृत मुस्कान
मनमर्जी की रातें आईं
अब मुठ्ठी में सूरज महान

झूमें खुशियों से दिगंत
आया बच्चों का बसंत !

गर्मी की छुट्टी वाले दिन
ये कट्टी-मिठ्ठी वाले दिन
ना जाने कल किस ‘चाक’ चढें
ये कच्ची मिट्टी वाले दिन

कलकंठ के कलरव अनंत
आया बच्चों का बसंत !

क्यों हम भी इतने पाप करें
कुछ तो आतप के ताप हरें
इस कंकरीट के जंगल में
कुछ पौधे भी चुपचाप धरें

नाग नथैया करो कंत
आया बच्चों का बसंत !

तालमेल

कभी सोचा है ! एक अकेली सड़क को कितने लोग खोदते हैं ? टेलीफोन वाले, बिजली वाले, पानी वाले, सीवर वाले, ओवरब्रिज बनाने वाले, शादी के पंडाल वाले, रामलीला मैदान वाले, और भी बहुत से लोग जिन्हें मैं नहीं जानता . मजे की बात यह है कि एक खोदता है, मतलब साधता है और चल देता है, दूसरा खुदी हुई सड़क के बनने का इंतज़ार करता है कि कब बने और मैं खोदूँ ! किस्मत की मारी सड़क खुदाई तंत्र के दंश झेलती जिए जाती है यूँ ही सालों साल.

प्रसिद्द व्यंग कवि ‘बेढब बनारसी’ आजादी से पहले मिली अंग्रेज मेजर, “लंफटट पिगलस” की डायरी के माध्यम से लिखते हैं कि ‘बनारस की सड़कें ऐसी हैं, जिनपर खेती की जा सकती है’ !

आभागी सड़क ! तब से लेकर आज तक, बार-बार सुनती है उस माँ का श्राप, जिसका बच्चा गिरकर मर गया गढ्ढे में, उस दद्दू की गालियाँ, टूट चुकी हैं जिनकी टाँगे या फिर उन मोटर साईकिल वालों की मतरिया-बहनियाँ, जो गिरकर संभल जाते हैं अपनी किस्मत से .

यकबयक भरने लगे गढ्ढे, चलने लगे रोलर, गिरने लगे गिट्टियाँ, पिघलने लगे तारकोल तो खुशी के मारे उछल मत पड़ना कि अरे..! टेलीफून विभाग वाले जिस सड़क को खोदकर गए थे वह इतनी जल्दी बनने जा रही है ! दरअसल हुआ यों होगा कि सीवर के लिए पाईप बिछाने वालों ने फोन कर दिया होगा, सड़क बनाने वालों को कि जाओ, जल्दी अपना बज़ट बनाओ, माल खपाओ, हम आ रहे हैं सीवर लाईन के लिए पाईप बिछाने ! फिर ना कहना कि बताया नहीं ! लो जी, कर लो बात ! एक फसल कटी नहीं कि दूजी हो गयी तैयार ! इधर सड़क बनी नहीं, कालोनी वाले ‘मार्निंग वाक’ का मूड बना ही रहे थे कि आ गए सीवर वाले अपना ताम झाम लेकर !

शर्माजी की हालत देखते ही बनती थी. बिचारे मार्निंग वाक का सूट भी ले आये थे बाजार से ! बड़े अरमान से पहन कर निकले तो क्या देखते हैं कि सड़क पर बोर्ड टंगा है …”सावधान! आगे रास्ता बंद है . सीवर के लिए पाईप बिछाने का कार्य प्रगति पर है.” बोर्ड पढते ही शर्मा जी हत्थे से उखड़ गए. दिन भर पूरी कॉलोनी को माथे पर उठाए रहे.

“ये तो कोई बात नहीं हुई ! जो तुरंत खोदाई करनी थी तो बनायीं ही क्यों ? ये सरकारी विभाग वाले आपस में तालमेल क्यों नहीं करते ? जनता की गाढ़ी कमाई सरे आम बर्बाद कर रहे हैं !” मैंने सलाह दिया, “अरे, नाहक यहाँ चीखने से क्या होगा ? यदि आप वास्तव में अपनी बात सरकार तक पहुँचाना चाहते हैं तो अपने विधायक जी से इसकी शिकायत कीजिए. आखिर वो हैं किस मर्ज की दवा !”

शाम को शर्मा जी पान की दूकान पर पान घुलाये, मुहँ फुलाए, चुपचाप जुगाली की मुद्रा में बैठे दिखाई दिए. मुझे देखते ही पान यूँ थूका मानों ज्वालामुखी को फूटने के लिए इसी पल का इन्तजार था ! मैं हडबड़ा कर संभल गया वरना पान से मेरी पैंट लाल हो जाती ! फिर भी कुछ छींटे तो पड़ ही गए.

मैंने कहा, ” संभल के शर्मा जी, क्या बात है ? गए थे विधायक जी के पास ? क्या हुआ ?”

शर्मा जी छूटते ही बोले, ” आप भी न ! …कवियों के चक्कर में जो पड़ा समझो जलालत हाथ लगी ! विधायक जी उल्टे मेरा ही मजाक उड़ाने लगे. उनके गुर्गे मुझ पर ऐसे हंस रहे थे मानो दुनियाँ का सबसे मूर्ख आदमी मैं ही हूँ. ”

मैंने कहा, ” अरे शर्मा जी क्या हुआ ? कुछ तो बताइए !”

होना क्या था, विधायक जी मेरा मजाक उड़ाते हुए कहने लगे..” लो भाई, सुन लो, इतनी मेहनत से सीवर लगवाने का इंतजाम किया तो भाई लोग इसमें भी नुख्स निकालने लगे ! भलाई का तो जमाना ही नहीं रहा. कुछ दिन परेशानी सह लीजिए भाई साहब, पूरी जिंदगी मज़ा भी तो आप ही लेंगे.” मैंने उनको समझाया कि ठीक है, पाइप लाईन बिछा रहे हैं मगर थोड़ा सा तालमेल हो जाता तो सड़क बनाने का पैसा तो बच जाता ! लेकिन वो कहाँ सुनने वाले कहने लगे, ” आम खाईये, गुठलियाँ मत गीनिये ! ये तो राज-काज है. मैं भी क्या करता अपना सा मुँह लेकर चला आया.

अब शर्मा जी को कौन समझाए कि ये जो हो रहा है, ‘तालमेल’ से ही हो रहा है ! सरकारी विभागों में तालमेल इस बात तो लेकर नहीं होता कि कैसे राष्ट्र का धन अपव्यय होने से बचाया जाय ! हाँ, इस बात को लेकर जरूर हो सकता है कि ……………………………………………………

कभी सोचा है !

जब जागो तभी सबेरा

गर्मी से नींद उचट चुकी थी। अंधेरे में कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। बिजली कटी थी और इनवर्टर भी जवाब दे चुका था। प्यास के मारे बुरा हाल था। मोबाइल की रोशनी से फ्रिज खोल कर पानी की एक बोतल निकाला और खड़े-खड़े आधा पी गया। कुछ जान में जान आई। घड़ी देखी, रात के दो बज रहे थे। सोंचा, छत पर टहलते हैं!

मेरे घर की बाउंड्री से लगे पड़ोसी के सागवान, मेरे आंगन का आम और गेट के बाहर कॉलोनी की सड़क पर ‌’वन विभाग’ द्वारा रोपे गए ‘कंदब’ के वृक्ष स्तब्ध खड़े थे। शाखों का झूमना, पत्तियों का ताली बजाकर खुशी का इज़हार करना, स्वागत करना, हाल-चाल पूछना तो दूर था, मुझे देखकर भी, चुपचाप भकुवाए खड़े थे ! छत के एक कोने में मरे सांप की तरह पसरी बेला की एक लतर को, चाँदनी की धुंधली सी रोशनी में देखा– अधखिली कलियाँ सूख चुकी थीं। दूर-दूर तक फैले अंधियारे की नीरवता में, इन वृक्षों की काली आकृतियाँ, रह-रह कर भौंकते कुत्तों की आवाजें, झिंगुरों की झिन-झिन, नील गगन में छिटके तारे और दूर अधकटा पीला चाँद एक भयावह दृश्य उत्पन्न कर रहे थे।

टहलते-टहलते सोंचने लगा कि ये वृक्ष कितने असामाजिक हो चुके हैं ! न बोलना न बतियाना… चुपचाप खड़े रहना ! अनायास लगा कि कुछ कह रहे थे कटे चाँद से और सहसा मेरे आने की आहट सुन चुप हो गए। मैने सोंचा ये तो बताने से रहे, चाँद से ही पूछ लेते हैं। मेरे मन की बात जान चाँद ने बादलों की हल्की सुफेद चादर ओढ़ ली। मैने पूछा… कुछ तो कहो.. ये वृक्ष इतने खामोश क्यों हैं ? बादलों से निकलकर चाँद ने कहा- “ये मुझसे तुम्हारी और सूरज की शिकायत कर रहे थे। कह रहे थे, तुम तो इतने सुंदर हो, शीतल चाँदनी बिखेरते हो मगर दुष्ट सूरज आजकल दिनभर आग उगलता रहता है।” अब तुम्हीं कहो, जो खुद सूरज की रोशनी से चमकता हो, वह क्या ज़वाब दे! सूरज न हो तो मेरा क्या होगा जानते ही हो। ये भी तो मर जाएंगे बिना धूप के। इतना कहकर चाँद मौन हो मुस्कुराने लगा। मैने हंसकर पूछा, ” और मेरी… ? मेरी क्या शिकायत कर रहे थे ?” चाँद कुछ कहता कि अचानक हवा बहने लगी और वृक्षों में सरसराहट शुरू हो गई। आम, बेला, कदंब सभी एक स्वर में चीखने लगे। ठूंठ की तरह खड़े सागवान, हौले-हौले गरदन हिला कर उनकी बातों का समर्थन करने लगे।

सभी एक स्वर से चीख रहे थे- “तुम भी कम बदमाश नहीं हो ! हमें लगा कर छोड़ दिया सूरज की आग में जलने के लिए ? खुद तो हर घंटे पानी पीते हो और हमें प्यासा रख छोड़ा है ! जानते हो कल एक ‘बुलबुल’ प्यास के मारे तड़प-तड़प कर मर गई। पंछियों की चहचहाहट अच्छी लगती है मगर पानी का एक घड़ा रखना जरूरी नहीं समझते छत पर। फल-फूल और छाँव चाहते हो हमसे मगर यह नहीं समझते कि इन्हें भी प्यास लगती होगी गर्मी में। हम तुम्हारी निष्ठुरता से बहुत दुःखी हैं।

मुझे अपनी गलती का एहसास हुआ। दरअसल बिजली इतनी कम आती है कि सुबह-शाम जब भी घर में रहता, ‘बिजली आई’ देखते ही ‘समरसेबल’ चला कर पौधों को पानी देने के बजाय, कम्प्यूटर चलाने में ही व्यस्त हो जाता। अचानक इस बात का एहसास हुआ कि ब्लाग में संवेदना बिखेरते-बिखेरते खुद कितना संवेदनहीन हो चुका हूँ ! यह एक दुखद एहसास था। जिन पौधों-पंछियों से इतना प्यार करता था उनके प्रति इतना लापरवाह कैसे हो गया ! मुझे लगा कि इंसान को अपने शौक में इतना नहीं डूब जाना चाहिए कि वह इंसानियत ही भूल जाय। मैने सभी से क्षमा-प्रार्थना की और वादा किया कि कल से यह भूल नहीं होगी।

पंछियों की चहचहाहट से मेरा ध्यान भंग हुआ। मैने देखा, अंधेरा छंट चुका था। सुबह हो चुकी थी।