बसंत……!

पढ़ने के दिन बीत गए
आया बच्चों का बसंत !

पतझड़ ज्यों बीते इम्तहान
लौटी है विस्मृत मुस्कान
मनमर्जी की रातें आईं
अब मुठ्ठी में सूरज महान

झूमें खुशियों से दिगंत
आया बच्चों का बसंत !

गर्मी की छुट्टी वाले दिन
ये कट्टी-मिठ्ठी वाले दिन
ना जाने कल किस ‘चाक’ चढें
ये कच्ची मिट्टी वाले दिन

कलकंठ के कलरव अनंत
आया बच्चों का बसंत !

क्यों हम भी इतने पाप करें
कुछ तो आतप के ताप हरें
इस कंकरीट के जंगल में
कुछ पौधे भी चुपचाप धरें

नाग नथैया करो कंत
आया बच्चों का बसंत !
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31 thoughts on “बसंत……!

  1. गर्मी की छुट्टी वाले दिनये कट्टी-मिठ्ठी वाले दिनना जाने कल किस 'चाक' चढेंये कच्ची मिट्टी वाले दिनवाह,बचपन याद आ गया,बढ़िया रचना,धन्यवाद.

  2. बसन्त कहां जी, अब तो गर्मी आयी है। स्कूल वाले छुट्टियों में बच्चों को बसन्त का मजा ना देकर ढेर सारा होनवर्क देकर गर्मियों की खाज दे देते हैं।

  3. बच्चों कि गर्मियों की छुट्टियाँ सच ही बसंत जैसी लगती हैं…बहुत प्यारा गीत है

  4. ईर्ष्या हो रही है आपसे कि आप कविता में बचपना पुनः जी ले रहे हैं , हियाँ हम हैं कि आपसे कम में ही 'बूढ़'बनते जा रहे हैं ! फालतू ही आप अपने को बेचैन आत्मा लिखते हैं ! कुछ बच्चों को पढ़वाया की नहीं यह रचना ? इस रचना के असली हकदार वे ही हैं ! आभार !

  5. अच्छी कविता लेकिन थोड़ी देर से आयी।अभी तो कुछ ऐसा कहना पड़ेगा-आतप चहुँ ओर गहन बरसेरवि अनल झोंकते ऊपर सेलो सूखे ताल तलैया अबप्यासा फिरता यूँ दिग-दिगन्तदेखो बसन्त का हुआ अन्त

  6. हां ! ! ! बच्चों के लिये तो यह बसन्त ही है ! कविता अच्छी है !

  7. खूबसूरत सी कविता हमें भी अपने उस स्मृतिशेष वसंत की याद दिला गयी..जो कुछ समय पहले हमारा भी हमराह हुआ करता था..यह वो वसंत नही था जो मौसम के बदलाव के साथ खुद चला आता था…साल भर की कड़ी तपस्या और तमाम प्रार्थनाओं के साथ परीक्षा-रूपी ’आग के दरिया’ से सकुशल गुजर पाने के बाद ही इस वसंत का हरापन नसीब होता था..और किन साधना से प्राप्त यह गर्म दिन चुटकियों मे कपूर की भांति उड़ जाते थे..और फिर एक साल भर लम्बा इंतजार भारी बस्ते मे भर कर थमा दिया जाता था…मगर उन चंद गर्म और आम से रसीले और क्रिकेट से खिलंदड़े दिनों की कशिश वोह वक्त ही जानता है…नौकरीशुदा होने के बाद तो जिंदगी मे बस पतझड़ ही बाकी रही..हर मौसम बेमौसम :-)बड़ी प्यारी कविता जो बहुत हल्के और शरारती मूड मे शुरु होती है..मगर आगे बढ़ने के साथ ही गंभीर और बेहद सार्थक बातों को बस्ते से निकाल कर पेश कर देती है..और एक संदेश भी छोड़ जाती है जाते-जाते…सबसे बेहतरीन तो यह लगी…ना जाने कल किस 'चाक' चढेंये कच्ची मिट्टी वाले दिन सच….कच्ची मिट्टी वाले वो ’चाक’ पर चढ़े दिन याद रहते हैं..हमेशा….बहुत खूबसूरत!!

  8. गर्मी की छुट्टी वाले दिन ये कट्टी-मिठ्ठी वाले दिन ना जाने कल किस 'चाक' चढें ये कच्ची मिट्टी वाले दिन आह….मन मोह लिया इन पंक्तियों ने…कितना सच कहा है आपने….हृदयस्पर्शी,मुग्धकारी,अतिसुन्दर रचना….वाह !!!

  9. सशक्त रचना ! इस रचना का सौन्दर्य लुभा गया । क्या कहने इन पंक्तियों के -"गर्मी की छुट्टी वाले दिनये कट्टी-मिठ्ठी वाले दिनना जाने कल किस 'चाक' चढेंये कच्ची मिट्टी वाले दिन "कविता की शुरुआत से अंत तक प्रभाव निरख रहा हूँ ! बहलाती..फुसलाती..समझाती..संदेश देती कविता ! सामर्थ्य की पहचान है यह आपकी ।

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