बोझ



( यह कविता इस अवधारणा पर आधारित है कि मृत्यु यकबयक नहीं आती, यमराज ले जाने से पहले बार-बार सुधरने का मौका देते हैं )


अलसुबह
दरवाजे पर दस्तक हुई .
देखा..
सामने यमराज खड़ा है !

मारे डर के घिघ्घी बंध गई
बोला..
अभी तो मैं जवान हूँ
कवि सम्मेलनों का नया-नया पहलवान हूँ
आपको कोई दूसरा दिखा नहीं !
जानते हैं, मैने अभी तक कुछ लिखा नहीं।
क्या गज़ब करते हैं !
कवि क्या बिना लिखे मरते हैं ?

यमराज सकपकाया
मेरा परिचय जान घबड़ाया
मैं तुझे नहीं झेल सकता
नर्क में भी, नहीं ठेल सकता
मगर आया हूँ तो खाली हाथ नहीं जाऊँगा
अभी तेरे बालों की कालिमा लिये जा रहा हूँ
भगवान ने आदेश दिया तो फिर आऊँगा !

सुनते ही मैं खुश हो गया
सोचा वाह कितना अच्छा है कि कवि हो गया
बोला-
जा, ले जा, तू भी क्या याद करेगा !
मैं सफेद बालों से ही काम चला लूँगा
स्पेशल हेयर डाई लगा लूँगा।

कुछ वर्षों के बाद
दरवाजे पर फिर दस्तक हुई
खोला, देखा, काँप गया
वही यमराज खड़ा है भांप गया।

हिम्मत जुटा कर बोला-
आइये-आइये
मैंने दो-चार कविता लिखी है
सुनते जाइये
वह सुनते ही रोने लगा
मुझे लगा उसे भी कुछ-कुछ होने लगा।
दुःखी होकर बोला यमराज
मुझे माफ करना कविराज
मैं आना नहीं चाहता
मगर तेरी मौत यहाँ खींच लाती है
पता नहीं आदमी को पहचानने में
भगवान से बार-बार क्यों चूक हो जाती है !

मगर आया हूँ तो खाली हाथ नहीं जाऊँगा
इस बार तेरे आँखों की थोड़ी रोशनी ले जाऊँगा !

मैने कहा
जा, ले जा, मैं चश्में से काम चला लूँगा
मगर फिर आया तो अपनी सारी नई कविता तुझे सुना दूँगा
सुनते ही यमराज भाग गया
इस तरह मेरा भाग्य, फिर जाग गया।
कुछ वर्षों बाद वह फिर आया
अबकी बार मेरे दो दांत उखाड़ ले गया
मैंने तुरंत नकली दांत लगा लिया।

सोचता हूँ
फिर आया तो क्या करूँगा
कौन सा अंग दे उसे संतुष्ट करूँगा !

सोचता हूँ
अब आए तो उसके साथ चल दूँ
हाथ-पैर सलामत रहे तभी जाना अच्छा है
आज बेटा भी तभी तक प्यार करता है
जब तक छोटा बच्चा है।

सुना है
समाज में लाचार जिस्म
परिवार वालों के लिए बोझ होता है
अब कौन उसे ताउम्र प्रेम से ढोता है
उड़ने लगे गगन में रिश्ते जमीन से
डरने लगे प्रमोद अपने प्रवीन से।

सुना है
यहाँ पति, पत्नी को

पत्नी, पति को
भाई, भाई को
बेटा, बाप को धोखा देता है
किस्मत वालों को ही ईश्वर
सही सलामत जाने का मौका देता है।

सोचता हूँ
अब आये तो चल दूँ।

हाथ-पैर सलामत रहे तभी जाना अच्छा है
आज बेटा भी
तभी तक प्यार करता है
जब तक छोटा बच्चा है।


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48 thoughts on “बोझ

  1. असहायता को संबोधित,आशंकाओं को उकेरते हुए आपने एक अच्छी कविता लिखी है !और कवियों को एक बार फिर धोया गया 🙂

  2. wah kya bhagaya hai yamraj ko…….aisee bhee kya baat hai Devendraji jee jaan vhidkane wale parivar jano kee kamee nahee……..ha jaisa bote hai vaisa hee katne ko milta hai………sadbhavna banae rakhiye……sakaratmak soch hee sahee disha me le jatee hai varna………….Asahay to sabhee ek din mahsoos karte hai halat ke aage……..koi aaj to koi kal…….

  3. ati sundr he bhut bhut bdhaai ho kbhi ho ske to hmaaare blog akhtarkhanakela.blogspot.com ki daavt pr bhi aao hmen btaao ke nmk mirch msaalaa khaan kmi he shukriyaa. akhtar khan akela kota rajsthan

  4. आज उद्घाटित हुआ है देवेंद्र जी इस ‘बेचैन आत्मा” का रहस्य…मनुष्य की जीवन यात्रा की सच्ची तस्वीर दिखाई है आपने…यमदूत को भी अच्छी टोपी पहनाई है आपने…लेकिन यमदूत भी यमदूत होता है … आया है तो खाली हाथ नहीं जाता… अनोखी परिकल्पना!!

  5. देवेन्द्र जी , अच्छी मंचीय कविता लिखी है ।सामाजिक मुद्दों का अच्छा विवरण दिया है ।लेकिन अंत उम्र से आगे का लगता है ।अभी तो आप जवान ही हैं ना ।

  6. @-हाथ-पैर सलामत रहे तभी जाना अच्छा हैAbove line is a part of my daily prayer. I wish to live till i am capable of surviving on my own.Ishwar na kare kabhi dusron par nirbhar hona pade.Nicely written, Excellent poem !I wish you great health, black hair and an unfailing smile.

  7. विचार में डाल दिया आपने !कविता पढ़कर लगा , कि कुछ नहीं तो चालीस फीसदी तो मैं भी मर चुका हूँ , गचगच जीवन जीने के पहले ही ! ऊपर एक टीप में कवियों को 'धोये जाने' का जिक्र है , मुझे तो ऐसा नहीं लग रहा है , मुझे लग रहा है कि काव्य की सृजन-इच्छा और जीवनेच्छा के समान्तर क्रम में कविता का सुन्दर रचाव है ! आपकी यह कविता पढ़ते हुए ज्ञान जी की पोस्ट '' ख़तम हो लिए जीडी'' की याद आ गयी !

  8. लाजवाब…..!!तभी आपकी आत्मा बेचैन रहती है …..विचार अच्छा है …..हाथ -पैर मांगने से पहले चले जाना चाहिए ……( पती को पति कर लें )

  9. हंसाते हंसाते अंत में बहुत गंभीर कर दिया मसला आपने ! सोचने को मजबूर कर दिया आपकी इस रचना ने ! व्यथा के कारण दिल निकाल कर रख दिया है ! मगर अधिकतर घरों की सच्चाई है ! आपका पेज लोड होने में बहुत समय लगता है , शायद फोटो का साइज़ कम करने में यह असुविधा न हो …मुझे लगता है इस कारण आपकी सुंदर रचनाये कई बार बिना पढ़े रह जाती होंगी , आशा है कोई रास्ता निकालेंगे !

  10. समाज में लाचार जिस्मपरिवार वालों के लिए बोझ होता हैअब कौन उसे ताउम्र प्रेम से ढोता हैउड़ने लगे गगन में रिश्ते जमीन सेडरने लगे प्रमोद अपने प्रवीन से।क्या कहूँ पूरी रचना पर ही निशब्द हूँ बधाई।

  11. हास्य के साथ आपने रचना को अंत तक आते आते मर्म स्पर्शी बना दिया है…ये आपके लेखन के कौशल को दर्शाता है…मेरी बधाई स्वीकार कीजिये…नीरज

  12. जिन्दा लोगों की तलाश!मर्जी आपकी, आग्रह हमारा!!काले अंग्रेजों के विरुद्ध जारी संघर्ष को आगे बढाने के लिये, यह टिप्पणी प्रदर्शित होती रहे, आपका इतना सहयोग मिल सके तो भी कम नहीं होगा।=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=सच में इस देश को जिन्दा लोगों की तलाश है। सागर की तलाश में हम सिर्फ बूंद मात्र हैं, लेकिन सागर बूंद को नकार नहीं सकता। बूंद के बिना सागर को कोई फर्क नहीं पडता हो, लेकिन बूंद का सागर के बिना कोई अस्तित्व नहीं है। सागर में मिलन की दुरूह राह में आप सहित प्रत्येक संवेदनशील व्यक्ति का सहयोग जरूरी है। यदि यह टिप्पणी प्रदर्शित होगी तो विचार की यात्रा में आप भी सारथी बन जायेंगे।हमें ऐसे जिन्दा लोगों की तलाश हैं, जिनके दिल में भगत सिंह जैसा जज्बा तो हो, लेकिन इस जज्बे की आग से अपने आपको जलने से बचाने की समझ भी हो, क्योंकि जोश में भगत सिंह ने यही नासमझी की थी। जिसका दुःख आने वाली पीढियों को सदैव सताता रहेगा। गौरे अंग्रेजों के खिलाफ भगत सिंह, सुभाष चन्द्र बोस, असफाकउल्लाह खाँ, चन्द्र शेखर आजाद जैसे असंख्य आजादी के दीवानों की भांति अलख जगाने वाले समर्पित और जिन्दादिल लोगों की आज के काले अंग्रेजों के आतंक के खिलाफ बुद्धिमतापूर्ण तरीके से लडने हेतु तलाश है।इस देश में कानून का संरक्षण प्राप्त गुण्डों का राज कायम हो चुका है। सरकार द्वारा देश का विकास एवं उत्थान करने व जवाबदेह प्रशासनिक ढांचा खडा करने के लिये, हमसे हजारों तरीकों से टेक्स वूसला जाता है, लेकिन राजनेताओं के साथ-साथ अफसरशाही ने इस देश को खोखला और लोकतन्त्र को पंगु बना दिया गया है।अफसर, जिन्हें संविधान में लोक सेवक (जनता के नौकर) कहा गया है, हकीकत में जनता के स्वामी बन बैठे हैं। सरकारी धन को डकारना और जनता पर अत्याचार करना इन्होंने कानूनी अधिकार समझ लिया है। कुछ स्वार्थी लोग इनका साथ देकर देश की अस्सी प्रतिशत जनता का कदम-कदम पर शोषण एवं तिरस्कार कर रहे हैं।आज देश में भूख, चोरी, डकैती, मिलावट, जासूसी, नक्सलवाद, कालाबाजारी, मंहगाई आदि जो कुछ भी गैर-कानूनी ताण्डव हो रहा है, उसका सबसे बडा कारण है, भ्रष्ट एवं बेलगाम अफसरशाही द्वारा सत्ता का मनमाना दुरुपयोग करके भी कानून के शिकंजे बच निकलना।शहीद-ए-आजम भगत सिंह के आदर्शों को सामने रखकर 1993 में स्थापित-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास)-के 17 राज्यों में सेवारत 4300 से अधिक रजिस्टर्ड आजीवन सदस्यों की ओर से दूसरा सवाल-सरकारी कुर्सी पर बैठकर, भेदभाव, मनमानी, भ्रष्टाचार, अत्याचार, शोषण और गैर-कानूनी काम करने वाले लोक सेवकों को भारतीय दण्ड विधानों के तहत कठोर सजा नहीं मिलने के कारण आम व्यक्ति की प्रगति में रुकावट एवं देश की एकता, शान्ति, सम्प्रभुता और धर्म-निरपेक्षता को लगातार खतरा पैदा हो रहा है! अब हम स्वयं से पूछें कि-हम हमारे इन नौकरों (लोक सेवकों) को यों हीं कब तक सहते रहेंगे?जो भी व्यक्ति इस जनान्दोलन से जुडना चाहें, उसका स्वागत है और निःशुल्क सदस्यता फार्म प्राप्ति हेतु लिखें :-(सीधे नहीं जुड़ सकने वाले मित्रजन भ्रष्टाचार एवं अत्याचार से बचाव तथा निवारण हेतु उपयोगी कानूनी जानकारी/सुझाव भेज कर सहयोग कर सकते हैं)डॉ. पुरुषोत्तम मीणाराष्ट्रीय अध्यक्षभ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास)राष्ट्रीय अध्यक्ष का कार्यालय7, तँवर कॉलोनी, खातीपुरा रोड, जयपुर-302006 (राजस्थान)फोन : 0141-2222225 (सायं : 7 से 8) मो. 098285-02666E-mail : dr.purushottammeena@yahoo.in

  13. .पर कविता लिखने वालों पे जो जुल्म हो रहा है!!!!कितना कड़वा पर सच रक्या कहें अब आज के इस चलन को, बस ऑंखें भर आयीं

  14. अच्छे सन्देश वाली कविता है। मंचीय कविता के सारे गुण विद्यमान हें। लेकिन साहित्य के दृष्टिकोण से कसाव की कमी दिखती है।— हरीश

  15. सन्देश और हास्य दोनों है यहाँ इस कविता में.आप काफी अच लिखते है…आज पद आपकी रचना को बहुत खुशी हुई ..अहसास भी बरकार ..बहुत खूब

  16. जीवन के सत्य को बहुत सलीके से बयान किया है आपने।———क्या आप बता सकते हैं कि इंसान और साँप में कौन ज़्यादा ज़हरीला होता है? अगर हाँ, तो फिर चले आइए रहस्य और रोमाँच से भरी एक नवीन दुनिया में आपका स्वागत है।

  17. यमराज चाहे कई बार आ आ के संकेत देता है कभी बाल ,कभी आँखे धीरे -धीरे कमज़ोर पड़ते है पर हम संकेतो को कहाँ समझते है.मृत्यु यकबयक नहीं आती,कोई शोर नहीं करती आने से पहले.मनुष्य जैसे संसार के तट पर विश्राम कर रहा होता है.समय समाप्त होने पे महानाविक अनाम तट की दिशा में नाव मोड़ ले जायेगा.

  18. क्या कहने भई वाह। आपने तो एक बार को यमराज को भी चक्कर में डाल दिया। बहुत ही खूबसूरत रचना बन पड़ी है। अगर नई है तो कहना चाहूंगा कि यह खूब हिट होगी और अगर पुरानी है तो आप जानते ही होंगे कि कितनी हिट रही। बहरहाल बहुत खूबसूरत है। आपको बधाई।

  19. 'हाथ-पैर सलामत रहे तभी जाना अच्छा हैआज बेटा भीतभी तक प्यार करता हैजब तक छोटा बच्चा है।'- आज की वास्तविकता.

  20. कविता मजाक-मजाक मे सीरियस कर देती है..और डराती भी है..जैसे कि हमें दुनिया मे भेज कर भगवान ने कोई वन-टाइम निवेश अकांउंट खोला है..और नियत समय पर अपना डिवीडेंड लेते रहते हैं हमसें..वैसे कुछ तो किस्मत के ऐसे कच्चे भी होते हैं जो बेचारे पहली काल मे ही बुला लिये जाते हैं..काले बालों, भरपूर रोशनी वाली आँखों के समेत….वैसे यमराज से तो बस कोई कवि ही जीत सकता है..वो भी बनारस वाला!! 🙂

  21. बहुत सुन्दर और शानदार कविता लिखा है आपने जो काबिले तारीफ़ है! उम्दा प्रस्तुती!

  22. soch rahi hun ki yamraj ke yahaan kawiyon wala dept main sambhal lunha ha hi hisafal prayasroj subah kewal do gilas gunguna pani pine se motapa 6 month men gaayab

  23. एक उदबोधक और सावधान करती सशक्त कविता -याद है ? निर्भय स्वागत करो मृत्यु का यह है एक विश्राम स्थल ….

  24. each of ur writing is beyond another… its true… ur writings r awesome….मैं चिटठा जगत की दुनिया में नया हूँ. मेरे द्वारा भी एक छोटा सा प्रयास किया गया है. मेरी रचनाओ पर भी आप की समालोचनात्मक टिप्पणिया चाहूँगा. एवं यह भी जानना चाहूँगा की किस प्रकार मैं भी अपने चिट्ठे को लोगो तक पंहुचा सकता हूँ. आपकी सभी की मदद एवं टिप्पणिओं की आशा में आपका अभिनव पाण्डेय यह रहा मेरा चिटठा:- **********सुनहरीयादें**********

  25. यमराज भी कविराज से भय खा गये |बहुत सुन्दर कविता साथ ही सत्य उजागर करती रचना |ईश्वर से यही प्रार्थना है हाथ पांव चलते है तब तक हमे भी स्वीकार kर ले

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