सरकारी अनुदान



झिंगुरों से पूछते, खेत के मेंढक 

बिजली कड़की
बादल गरजे
बरसात हुयी

हमने देखा
तुमने देखा
सबने देखा

मगर जो दिखना चाहिए 
वही नहीं दिखता !

यार ! 
हमें कहीं, 
वर्षा का जल ही नहीं दिखता !


एक झिंगुर 
अपनी समझदारी दिखाते हुए बोला-

इसमें अचरज की क्या बात है !

कुछ तो 
बरगदी वृक्ष पी गए होंगे

कुछ 
सापों के बिलों में घुस गया होगा

मैंने 
दो पायों को कहते सुना है

सरकारी अनुदान
चकाचक बरसता है 
फटाफट सूख जाता है !

हो न हो
वर्षा का जल भी 
सरकारी अनुदान हो गया होगा..! 






( चित्र गूगल से साभार )

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एक अभागी सड़क




धकधक पुर से व्यस्त चौराहा होते हुए
शहर तक जाने वाली
अभागी सड़क
तू ही बता



तू कहाँ से आई है  ?

मैं कोई सरकस का बाजीगर तो नहीं
जो मौत के कुएँ में जाकर
मोटर साइकिल के करतब दिखाकर
हँसता हुआ बाहर चला आऊँ…!

पर्वतारोही या खन्दकावरोही  भी नहीं 
जो चढ़ने – उतरने, दौड़ने-भागने का आदी हो 
सामान्य नागरिक हूँ 
सीधी-सादी सडक पर ही चलना जानता हूँ 
तुम्हारे जख्मों को ठीक नहीं कर सकता 
तुम्हारी मरहम पट्टी के लिए
तुम्हारे आशिक की तरह
सड़क जाम कराने के आरोप में
जेल नहीं जा सकता
तो क्या यहाँ बैठकर
दो  बूँद आँसू भी नहीं बहा सकता…!

ऐ अभागी सड़क…!
तेरी स्थिति बड़ी दुखदायी है
तू ही बता तू कहाँ से आई है…?

दिल्ली या मुम्बई की तो तू
हो नही सकती
गुजरात के भूकंप की तरह चरमराई
दंगों की तरह शर्माई
दिखती तो है
पर गुजरात की ही हो
यह जरूरी नहीं .

तू कश्मीर की तरह घायल है
मगर तेरे जिस्म से
खून की जगह निकलते
गंदे नाली के पानी को देखकर निश्चित रूप से कहा जा सकता है
कि तू
कश्मीर की भी नहीं है.

नहीं
तू दक्षिण भारत की सुनामी लहरों की बहाई  भी नहीं
भ्रष्टाचार की गंगा में डूबी-उतराई है
तेरे जिस्म में कहीं ऊँचे पहाड़ तो कहीं गहरी खाई है
लगता है तू
बिहार से भटककर
बनारस में चली आई है.

अब तुझ पर से होकर नहीं गुजरते
रईसों के इक्के
या फिर
फर्राटे से दौड़ने वाले
गाड़ियों के मनचले चक्के
अब तो इस पर घिसटते हैं
सांड, भैंस, गैये
या फिर
मजदूरी की तलाश में भागते
साइकिल के पहिये .

मैं जानता हूँ कि तू कभी ठीक नहीं हो सकती
क्योंकि तू ही तो
अपने रहनुमा के थाली की
कभी ख़त्म न होने वाली
मलाई है.

ऐ अभागी सड़क
तू
आधुनिक भारत के विकास की सच्चाई है
तू ही बता
बिगड़ी संस्कृति बन
मेरे देश में
कहाँ से चली आई है..!



लम्बी कविता, छोटी कहानी



घर 

बचपन में कई घर थे
सभी करते थे उसे 
भरपूर प्यार 

एक में रहता तो दूसरा आवाज देता…
कहाँ हो यार..?
चाचा बुलाते तो बाबा जाने न देते
मानों उसके जाते ही फ्यूज  हो जायेंगे
सारे बल्ब !


किशोर  होते ही

पैरों में ‘घूमर’
बाँहों में ‘पंख’ लगने लगे
घर के रोम-रोम उसकी जुदाई से डरने लगे !
उसे याद है
जब भी वह देर से आता
घर का कोना-कोना, पूरे मकान को सर पर उठाए
हांफता – चीखता  मिल जाता !
दरवाजे
गुस्से से लाल-पीले बाउजी
खिड़कियाँ
झुंझलाई बहनें
बरामदे
चिंता के सागर में डूबी
माँ की आँखें .
पिटने के बाद भी
यह  एहसास उसे खुशियों से भर देता
कि यह घर
उससे बेहद प्यार करता है.
जवान होते ही
घर
उंगलियों में सिमट कर रह गए
नए मिले
पुराने खो गए
पास के दूर
दूर के पास हो गए
ताने मिलते तो बहाने बन जाते …
कोई कहता,  “बे ईमान हो गया !”
कोई कहता,  “अपने ही घर में, दो दिन का मेहमान हो गया !”
इन सबसे अलग
दूर गली में
एक घर वो भी था जिसकी दीवारों में
ईंट के स्थान पर चुम्बक जड़े थे
जिसके दरवाजे पर सूरज उगता और ढल जाता
छत
इन्द्रधनुषी रंगों से रंगी होती
खिड़कियाँ
चाँदनी से नहाई  होतीं
घर
जिसके एहसास से ही दिल में चाँद उतर आता
वह रातभर
नीद में चलता रहता
दिनभर
उसी के खयालों में खोया रहता
भोर गुलाबी
दिन
शर्मीले
रातें ….
जाफरानी हो जाती
जिंदगी
उस गली में
दीवानी हो जाती !
प्यार हद से बढ़ा तो दोनों
बेखबर हो गए
जुदा थे
कई घर थे
एक होते ही
बेघर हो गए !
भुगतनी पड़ी
लम्बी
प्यार की खता
इक-दूजे  की आँखों  में ढूंढ कर
बच्चों के  फॉर्म में  भरते रहे
धर्म
जाति
स्थाई पता !
आँधियों में बालू के घर ढह जाते हैं
ताश के महल उड़ जाते हैं
प्यार झूठा हो तो जिन्दगी
मुठ्ठी से रेत की तरह फिसल जाती है
प्यार सच्चा हो
तो नई इमारत फिर से खड़ी हो जाती है
दोनों ने एक दुसरे का बखूबी साथ निभाया
हर इम्तहान में खरे उतरे
अपनी मेहनत से
एक खूबसूरत मकान खड़ा कर दिया
और शुरू कर दी
मकान  को घर बनाने की अंतहीन प्रक्रिया…
कोशिश ही कोशिश में
क्या से क्या हो गए
बच्चे बड़े
वे
बूढ़े हो गए !
देखते ही देखते
बच्चों ने
अपनी अलग दुनियाँ बसा ली
भारी मन से
घर ने घर को
सदा खुश रहने की दुआ दी
जिन्दगी फिर बे नूर हो गई
दिन की रोशनी
रात की चाँदनी
कोसों  दूर हो गई
खुशियों के पल एलबम में सजने लगे
घर के जख्म
फिर उन्हें
बेदर्दी से
कुरेदने लगे
मौसम  की मेहरबानी से
इन्द्रधनुष
कभी कभार
इक-दूजे की आँखों में दिख जाते हैं
तो वक्त की बदली
उसे
झट से ढक लेती है
कभी छत चूने लगती है
कभी कोई नींव
हौले से
धंसने लगती है
घर…!
ऐ  जिन्दगी..!
तू आजकल मेरे ख़यालों में रोज  आती है .
बांधना चाहता था तुझे गीतों में मगर
तू तो
कहानी की तरह
फैलती ही चली जाती है…..!

एक घर वह था




एक दिन वह था 
जब मैं 
अपने ही घर की छत पर 
छोटे-छोटे गढ्ढे बना दिया करता था 
हम उम्र साथियों के साथ कंचे खेलने के लिए !


एक दिन यह है 
जब मैं 
अपने घर की दीवारों में
कील ठोंकते डरता हूँ 


एक दिन वह था 
जब मैं 
बरसात में छत टपकने का मजा लेता था 


एक दिन यह है 
जब मैं 
दीवारों में हलकी सी सीलन  देख 
चढ़ जाता हूँ छत पर !


एक घर वह था 
जो मुझसे डरता रहता था 
एक घर यह है 
जिससे मैं डरता रहता हूँ 


एक घर वह था 
जो मुझे संभालता था 
एक घर यह है 
जिसे मुझे संभालना पड़ता है 


एक घर वह था 
जहाँ मैं रहता था 
एक घर यह है 
जो मुझमें रहता है |