एक घर वह था




एक दिन वह था 
जब मैं 
अपने ही घर की छत पर 
छोटे-छोटे गढ्ढे बना दिया करता था 
हम उम्र साथियों के साथ कंचे खेलने के लिए !


एक दिन यह है 
जब मैं 
अपने घर की दीवारों में
कील ठोंकते डरता हूँ 


एक दिन वह था 
जब मैं 
बरसात में छत टपकने का मजा लेता था 


एक दिन यह है 
जब मैं 
दीवारों में हलकी सी सीलन  देख 
चढ़ जाता हूँ छत पर !


एक घर वह था 
जो मुझसे डरता रहता था 
एक घर यह है 
जिससे मैं डरता रहता हूँ 


एक घर वह था 
जो मुझे संभालता था 
एक घर यह है 
जिसे मुझे संभालना पड़ता है 


एक घर वह था 
जहाँ मैं रहता था 
एक घर यह है 
जो मुझमें रहता है |

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57 thoughts on “एक घर वह था

  1. एक घर वह था जहाँ मैं रहता था एक घर यह है जो मुझमें रहता है |वर्तमान मे ही पता चलता है कि बचपन का अतीत कितना सुन्दर था।और फिर जब आत्मा बेचैन होती है तब आदमी ऐसे ही सोचता है। बहुत अच्छी कविता है। बधाई

  2. घर घर न रहा प्यार प्यार न रहा मुझे अब किसी पर ऐतबार न रहा …..हां हा ..होता है होता है …बढियां भाव !

  3. कविता पढ़कर घर को देखने का एक और नजरिया सामने आया। अब आपके घर आया हूं तो दो सुझाव दूंगा। माने न मानें आपका घर है। पहली बात तो सिलन नहीं,सीलन या सीड़न आती है। संभव है यह टायपिंग की गलती हो। ठीक कर लें। दूसरी बात आपकी इस सकारात्‍मक कविता में घर से डरने या घर को डराने वाला जो पद है वह समझ तो आया पर यहां जमता नहीं है। उसे घर के बाहर ही कहीं रहने दें तो बेहतर है।

  4. राजेश जी,घर का सीलन ठीक कर दिया …अच्छा लगे या बुरा सत्य तो यही है कि बच्चों को थोड़ा भी कष्ट हो तो पूरा घर डरने लगता है ….घर को थोड़ा भी कष्ट हो तो घर का मुखिया डरने लगता है. इसी भाव को रख कर लिखी हैं ये पंक्तियाँ . मेरा कंप्यूटर ख़राब था फार्मेटिंग में गूगल का हिंदी टूल बार गायब हो गया है. यूँ ही त्रुटियाँ बताते रहें …समायाभाव से सदसंगति हो नहीं पाती अब तो जो भी सीखना है इसी ब्लागजगत से ही सीखना है….आभार.

  5. छत्र छाया में रहना किता सुखकर है और छत्र छाया बनना कितना दुष्कर काम है |पर जिम्मेदारिय सुरक्षित आशियाना बन ही देती है |बहुत सुन्दर कविता |

  6. एक घर वह था जो मुझे संभालता था एक घर यह है जिसे मुझे संभालना पड़ता है वाह जी बहुत ही सुंदर कविता, सब समय समय की बात है

  7. देवेन्द्र भाई ,कहां से आते हैं ऐसे सुघड विचार आपको ! बेहतरीन !

  8. वह घर जेबखर्च देता थायह घर महीने दर महीने खर्च निकाल लेता है – कभी किश्त के बहाने कभी राशन के बहाने लेकिन घर होता तो घर ही है – अद्वितीय ज़गह।

  9. घर की एक नई परिभाषा दी आपने,देखने का एक नया आयाम, घर सी जुड़ी सम्वेदनाओं को एक नया अर्थ. एक बेहतरीनअभिव्यक्ति…देवेंद्र जी, मेरी बधाई!!

  10. 'एक घर वह था जहाँ मैं रहता था एक घर यह है जो मुझमें रहता है |'- अत्यंत रोचक. साधुवाद.

  11. देवेन्द्र जी …कितनी खूबसूरती से मन के भाव को पिरोया आपने…एक सच्चाई कहती है जब हम ज़िम्मेदार हो जाते है तो घर के प्रति हमारा रवैया बदल जाता है…अंतिम कड़ी तो बेहतरीन..बधाई चाचा जी

  12. कविता समय चक्र के तेज़ घूमते पहिए का चित्रण है। कविता की पंक्तियां बेहद सारगर्भित हैं।

  13. एक वो घेर था जो पिता का घर था एक यह घेर है जो मेरा है.अच्छी पेशकश. उस समय जिमेदारी का एहसान ना था , जो आज है…

  14. मैं भी अक्सर यही सोचता हूँ कि हम बड़े होने के बाद कितने बदल जाते है , कहाँ खो जाती है वह निश्चिंतता ?

  15. वो भी एक घर थाये भी एक घर है ,वो घर याद आता है मुझे ,ये घर याद करेगा मुझे …..

  16. समय के फर्क-बदलाव को, समय के fer को दर्शाती आपकी ये कविता मन को छू गयी हैं.बहुत बढ़िया और बेहतरीन कविता के लिए बेहतरीन कवि को हार्दिक बधाई.धन्यवाद.WWW.CHANDERKSONI.BLOGSPOT.COM

  17. क्या कहने। वाह। बेहतरीन। शानदार। और क्या कहूं। एक ये घर है जो मुझमें रहता है। वाह। वाह। वाह। मेरी बधाई स्वीकार करें।

  18. आपका कबिता का भाव महसूस करके , गुरुजी (गुलज़ार साहब ) का दू चार ठो लाईन याद आ गया…इच्छाओं के भीगे चाबुक, चुपके चुपके सहता हूँऔरों के घर यूँ लगता है मोज़े पहने रहता हूँख़ाली पाँव कब आँगन में बैठूँगा, कब घर होगा.देवेंद्र जी,बहुत बहुत धन्यवाद!!

  19. एक घर वह था जहाँ मैं रहता था एक घर यह है जो मुझमें रहता है |यूं तो इस रचना की हर पंक्ति अपने आप में बहुत कुछ कह रही है, गहरे भावों को बहुत ही सुन्‍दरता से आपने प्रस्‍तुत किया है।

  20. अति-सुन्दर रचना.जीवनमे आदमीमे कितने परिवर्तन होते हैं,बूढ़े हो जाने पर न जाने आदमी और घर के बीच कैसा रिश्ता बने !

  21. हुज़ूर किन एहसासों से गुज़र कर यह कविता बनी होगी समझ सकता हूँ….घर को लेकर जिस भावुकता के साथ आपने लिखा है जितनी तारीफ़ की जाए कम है…….!

  22. आपने तो घर-घर की कहानी कह डाली..बेचैन जी!… पहले घर हमारे लिए हुआ करता था; अब हम घर के लिए रह गए है!… सटिक आलेख, धन्यवाद!

  23. अब जाकर घर की परिभाषा और कीमत पता चली न यही एक टीस है जो हर पांचवे इंसान को सालती है

  24. जब आप सुन्दर कवितायें पोस्ट कर रहे थे तो हम गद्य-समर में जूझ रहे थे .. कविता में 'व्यू-प्वाइंट' अच्छा है .. बचपन में घर का हम लुत्फ़ जैसा लेते हैं जबकि बाद में औरों के लुत्फ़ के लिए घर की 'केयरिंग' करते रहते हैं .. सुन्दर कविता है ! आभार !

  25. बहुत ही सही बात कही है। अब घर भी सजावट का सामान से हो गए हैं। न अब उनमें उतने सारे कोने , छिपने खेलने की जगहें होती हैं, वे हर समय हमें अपने महत्व के तले दबाए रहते हैं।कृपया अपने ब्लॉग के हैडर के चितचर को छोटा कर लीजिए। जितना बड़ा होगा उतना ही अधिक समय ब्लॉग खुलने में लगेगा।घुघूती बासूती

  26. एक घर वह था जहाँ मैं रहता था एक घर यह है जो मुझमें रहता है |घरों में हम नहीं हममें घर रहता है

  27. अभिषेक कुशवाहा ने इ-मेल से यह प्रतिक्रिया भेजी है …"फिक्र -ए-दुनिया में सर खपाता हूँ ….मै कहा और ये वबाल कहा ……"

  28. अब देवेन्द्र जी इत्ता बड़ा घर बनायेंगे तो यही होगा न …..वैसे इस घर की तारीफ सुन हमें तो देखने की लालसा हो गयी …..!!

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