सावन की बरसात

बादल-बिजली गड़गड़-कड़कड़ चमके सारी रात।
टिप्-टिप्-टिप्-टिप्, टिप्-टिप्-टिप्-टिप् सावन की बरसात।।

खिड़की कुण्डी खड़ख़ड़-खड़खड़ सन्नाटे का शोर
करवट-करवट जागा करता मेरे मन का चोर

मेढक-झींगुर जाने क्या-क्या कहते सारी रात।
टिप्-टिप्-टिप्-टिप्, टिप्-टिप्-टिप्-टिप् सावन की बरसात।।

अँधकार की आँखें आहट और कान खरगोश
अपनी धड़कन पूछ रही है तू क्यों है खामोश

मिट्टी की दीवारें लिखतीं चिट्ठी सारी रात।
टिप्-टिप्-टिप्-टिप्, टिप्-टिप्-टिप्-टिप् सावन की बरसात।।

बूढ़े वृक्षों पर भी देखो मौसम की है छाप
नई पत्तियाँ नई लताएँ लिपट रहीं चुपचाप

जुगनू-जुगनू टिम-टिम तारे उड़ते सारी रात।
टिप्-टिप्-टिप्-टिप्, टिप्-टिप्-टिप्-टिप् सावन की बरसात।।

टुकुर-टुकुर देखा करती है सपने एक हजार
पके आम के नीचे बैठी बुढ़िया चौकीदार

उसकी मुट्ठी से फिसले है गुठली सारी रात।
टिप्-टिप्-टिप्-टिप्, टिप्-टिप्-टिप्-टिप् सावन की बरसात।।
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49 thoughts on “सावन की बरसात

  1. वाह देवेन्द्र जी,बहुत शानदार बरसाती दोहे लिखे हैं।"अँधकार की आँखें आहट….।" बहुत खूबसूरत}

  2. सन्नाटे के शोर और करवट करवट जागते हुए के, मन की टोह लेते हुए …मिटटी की दीवारों / बूढ़े वृक्षों / बुढ़िया…बनाम…नई पत्तियों / हजार सपनों और जुगनू…तारों की टिमटिमाहट के सूत्र सावन से जोड़ने की कोशिश में लगे है ! हमेशा की तरह सुचिंतित कविता !

  3. जिन पंक्तियों को देखो वही अद्भुत, टेक की तो बात की क्या!…टिप-टिप-टिप-टिप सावन की बरसात.

  4. क्या लिखा है!!!!!! बस लाजवाब एक एक बात बहुत सोची समझी किस पंक्ति की तारीफ करूँ किसकी रहने दूँ बस यही सोच रही हूँ और कविता और उसकी भाषा का आनंद ले रही हूँ

  5. शब्दों का संगीत निखर कर आता है इन सारे बरसाती दोहों मे..बूँद-बूँद बा्रिश जैसे बजती है हर पंक्ति मे टिप-टिप, कड़-कड़ बूँदे, बादल, बिजली, कुंडी, मिट्टी, जुगनू सब जैसे उनींदी रातों को थप-थप कर उठाते हैं..बारिश एक आमंत्रण है..प्रकृति से एकाकार होने का..एक विलंबित सुर..जो जीवन के कानों मे मिस्री घोलता रहता है..कुछ-कुछ पंक्तियाँ तो जैसे गज्जब हैं जैसे..’अँधकार की आँखें आहट और कान खरगोशमिट्टी की दीवारें लिखतीं चिट्ठी सारी रात।पके आम के नीचे बैठी बुढ़िया चौकीदारउसकी मुट्ठी से फिसले है गुठली सारी रात।..अच्छा है कि बारिश हो रही है इधर..वर्ना ऐसी रचनाएँ सूखे हृदय की तपती रेत पर गेहुएँ साँप सी लोटती रहतीं…

  6. वाह अपूर्व..आपके कमेंट के बिना पोस्ट अधूरी लगती है.अरविंद भैया..यह न इस साल की है न परियार साल की. यह तो उस साल की है जब बरसा था सावन…. झूम के.

  7. देवेंद्र जी,एकदम बैक्ग्राउण्ड म्यूजिक से लैस धाँसू गीत है ये… बस सुनते ही मन करता है कि बस निकल पड़ें बिना छतरी के… हमलोगों के लिए परियार साल सावन में भी पसीने की बारिश थी… सो हम तो इसी साल का मान कर झूम लेते हैं…

  8. सुन्‍दर है बरसात रिम झिम रिम झिम …मिट्टी की दीवारें लिखतीं चिट्ठी सारी रात….बुढ़िया चौकीदार…आम के नीचे बैठी सपने देखा करती है ………लाजवाब

  9. मेरी गरीब हिन्दी योग्यता से कविता अमझना मुशकिल है। लेकिन यह कविता आवाज़ निकालने से पढ़कर बहुत अच्छा लगा। क्या आप तस्वीर भी अपने हाथ से खींचते हैं? बहुत सुन्दर है।

  10. उसकी मुट्ठी से फिसले है गुठली सारी रात।अहा! बहुत ही ख़ूबसूरत ये ये पंक्तियाँ… यूँ तो पूरी कविता ही ऐसी लगी जैसे मैं राजेंद्र प्रसाद घाट पर बैठा हूँ..गँगा भी भीग रही हो :)बहुत सुन्दर

  11. टिप्-टिप्-टिप्-टिप्, टिप्-टिप्-टिप्-टिप् सावन की बरसात।।mujhe ye tip tip tip jayda pyari lag rahi hai….:)khubsurat rachna…….

  12. बूढ़े वृक्षों पर भी देखो मौसम की है छाप नई पत्तियाँ नई लताएँ लिपट रहीं चुपचाप..सुन्दर रचना

  13. टिप-टिप,टिम-टिम, टुकुर-टुकुर,जैसे शब्दों के प्रयोग ने रचना की मिठास बढ़ा दी है.

  14. वाह, बहुत संगीतमयी कविता है। बरसात का दृष्य जीवंत हो गया।घुघूती बासूती

  15. अँधकार की आँखें आहट और कान खरगोशअपनी धड़कन पूछ रही है तू क्यों है खामोशबूढ़े वृक्षों पर भी देखो मौसम की है छाप नई पत्तियाँ नई लताएँ लिपट रहीं चुपचाप-:इस प्रकार की कल्पना के आपने ! शुभकामनायें !

  16. टुकुर-टुकुर देखा करती है सपने एक हजारपके आम के नीचे बैठी बुढ़िया चौकीदारउसकी मुट्ठी से फिसले है गुठली सारी रात।टिप्-टिप्-टिप्-टिप्, टिप्-टिप्-टिप्-टिप् सावन की बरसात।।सदा कि तरह बेमिसाल रचना…

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