बच्चों ने बेचे गुब्बारे…..!


मेला...


हमने देखे गज़ब नज़ारे मेले में।


लाए थे वो चाँद-सितारे ठेले में।।



बिन्दी-टिकुली, चूड़ी-कंगना


झूला-चरखी, सजनी-सजना


जादू-सरकस, खेल-खिलौने


ढोल-तराने, मखणी-मखणा



मजदूरों ने शहर उतारे मेले में।


हमने देखे गजब नज़ारे मेले में।।



भूखे बेच रहे थे दाना


प्यासे बेच रहे थे पानी


सूनी आँखें हरी चूड़ियाँ


सपने बेच रहे ज्ञानी



बच्चों ने बेचे गुब्बारे मेले में।


हमने देखे गजब नज़ारे मेले में।।



बिकते खुशियों वाले लड्डू


एक रुपैया दो-दो दोना


हीरे वाली गजब अंगूठी


चार रुपैया चांदी-सोना



अंधियारे दिखते उजियारे मेले में।


हमने देखे गजब नज़ारे मेले में।।

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46 thoughts on “बच्चों ने बेचे गुब्बारे…..!

  1. जीबन का मेला भी अईसने है देवेंद्र जी… बस एगो सपना के जईसा… जब तक लगा रहता है सच बुझाता है और एक दिन सब खतम… अच्छा लिखे हैं, जीबन का कॉन्ट्रास्ट देखाई देता है!!

  2. भूखे बेच रहे थे दानाप्यासे बेच रहे थे पानीसूनी आँखें हरी चूड़ियाँसपने बेच रहे ज्ञानीJeevan ke mele ka kya gazab warnana kiya hai aapne…aankhen nam ho gayin..

  3. भूखे बेच रहे थे दानाप्यासे बेच रहे थे पानीसूनी आँखें हरी चूड़ियाँसपने बेच रहे ज्ञानीबच्चों ने बेचे गुब्बारे मेले में।हमने देखे गजब नज़ारे मेले में।क्या बात है !देवेन्द्र जी ,ऐसा कभी नहीं हुआ कि इस ब्लॉग से मैं कुछ सीख लिये बिना जाऊं ,बहुत ख़ूबसूरत मंज़रकशी एक दर्शन छुपा होता है आप की रचनाओं मेंबहुत उम्दा!

  4. "भूखे बेच रहे थे दानाप्यासे बेच रहे थे पानीसूनी आँखें हरी चूड़ियाँ"देवेंदर दा जबाब नहीं !

  5. मन ने स्वतः ही इस अद्वितीय गीत की हर पंक्ति की बलैयाँ ली हैं…शब्दों में इस रसानुभूति को बाँध बताना संभव नहीं मेरे लिए… क्या कहूँ…

  6. मेले की वास्तविकता बयान कर दी आपने… सर्कस के जोकर के कारनामे बहुत हँसाते हैं लेकिन इसके लिए वो कितना रोता होगा कौन देखता है… रस्सी पर चलने वाली लड़की, गुब्बारे बेचने वाला बच्चा, चूड़ियाँ बेचने वाली विधवा… बहुत कचोटता है… देवेंद्रजी अजब नज़ारा है इस मेले का भी!!

  7. देवेन्द्र जी,पर्दे के पीछे की सच्चाई है ये, भूखे दाना बेच रहे हैं और प्यासे पानी।सच है जो दिखता है और जो वास्तव में है, उसमें जमीन आसमान का अंतर है।बहुत अच्छी रचना लगी।

  8. भूखे बेच रहे थे दानाप्यासे बेच रहे थे पानीसूनी आँखें हरी चूड़ियाँसपने बेच रहे ज्ञानीबच्चों ने बेचे गुब्बारे मेले में।हमने देखे गजब नज़ारे मेले में।।बहुत सुन्दर आप की यह भाव पुर्ण कविता आभार

  9. भूखे बेच रहे थे दानाप्यासे बेच रहे थे पानीसूनी आँखें हरी चूड़ियाँ…….बहुत अच्छी रचना |

  10. मेले में चल रही उलटबांसी को देख लिया आपने , यह आपकी संवेदनशील नज़रों की बाबत हो पाया. मेले में बच्चे गुब्बारे बेचकर कॉपी-कीताब की जुगाड बैठाते होंगे या घर की दाल-रोटी की.

  11. वाह! बहुत बढ़िया लगा! जीवन के मेले को आपने बड़े ही सुन्दरता से प्रस्तुत किया है! उम्दा रचना!

  12. भूखे बेच रहे थे दानाप्यासे बेच रहे थे पानीसूनी आँखें हरी चूड़ियाँसपने बेच रहे ज्ञानीBahut hi sunder…bahut hi sach se bhari hui rachna.

  13. भूखे बेच रहे थे दानाप्यासे बेच रहे थे पानीसूनी आँखें हरी चूड़ियाँसपने बेच रहे ज्ञानी गहरे भाव और व्यथा सहेजे हुए ये प्रस्तुति भावुक कर गई

  14. बिन्दी-टिकुली, चूड़ी-कंगनाझूला-चरखी, सजनी-सजनाजादू-सरकस, खेल-खिलौनेढोल-तराने, मखणी-मखणावाह…वाह….मेला याद आ गया …..!!बचपन में खूब जाया करते थे…..एक बार किसी मेले में रामपुरिया चाकू खरीदा था १० रूपए में आज भी संभाले रखा है….!!गज़ब का वर्णन है मेले का …..!!

  15. भूखे बेच रहे थे दानाप्यासे बेच रहे थे पानीसूनी आँखें हरी चूड़ियाँसपने बेच रहे ज्ञानी..ये तो जीवन की सच्चाई है … अक्सर मजबूरी इंसान को ये सब कराती है …

  16. भूखे बेच रहे थे दानाप्यासे बेच रहे थे पानीसूनी आँखें हरी चूड़ियाँसपने बेच रहे ज्ञानीkitni saralta se aapne kitna kuch kah diya.bahut khub.badhai.

  17. @ बेचैन आत्मा जी,अच्छा लिखते है आप धन्यवाद आपका जो आप इस ब्लॉग पर पधारे मैं आप के विचारो से सहमत हूँ लेकिन आप जानते होंगे की copyright जैसे किसी भी पचड़े में न फसने के लिए ऐसा करना पड़ रहा है, और फिर ओशो कहते है की नाम में क्या रखा है . हमें सिर्फ अपना कर्म करना है . ……………

  18. nahi janta kya likhoon,yun to bas blog ki duniya ki sair kar raha tha, lekin jis tarah se apne ek vyangatmak rachna paish ki hai, laga ki yahan ana sarthak ho gaya.ek anoothi prastuti ke liye badhai.

  19. मजदूरों ने शहर उतारे मेले में।हमने देखे गजब नज़ारे मेले में।।sunder chitr kheenchaa hai aapne….

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