‘विजयोत्सव’

सुना है राम
तुमने मारा था मारीच को
जब वह
स्वर्णमृग बन दौड़ रहा था
वन-वन
तुमने मारा था रावण को
जब वह
दुष्टता की सारी हदें पार कर
लड़ रहा था तुमसे
युद्धभूमि में ।
सोख लिए थे उसके अमृत कलश
एक ही तीर से
विजयी होकर लौटे थे तुम
मनी थी दीवाली
घर-घर ।
मगर आज भी
जब मनाता हूँ विजयोत्सव
जलाता हूँ दिए
तो लगता है…….  
कोई हँस रहा है मुझपर….!
चलती है हवा
बुझती है लौ
उठता है धुआँ
तो लगता है……
जीवित हैं अभी
मारीच और रावण
मन कांप उठता है
किसी अनिष्ट की आशंका से….!

आशीर्वाद

 
”नमस्कार !”

“पण्डित जी, नमस्कार !”

“नमस्कार, पाण्डित जी !”

“पा लागी पंडित जी !”
“पंडित जी ‘पा.s.s लागी’ !”
(क्रोध से तमतमा कर दोनो कंधे झकझोरते हुए….)
“‘बही.s.s.र’ हो गयल हौवा का ? ढेर घमंड हो गयल हौ ?”
“अरे बाबू साहब, का बात हौ ? काहे चीखत हौवा ? का हो गयल ?”
(दोनो हाथ नचाते हुए, गुस्से से…..)

“पाँच दाईं नमस्कार कर चुकली…एक्को दाईं जवाब ना मिले, त का होई ?” ईहे न मन करी, “जा सारे के, कब्बो नमस्कार ना करब..!”

“अरे..रे… के तोहरे नमस्कार कs जवाब नाहीं देत हौ ! नमस्कार…..!”

बाबू साहब चुप !

‘पण्डित जी’ फिर से काम में मगन !

(बाबू साहब फिर चालू….)

“हमरे ई ना समझ में आवत हौ कि तू कौन जरूरी काम करत हौवा ? तोहीं से पूछत है पंडित जी…! तोहीं के पाँच दाईं नमस्कार कैले रहली….! ई कम्प्यूटर न हो गयल चुम्बक हो गयल ससुरा…अच्छे-भले मनई के पगला देत हौ..! जा अब तोहें कब्बो नमस्कार ना करब….!”

(पंडित जी घबड़ाकर…..)

“दू मिनट बाबू साहब….नाहीं तs हमार सब करल-धरल ‘गुण गोबर’ हो जाई..”

‘हम जात है पंडित जी…तू यही में चपकल रहा…ससुरा कम्प्यूटर ना हो गयल सनीमा कs ‘हीरोईन’ हो गयल…!”

(आसपास खड़े लोग जो बाबू साहब की बातें ध्यान से सुन रहे थे…ठहाके लगाने लगते हैं ..उसी में कोई चुटकी लेता है…’झण्डूबाम हुई…कम्प्यूटर तेरे लिए…!’फिर एक जोरदार ठहाका लगता है…!हरबड़ी में पंडित जी कम्प्यूटर बंद करते हैं और बाबू साहब को जबरिया कुर्सी पर बिठाकर पूछते  हैं…..)

“हाँ, तs बतावा का हल्ला करत रहला…?”

“कुछ नाहीं पंडित जी, ‘पलग्गी’ कैली, तs चाहत रहली की आप कs आशीर्वाद मिले…कौनो काम ना हौ,,आखिर नमस्कार कs जवाब तs देवे के न चाही ?

“देखत ना रहला कि इतना लम्बा अंक लिखले रहली…अंत में जोड़ न करीत, ओह के कम्प्यूटर में ‘सेव’ न करीत तs कुल ‘गुण गोबर’ ना हो जात ? …तोहें तs बस… पलग्गी कs जवाब नाहीं देहला…!पलग्गी कैला तs हम तोहरी ओर तकले ना रहली…! कौनो जबरी हौ..? जे आशीर्वाद नाहीं देई, ओहसे जबरी आशीर्वाद लेबा…?”

“ए पंडित जी, ई त कौनो बात ना भईल…! ‘पलग्गी’ कैली… तs आशीर्वाद तs तोहें देवे के पड़बै करी..!” (दूसरे लोगों की ओर देखते हुए….) का भाई, आपे लोग समझावा ‘पंडित जी’ के….!”

 
(बाबू साहब की बात सुनकर लोग दो खेमे में बंट गए…कोई बाबू साहब को चढ़ाता….”हाँ बाबू साहब, आशीर्वाद तs  पंडीजी के देवे के चाही…” कोई कहता…”जायेदा, बाबू साहब, तू ‘पा लागी’ करबे मत  करा..!” कोई कहता….”आशीर्वाद देना कोई जरूरी नहीं।“)

पंडित जी बोले,    “तोहार माथा गरम हौ। पहिले पानी पीया…। सब तोहें चढ़ा के मजा लेत हौ…तू तनिको बतिया समझते नाहीं हौवा..(मंगरू को आवाज देते हुए…) जाओ जल्दी से बाबू साहब को चाय पिलाओ….!”

“चाय-वाय नाहीं पीयब ! पहीले ई बतावा, आशीर्वाद देना काहे जरूरी ना हौ ?”
“चाय पी ला, अब छेड़ देहले हौवा..कम्प्यूटर बंद हो गयल हौ, तs तोहें तबियत से समझावत हई।“

(चाय पीने के बाद के बाद पंडित जी ने प्रश्न किया…)

“ई बतावा, संकटमोचन में हनुमान जी के लड्डू चढ़ावला..? हनुमान जी कs दर्शन हो जाला तs मस्त हो के चल आवला…! ई तs अच्छा हौ कि हनुमान जी नाहीं बोललन ..बोल्तन त का तू उनहूँ से जबरी आशीर्वाद लेता..?”

“देखा पंडित जी, बेवकूफ मत बनावा…पहिली बात कि तू हनूमान जी नाहीं हौवा……!”

(बीच में ही बात काटकर…..)

“हाँ,…आ गइला न रस्ते में….हम हनुमान जी नाहीं है…ठीक कहत हौवा…एकर मतलब ई भयल कि जितना ‘श्रद्धा’ तोहार हनुमान जी बदे हौ. उतना हमरे बदे नाहीं हौ……हमरे बदे ‘श्रद्धा’ में कमी हौ । हौ… मगर उतना नाहीं हौ, जितना हनुमान जी बदे हौ..?”

“हाँ, ठीक कहत हौवा…तs एकर मतलब ई भयल कि तू आशीर्वाद नाहीं देबा..?”

नाहीं…s..s…एकर मतलब ई भयल कि ‘पालागी’ ओही के करे के चाही जेकरे बदे तोहरे मन में भरपूर श्रद्धा हो…। ’श्रद्धा’ होई… तs ‘संशय’ अपने आप मिट जाई…। ‘पंडित जी’ देख लेहलन कि हम ‘पा लागी’ करत हई… यही बहुत हौ…! अऊर यहू जरूरी नाहीं हौ कि ‘पंडित जी’ के पा लागी करबे करा….! कौनो डाक्टर बतौले हौ कि ‘पंडित जी’ के पा लागी करा तबै स्वस्थ रहब…?भ्रष्ट हौ..चोर हौ..व्यभिचारी हौ..मगर ‘पंडित’ हौ तs पा लागी करबे करा…?  ई कौन बात हौ…! ‘पा लागी’ ओहके करा जे ऊ योग्य हो…! फिर चाहे कौनो जात बिरादरी कs होखे…! ’पा लागी’ ओहके करा..जेकरे प्रति मन में श्रद्धा जागे…! ‘अइरू गइरू नत्थू खैरू’ जौन मिल गइलन ओही के ‘पंडित जी पा लागी..’ ई कौन बात हौ..?”                                                                                                                                                           

“तू ‘अइरू गइरू’ हौवा…?”

“नाहीं..हम ‘अईरू गईरू’ ना है..हमरे प्रति तोहरे मन में श्रद्धा हौ..तs हम आशीर्वाद ना देहली..तोहार ‘श्रद्धा’ छण भर में खतम…! ई कैसन ‘श्रद्धा’ ? ई कैसन विश्वास…? अऊर यहू समझा कि आशीर्वाद जबरी लेबs तs का ऊ फली ?.. ई हमरे अधिकार कs बात हौ ..ई हमरे मन कs बात हौ….जे आशीर्वाद कs पात्र ना हौ, ओहू के आशीर्वाद दे देई….?” जैसे सबके ‘पा लगी’ नाहीं करल जाला वैसे सबके आशीर्वादो नाही देहल जाला…! ई कौनो जबरी कs सौदा ना हौ…। जे आशीर्वाद देला ओकर शक्ति कम होला…जे आशीर्वाद पावला ओकर शक्ति बढ़त जाला..। ऐही बदे ऋषी-मुनी सालन तपस्या कै के शक्ति जुटावत रहलन कि संसार में बहुत अभागी हौवन …उनकर कल्याण कs जिम्मा उनहीं के ऊपर रहल.. ..

“तs का तू ‘चमार’ के भी पा लागी करबा…?”

“काहे नाहीं…! ऊ योग्य हौ…..हमे ओहसे शिक्षा मिलत हौ…हमार जीवन ओकरे कारण सुधरत हौ, तs ई हमार परम सौभाग्य हौ कि हम उनकर पैर पकड़ के उनसे आशार्वाद लेई…! उनहूँ के खुशी होई की हमरे शिक्षा क मोल हौ…! तs ऊ जब आशीर्वाद देई हैं.. तs समझा जनम सफल हो जाई…!”

“तू धन्य हौवा पंडित जी…! आजू से हमार आँख खुल गयल…..! तोहार चरण कहाँ हौ….?  पालागी…!”

“जा खुश रहा..! मस्त रहा..!”

( सभा बर्खास्त हुई…लोग अपने-अपने घर को चले गए..लेकिन बहुतों के मन में यह भाव था कि ‘पंडित जी’ ने बड़ी चालाकी से ‘बाबू साहब’ को मूर्ख बना दिया…! हम आपसे जानना चाहते हैं कि क्या पंडित जी गलत थे ?)

उपदेश के दो हजार सात सौ साल बाद

सुबह
सारनाथ के लॉन में
कर रही थीं योगा
शांति की तलाश में आई
दो गोरी, प्रौढ़, विदेशी महिलाएँ
इक दूजे के आमने-सामने खड़ी
हिला रही थीं हाथ
नीचे से ऊपर, ऊपर से नीचे
बज रही थी धुन
ओम नमः शिवाय।
दो ग्रामीण महिलाएँ
एक स्कूली छात्र
कॉलोनी के एक वृद्ध
तोड़ रहे थे फूल
पूजा के लिए
चाहते थे पाना
कष्ट से मुक्ति।

घूम रहे थे गोल-गोल
मंदिर के चारों ओर
मार्निंग वॉकर।
कर रहा था
बुद्ध की परिक्रमा
श्रीलंकाई तीर्थ यात्रियों का जत्था
जप रहे थे श्रद्धालु
समझ में न आने वाले मंत्र
हाथों में ले
ताजे कमल के पुष्प
सुनाई दे रहा था उद्घोष….
सा.s.s.धु, सा.s.s.धु, सा.s.s.धु ।
कर रहे थे
फूलों की बिक्री का हिसाब
गिन रहे थे सिक्के
गाँव के किशोर।

मंदिर के बाहर
दुत्कारे जा रहे थे भिखारी
झुकी कमर, लाठी टेक
मुश्किल से चल पा रहा था
एक वृद्ध
गुजरा था जनाजा
अभी-अभी
चीख रहे थे लोग
राम नाम सत्य है।
मंदिर के भीतर
पीपल के वृक्ष के नीचे
बैठे थे
बुद्ध और उनके पाँच शिष्य
मूर्ति बन।

लैपटॉप



            आज लैपटॉपआया तो मन हुआ, देखूं कि कैसे इन पर उंगलियाँ चलती हैं ! कठिन लग रहा है ..शब्द भाग रहे हैं। कभी इधर तो कभी उधर। सोच रहा हूँ कि सुविधा के चक्कर में नया झमेला तो नहीं मोल ले लिया सर पर !  कितने संवेदनशील हैं इसके बटन ! जरा सा छुओ तो काम चालू ! घंटे भर में लिखो और चुटकी  मे गोल ! फिर सोचता हूँ, सभी तो लिखते हैं इस पर ! फिर मैं क्यों नहीं लिख सकता..! हाँ, अब कुछ मान रहीं हैं कहना मेरा मेरी उंगलियाँ…जो चाहता हूँ वही लिख रही हैं। हैं ! ये क्या खुल गया अचानक से ! कैसिंल करना पड़ेगा। उंगलियाँ चलाऊँ..चूहा नहीं है। उंगलियों को ही चूहा बनाना पड़ेगा..ये करसर क्यों भाग रहा है ? अरे ! सब गायब ! हाय राम ! इतनी देर से लिखा सब बेकार...! बेटा.s.s. अब क्या करूँ..? सब गायब हो गया.s.s.! सी.टी.आर.एल. प्लस जेड दबाइए पापा..s..s आ जाएगा। ओह, यह तो हमे भी पता था क्या बेवकूफों की तरह पूछने लगता हूँ…!  अरे वाह ! सब आ गया..! उंह कौन सा न आता तो मेरा बड़ा भारी नुकसान होता..! कौन सी बढ़िया बात लिख दी थी मैने ! काम चलाऊ लिख ले रहा हूँ। अभी बहुत कुछ सीखना बाकी है। जीवन में कितना कुछ है सीखने के लिए ! उम्र कितनी कम ! कैसे तो लोग समय बर्बाद करते हैं ! कैसे तो लोग इक दूजे से झगड़ते रहते हैं..! क्या यह भी समय बर्बाद करना नहीं..! मुर्ख, मुर्खता में और बुद्धिमान, बुद्धिमानी में ! वह बुद्धि किस काम की जो किसी काम न आ सके..! जिससे किसी का भला न हो ! लिखने और करने में कितना फर्क है ! कवि जितना लिखता है उतना करता क्यों नहीं ! नहीं करता तो फिर क्यों लिखता है ? दूसरे करें..! दूसरे सुधरें..! जग सुधरेगा पर हम नहीं सुधरेंगे..! मंच पर किस कुशलता से समाज सुधार, कुरीतियों पर कटु प्रभार करते हुए मानवता की शिक्षा देंगे ! मंच से नीचे नीचे उतरते ही, मिलने वाले लिफाफे के लिए एक दूसरे से हाथापाई तक की नौबत ! लोभ, मोह, क्रोधसभी का एक साथ निर्लज्ज प्रदर्शन ! वाह रे उपदेशक ! अभी उस कवि सम्मेलन की  बात है, अपने मधुर गीत से मंच की वाह वाही लूटने वाले गीतकार महोदय, कितनी क्रूरता से  शेष न आए साथी कवि का लिफाफा भी झटकने के लिए आयोजक से उलझ रहे थे ! हास्य रस के कवि कितना क्रोध कर रहे थे ! कह रहे थे, मैं न आता तो तुम सब का करूण क्रंदन सुन, श्रोता श्मशान सिधार गए होते ! आधे माल पर तो मेरा ही हक बनता है। वीररस के देश भक्त कवि, देश भक्ति छोड़ कितना घिघिया रहे थे संचालक से ! मेरी पत्नी मेरी बाट जोह रही है, मैं वीरता पूर्वक यहां आपके बुलावे पर आ गया..! ऐसा ना कीजिए..! सोचिए जरा..हास्य रस वाले से कुछ कम ताली नहीं बजी थी मेरी कविता पर !” इक-इक ताली के दाम मांगे जा रहे थे..! अरे, मैं कहाँ भटक गया ! दरअसल कुछ चलने लगी हैं उंगलियाँ लैपटॉप पर। बैठकर लिखना कठिन हो गया था लगता है कुछ बात बन रही है। आज इतना ही अभ्यास काफी है। रात के 12 बज रहे हैं। शनीवार है तो क्या हुआ ! कल सुबह मार्निंग वॉक पर नहीं गया तो डार्लिंग ताने देगी…! बस हो गई आपकी घुमाई ? अब क्या पूछना है ! अब तो लैबटॉप भी कीन लिए ! करते रहिए ब्लॉगिंग रात-रात भर..! अरे ! ई का, वो अभीये आ रही हैं ! जाने कैसे जाग गईं ! भगवान भी चैन की नींद देना भूल गए का.. ई पति भक्त पत्नियों को। बस रात-दिन पतियों की चिंता में घुली जाती हैं ! अरे बंद करो रे.s.s..शुभ रात्रि।

अयोध्या फैसले के बाद…..

तीन चींटियाँ


तीन चीटिंयाँ
एक सीधी रेखा में चल रही थीं
सुनिए
आपस में क्या कह रही थीं….!
सबसे आगे वाली ने गर्व से कहा…
वाह !
मैं सबसे आगे हूँ
मेरे पीछे दो चींटियाँ चल रही हैं !
सबसे पीछे वाली ने दुःखी होकर कहा…..
हाय !
मैं सबसे पीछे हूँ
मेरे आगे दो चींटियाँ चल रही हैं !
बीच वाली से रहा न गया
उसने गंभीरता से कहा…
मेरे आगे भी दो चींटियाँ चल रही हैं !
मेरे पीछे भी दो चींटियाँ चल रही हैं !
उसकी बातें सुनकर
आगे-पीछे वाली दोनो चींटियाँ हँसने लगीं..
मूर्ख !
क्या कहती है ?
तू तो सरासर झूठ बोलती है !
बीच वाली ने उत्तर दिया…
मुर्ख मैं नहीं, तुम दोनो हो !
जो आगे पीछे के लिए
आपस में झगड़ रही हो !
यह छोटे मुंह बड़ी बोल है
शायद तुम्हें पता नहीं
पृथ्वी गोल है ।
यहाँ हर कोई उतना ही आगे है
जितना पीछे है
उतना ही पीछे है
जितना आगे है
या यूँ कहो कि
हर कोई आगे ही आगे है
या हर कोई पीछे ही पीछे है
या फिर यह समझो
कि कोई आगे नहीं है
कोई पीछे नहीं है
सभी वहीं हैं
जहाँ उन्हें होना चाहिए !
यह आगे-पीछे का झगड़ा
मनुष्यों पर छोड़ दो
हम श्रमजीवी हैं
हमें आपस में नहीं झगड़ना चाहिए।

सबसे अच्छे बापू…!


बापू
मैं जब भी आपकी तश्वीरें देखता हूँ
आप मुझे उतने अच्छे नहीं लगते वकील के कोट में
जितने अच्छे लगते हैं
धोती या लंगोट में !
दिल की बात सच-सच कह दूँ बापू !
आप सबसे अच्छे लगते हैं
पाँच-दस नहीं,
सौ-पचास भी नहीं,
पाँच सौ भी,
जब आते हैं….
हजार रूपए के नोट में !  

जै राम जी की।


        अयोध्या प्रकरण पर माननीय उच्च न्यायालय के फैसले का हम स्वागत करते हैं और आशा करते हैं कि यह फैसला मुल्क की तरक्की के राह में मील का पत्थर बनेगा। लम्बे समय से चले आ रहे विवाद को समाप्त करने और भाई चारे की नई शुरूवात करने का यह सुनहरा अवसर है, हमें इसे व्यर्थ नहीं गवाना चाहिए। आजकल आनंद की यादें में इतना डूबा हुआ हूँ कि नई कविता का सृजन नहीं हो पा रहा है। अब अयोध्या पर आए इस फैसले ने तो यादों के सभी तार एक ही झटके में झनझना दिए हैं। सुर-ताल गुम है।
            बाबा का दरबार कल सूना था। इतना सूना कि इसके पहले कभी नहीं देखा गया। सभी शिव भक्त राम की तलाश में गुम थे। भोले बाबा ने नंदी से पूछा, का रे बैल ! आज सब कहाँ हैं ? नंदी खुर पटक के बोले, हम हूँ जा रहे हैं..! सुना है भगवान राम का मंदिर बने वाला है !”
जै राम जी की ।