अयोध्या फैसले के बाद…..

तीन चींटियाँ


तीन चीटिंयाँ
एक सीधी रेखा में चल रही थीं
सुनिए
आपस में क्या कह रही थीं….!
सबसे आगे वाली ने गर्व से कहा…
वाह !
मैं सबसे आगे हूँ
मेरे पीछे दो चींटियाँ चल रही हैं !
सबसे पीछे वाली ने दुःखी होकर कहा…..
हाय !
मैं सबसे पीछे हूँ
मेरे आगे दो चींटियाँ चल रही हैं !
बीच वाली से रहा न गया
उसने गंभीरता से कहा…
मेरे आगे भी दो चींटियाँ चल रही हैं !
मेरे पीछे भी दो चींटियाँ चल रही हैं !
उसकी बातें सुनकर
आगे-पीछे वाली दोनो चींटियाँ हँसने लगीं..
मूर्ख !
क्या कहती है ?
तू तो सरासर झूठ बोलती है !
बीच वाली ने उत्तर दिया…
मुर्ख मैं नहीं, तुम दोनो हो !
जो आगे पीछे के लिए
आपस में झगड़ रही हो !
यह छोटे मुंह बड़ी बोल है
शायद तुम्हें पता नहीं
पृथ्वी गोल है ।
यहाँ हर कोई उतना ही आगे है
जितना पीछे है
उतना ही पीछे है
जितना आगे है
या यूँ कहो कि
हर कोई आगे ही आगे है
या हर कोई पीछे ही पीछे है
या फिर यह समझो
कि कोई आगे नहीं है
कोई पीछे नहीं है
सभी वहीं हैं
जहाँ उन्हें होना चाहिए !
यह आगे-पीछे का झगड़ा
मनुष्यों पर छोड़ दो
हम श्रमजीवी हैं
हमें आपस में नहीं झगड़ना चाहिए।
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34 thoughts on “अयोध्या फैसले के बाद…..

  1. वाह …बहुत अच्छी सीख दी चींटियों ने शायद तुम्हें पता नहींपृथ्वी गोल है ।यहाँ हर कोई उतना ही आगे हैजितना पीछे हैउतना ही पीछे हैजितना आगे है..एक सही सन्देश देती पोस्ट

  2. यह आगे-पीछे का झगड़ामनुष्यों पर छोड़ दोहम श्रमजीवी हैंहमें आपस में नहीं झगड़ना चाहिए।Bahut achhe tareeqese apni baat kahi hai! Wah!

  3. देवेंद्र जी, चीटियों से पहले ही बहुत कुछ सीखा है हमने आज एक पाठ और सिखला दिया आपने. अयोध्या फैसले के बाद कई लोगों के विचार यहाँ देखने सुनने को मिले. पर यह अद्वितिय है!

  4. यहाँ हर कोई उतना ही आगे हैजितना पीछे हैउतना ही पीछे हैजितना आगे हैवाह चीँटिओं के माध्यम से सुन्दर सन्देश्। कृ्प्या यहाँ भी देखें।http://veeranchalgatha.blogspot.com/

  5. यहाँ हर कोई उतना ही आगे है जितना पीछे हैउतना ही पीछे है जितना आगे है…vah….vichrotejak rachna.

  6. बेचारा आइना तो कुछ कहता नहीं है। सब अपना चेहरा उसमें देखते हैं और सोचते हैं यह आइना बता रहा है। आपकी कविता में से अगर अयोध्‍या शीर्षक हटा दिया जाए तो पूरा दृश्‍य ही बदल जाता है। अभी केवल उस एक पंक्ति की वजह से लोगों के मन में जो है वे उसे कविता में देख रहे हैं। वैसे मैं स्‍वतंत्र रूप से कहूं तो चींटियों का संवाद महत्‍वपूर्ण है।

  7. आदरणीय देवेन्द्र पाण्डेय जी नमस्कार ! आगे-पीछे का झगड़ामनुष्यों पर छोड़ दो कहां कहां तारीफ़ होती रहेगी मनुष्य की ?… और नादान को एहसास भी नहीं , हो रही जगहंसाई का !!अच्छी कविता ! अच्छा संदेश !शुभकामनाओं सहित- राजेन्द्र स्वर्णकार

  8. जज़्बात पर आपकी टिप्पणी का शुक्रिया ………मन का ही तो सब झगड़ा है …..मन के मत पे मत चलियो ये जीते जी मरवा देगा|

  9. देवेन्द्र जी, अच्छी शिक्षा है…हमारा तो मानना है-फ़ैसले के बादठहरे नहीं रहेंगे सदा एक मोड़ पररस्ता नया खुला है संभलकर चलेंगे हम जो फ़ैसला दिया है, अदालत ने, ठीक है इस फ़ैसले की मिलके हिफ़ाज़त करेंगे हम -शाहिद मिर्ज़ा शाहिद

  10. चीटियों की यह कथा है तो बहुत पुरानी लेकिन आपने इसे क्या खूब आज के सन्दर्भ मे प्रस्तुत किया है ।

  11. यह आगे-पीछे का झगड़ामनुष्यों पर छोड़ दोहम श्रमजीवी हैंहमें आपस में नहीं झगड़ना चाहिए।कविता का यह अंश अपने आप में पूर्ण होने का उद्घोष करता है……चींटियों के माध्यम से अपनी बात प्रभावशाली तरीके से कहने का आभार.

  12. यह आगे-पीछे का झगड़ामनुष्यों पर छोड़ दोहम श्रमजीवी हैंहमें आपस में नहीं झगड़ना चाहिए।Wah chintiyun ke madhyam se apne vyanjaja shabad shakti ke madhyam se insaan ko samjahane ka khub prayas kiya hai……1Sunder Prastuti

  13. यह आगे-पीछे का झगड़ामनुष्यों पर छोड़ दोहम श्रमजीवी हैं…..!!!!!!!!!!!!!!चींटियों ने भी क्या वाट लगाई है आदमी की…क्या क्या कहने के बाद कामचोर भी कह डाला…:)

  14. यह आगे-पीछे का झगड़ामनुष्यों पर छोड़ दोहम श्रमजीवी हैंहमें आपस में नहीं झगड़ना चाहिए।गजब आपकी कई kavitayen पढी नि:संदेह एक से बेहतर एक लेकिन इसने नि:शब्द कर दिया …कितनी गहरी बात आपने इतने सरल और एक नए ही अंदाज में कह दी दाद हाज़िर है क़ुबूल करें

  15. देवेन्द्र जी , अभी आपको पढ़ रही हूँ . अच्छा लग रहा है . रोचक ,मजेदार , सन्देश परक …….. है आपकी सभी रचनाएँ . देर से आई हूँ . पर वही आनंद ले रही हूँ . आपको शुभकामनायें ………

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