‘विजयोत्सव’

सुना है राम
तुमने मारा था मारीच को
जब वह
स्वर्णमृग बन दौड़ रहा था
वन-वन
तुमने मारा था रावण को
जब वह
दुष्टता की सारी हदें पार कर
लड़ रहा था तुमसे
युद्धभूमि में ।
सोख लिए थे उसके अमृत कलश
एक ही तीर से
विजयी होकर लौटे थे तुम
मनी थी दीवाली
घर-घर ।
मगर आज भी
जब मनाता हूँ विजयोत्सव
जलाता हूँ दिए
तो लगता है…….  
कोई हँस रहा है मुझपर….!
चलती है हवा
बुझती है लौ
उठता है धुआँ
तो लगता है……
जीवित हैं अभी
मारीच और रावण
मन कांप उठता है
किसी अनिष्ट की आशंका से….!
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45 thoughts on “‘विजयोत्सव’

  1. मगर आज भी जब मनाता हूँ ‘विजयोत्सव’ जलाता हूँ दिए तो लगता है……. कोई हँस रहा है मुझपर….!अप्रासंगिक हो गये हैं सन्दर्भ .. क्योकि रावण तो मरता ही नही हैबहुत सुन्दर रचना

  2. आशंका व्यर्थ नहीं है भ्राता!स्थिति वैसी ही है… स्वर्ण मृग के वेश पर तो राम ने भी शंका व्यक्त की थी, आज मारीच किस वेश में दिख जाए कहा नहीं जा सकता..पूर्व इसके कि गिरिजेश राव जी कहें आप युध्यभूमी को सुधारकर युद्धभूमि कर लें!!

  3. देवेन्‍द्र भाई हम सब की मुश्किल यह है कि रावण के बिना राम की अवधारणा अधूरी है। अगर रावण ही नहीं होगा तो राम क्‍या करेंगे। वैसे ही राम के बिना रावण के बिना राम की अवधारणा भी अधूरी है। दोनों एक दूसरे के पूरक हैं । इसलिए राम को याद करने के लिए हमें हर साल रावण को जिंदा करना ही पड़ता है।

  4. चलती है हवाबुझती है लौउठता है धुआँतो लगता है……जीवित हैं अभीमारीच और रावणमन कांप उठता हैकिसी अनिष्ट की आशंका से….!Sach hai! Isht kaal me bhee insaan anisht kee aashankaa se pare nahee ho pata!Behad sundar rachana!

  5. वाह वाह ……क्या बात हैप्रतीक का बड़ी सजगता से प्रयोग , सुंदर सन्देश का सम्प्रेषणशुभकामनयें

  6. आज तो इतने रावण हैं कि इतने राम कहाँ मिलेंगे ? अच्छी प्रस्तुति …रावण तो बस एक प्रतीक बन गया है ….खुद में छुपे रावणों को मारना होगा ..

  7. चलती है हवाबुझती है लौउठता है धुआँतो लगता है……जीवित हैं अभीमारीच और रावणमन कांप उठता हैकिसी अनिष्ट की आशंका से….!bahut umdaa!aap kee aashankaa nirmool naheen hai ,we jeevit hain aaj bhee alag alag shaklon men ,lekin Ram bhee hain jo un se ladne kee shakti hamen pradaan karte hain ,us ke lie sab se pahle hamen apne andar ke raawan ko maarna hoga.

  8. देवेन्द्र जी,दीपावली का शानदार तोहफा……..सच है पहले तो एक ही रावण था अब तो हर चेहरे में वही छिपा लगता है ….ये पंक्तियाँ बहुत अच्छी लगीं….मगर आज भीजब मनाता हूँ ‘विजयोत्सव’जलाता हूँ दिएतो लगता है……. कोई हँस रहा है मुझपर….!

  9. उद्वेलित करती रचना। लेकिन आशा नहीं छोडि़ये, रावण और मारीच हैं तो राम भी आते ही होंगे।राम के अवतरण के लिये रावण और मारीच का होना प्रीकंडीशन है।

  10. Acchi Rachna hai apkiमगर आज भी जब मनाता हूँ ‘विजयोत्सव’ जलाता हूँ दिए तो लगता है……. कोई हँस रहा है मुझपर….!

  11. सत्य कहा….आज तो असंख्य हैं रावण और मारीच…और चहुँ और फैला है ऐसा अँधियारा कि लाख दिए जला लिए जायं अन्धकार पर विजय नहीं पाया जा सकता..आपकी इस सुन्दर रचना ने मुग्ध कर लिया….कितना सुन्दर लिखते हैं आप…वाह !!!

  12. देवेन्द्र जी आज की सच्चाई कहती हुई आपकी यह सुंदर प्रस्तुति दिल जीत ली..आपके शब्दों में जादू है…बहुत बढ़िया रचना…बधाई स्वीकारें प्रणाम

  13. चलती है हवाबुझती है लौउठता है धुआँतो लगता है……जीवित हैं अभीमारीच और रावणमन कांप उठता हैकिसी अनिष्ट की आशंका से….!बिलकुल सही कहा। रावन घर घर मे मौज़ूद है। मगर राम कब सुनेंगे? अच्छी रचना के लिये बधाई।

  14. जीवित हैं अभीमारीच और रावणआशंकाओं को काटने के लिए और जो भी बाधाएं हैं , उनसे सहर्ष निपटने के लिए सतत तत्पर है राम…

  15. पाण्डेय जी वो तो था राम का जमान परन्तु आज के समाज में तो रावणत्व विद्यमान है |

  16. मगर आज भीजब मनाता हूँ ‘विजयोत्सव’जलाता हूँ दिएतो लगता है……. कोई हँस रहा है मुझपर….!kavita atyant prabhavi dhang se apni baat rakhti hai.shubhkamnayen.

  17. “नन्हें दीपों की माला से स्वर्ण रश्मियों का विस्तार -बिना भेद के स्वर्ण रश्मियां आया बांटन ये त्यौहार ! निश्छल निर्मल पावन मन ,में भाव जगाती दीपशिखाएं ,बिना भेद अरु राग-द्वेष के सबके मन करती उजियार !! “हैप्पी दीवाली-सुकुमार गीतकार राकेश खण्डेलवाल

  18. आप को सपरिवार दीपावली मंगलमय एवं शुभ हो!मैं आपके -शारीरिक स्वास्थ्य तथा खुशहाली की कामना करता हूँ

  19. .लगता है……जीवित हैं अभीमारीच और रावण…——-मेरा मन भी सशंकित रहता है।.

  20. संसद पर हमला… रावण ही तो था वो!पेंटागन ध्वस्त… रावण ही तो था वो!मुम्बई का ताज होटल तहस-नहस…रावण ही तो था वो!दहेज-हत्याएँ…रावण ही तो करता है!बलात्कार…रावण ही तो करता है!हुज़ूर… हर जगह रावण मौजूद हैं…बस रूपाकार-मात्र बदलता है!अस्तु आपकी आशंकाएँ निर्मूल नहीं…!

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