मुट्ठी भर धूप

…………………………….

एक प्रश्न करना था

बूढ़ी होती जा रही संध्या से

न कर सका

एक प्रश्न करना था

उषा की लाली से

न कर सका

न जाने कैसे

दुष्ट सूरज

जान गया सब कुछ

किरणों से मिलकर

लगाने लगा ठहाके

उत्तर आइनों से निकलकर

जलाने लगे

मेरी ही हथेलियॉं।

सहज नहीं है

कैद करना

धूप को

मुट्ठियों में।

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34 thoughts on “मुट्ठी भर धूप

  1. सूरज को मुट्ठियों में बंद करना है कठिनपर दीप कोई बालकर देखें ज़रादो हाथ उसके पास रखकर उसको बुझने से बचाएँ..प्रश्न का उत्तर मिलेगा बस वहीं से!!.देवेंद्र जी ये तो तुकबंदी है, पर आपकी कविता बड़ी ही सुंदर लगी!!हर बार की तरह अनोखी!!

  2. सहज नहीं हैकैद करनाधूप कोमुट्ठियों में। हथेलिया गरम हो रही हैं लोगो की, शायद अपने हिस्से का सूरज कैद कर रहे होंगे

  3. सहज नहीं हैकैद करनाधूप कोमुट्ठियों में …बहुत ही लाजवाब पंक्तियाँ हैं … सच है इस तरक्की को भी प् कर भी सहज रहना आसान नहीं है ….

  4. देवेन्द्र जी,बहुत खूब…हर बार की तरह कम शब्दों में एक बेहतरीन पोस्ट…..सच है जी धूप को बंद करना मुश्किल है….पर एक सवाल ये भी है की क्यूँ धूप को पकड़ना चाहते हैं लोग……क्या वो संसार के हर प्राणी के लिए नहीं है ?

  5. हमेशा की तरह अनोखे बिम्ब गढे हैं आपने ! खूबसूरत अंदाजे बयान !

  6. ये घड़ी कहाँ से चुराई आपने ……???सुना था पिछली बार आपका कुछ प्लान बन रहा था उड़ाने का ……उत्तर आइनों से निकलकरजलाने लगेमेरी ही हथेलियॉं।ये जीवन प्रश्नों से भरा है और उत्तर यूँ ही हथेलियाँ जलाते रहते हैं …..ठहाकों के साथ ….ये आग का दरिया ही तो लांघना है …..!!

  7. रचना मेंभाव छिपे हैं …पढने से सुकून मिलता है .शुभकामनाओं के लिए शुक्रिया .

  8. दुष्ट सूरज जान गया सब, किरणों से मिलकर…….सुन्दर रचना. मैंने आपको प्रथम बार पढ़ा है, काफी अच्छा लगा, सुन्दर रचना के लिए आपका, धन्यवाद

  9. सुन्दर अभिव्यक्ति … असम्भव चाहत पर …. सुन्दर कल्पना . .. आनंद आया पढ़कर …शुभकामनाएं

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