नव वर्ष के शुभ संदेशे

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पहले प्रीतम की पाती में
अब आते मोबाइल में।
नया साल शुभ हो कहते हैं
नई अदा, स्टाईल में।

कभी इधर तो कभी उधर को
दौड़ा-भागा करते है
सबकी खुशियों की खातिर ये
हरदम जागा करते हैं

मरहम के फाए होते हैं
छोटी सी स्माईल में। [नया साल शुभ हो……]

झूठे निकले शुभ संदेशे
आए पिछले सालों में
रीते अपने सभी सपन घट
दुनियाँ के जंजालों में

कहते फेंको ऐसी बातें
रद्दी वाली फाईल में। [नया साल शुभ हो……]

सेंचुरियन का मतलब है सचिन तेंदुलकर….!

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मैं नहीं जानता कि सेंचुरियन का वास्तविक अर्थ क्या है ! दक्षिण अफ्रिका के इस खेल मैदान को सेंचुरियन क्यों कहते हैं ? गूगलिंग करके जानने का प्रयास किया तो हर बार सेचुरियन खेल मैदान का ही जिक्र। माथा खराब होता और गूगलिंग बंद कर देता। आज जाना कि सेंचुरियन का मतलब है सचिन तेंदुलकर। काशीका बोली में ‘ईयन’ लगा देने से शब्द का बहुवचन हो जाता है। जैसे जंगली काबहुवचन ‘जंगलियन’। लड़की का बहुवचन ‘लड़कियन’। वैसे ही सेचुरी का बहुवचन ‘सेंचुरियन’ हुआ। एक सेंचुरी लगाने वाले को सेंचुरी बाज तो ढेर सारी सेंचुरी लगाने वाले को सेंचुरियन कहा जाय तो क्या गलत है ! सचिन ने तो आज सेचुरी का अर्द्ध शतक ही पूरा कर लिया है। पूरा राष्ट्र सचिन की इस सफलता से प्रसन्न है। बीच-बीच में आने वाले खुशी के ऐसे लम्हों से ही राष्ट्र गौरवान्वित होता है। आज सचिन ने अपने देशवासियों को नव वर्ष के पूर्व ही एक नायाब तोहफा दिया है। हमें सचिन पर गर्व है। हम उनकी इस महान सफलता के लिए उन्हें बधाई देने के साथ-साथ अपना आभार भी व्यक्त करते हैं। आज सचिन ने क्रिकेट के इतिहास में मील का एक और पत्थर पार कर लिया है। आज मुझे सेचुरियन का अर्थ भी ज्ञात हो गया। सेंचुरियन का मतलब है सचिन तेंदुलकर। आइए हम खुशियाँ मनाएं और उन्हें इस सफलता के लिए बधाई दें।

(चित्र गूगल से साभार)

ऐसा क्यों होता है ?

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न जाने क्यों

जब प्रश्नों के अपने ही उत्तर

बदलने लगते हैं

अच्छे नहीं लगते।

मेरे प्रश्न

मुझ पर हँसते हैं

मैं हैरान हो

अपना वजूद कुरेदने लगता हूँ

अतीत

कितना सुखद प्रतीत होता है न !

ऐसा क्यों होता है ?

न जाने क्यों

मेरे उत्तर

बूढ़े बन जाते हैं धीरे-धीरे

नकारते  चले जाते हैं

अपनी ही स्वीकृतियाँ

अपने ही दावे

मेरा बच्चा मन

मेरे भीतर मचलने लगता है

मैं किंकर्तव्यविमूढ़ हो

अपने उत्तर समेटने लगता हूँ

बचपना भला प्रतीत होता है न !

ऐसा क्यों होता है ?

मेरी पहली मार्निंग वॉकिंग…..व्यंग्यात्मक संस्मरण

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थोड़ी लम्बी हो गई है। चाहता तो दो किश्तों में भी प्रकाशित कर सकता था। आप चाहें तो दो बार में पढ़ सकते हैं। पढ़ना शुरू तो कीजिए……
                    चार वर्षों के लिए मेरा भी बस्ती गमन (1994-1998) हुआ था। बस्ती अयोध्या से लगभग 70 किमी दूर स्थित शहर का नाम है। यहाँ पर रहने से ज्ञान हुआ कि बस्ती के संबंध में मुझसे पहले किसी बड़े लेखक ने लिख दिया है…बस्ती को बस्ती कहूँ तो का को कहूँ उजाड़ ! बड़े लेखकों में यही खराबी होती है कि वे हम जैसों के लिखने के लिए कुछ नहीं छोड़ते। मेरे में भी इस शहर के बारे में अधिक कुछ लिखने की क्षमता नहीं है सिवा इसके कि यह एक दिन के मुख्य मंत्री का शहर है। सबसे अच्छी बात तो बड़े लेखक ने लिख ही दी। छोटे शहरों की एक विशेषता होती है कि आपको कुछ ही दिनो में सभी पहचानने लगते हैं। मानना आपके आचरण पर निर्भर करता है। आचरण की सामाजिक परिभाषा आप जानते ही हैं। कवि समाजिक होना चाहता है मगर हो नहीं पाता। इस शहर में नौकरी पेशा लोगों के लिए जीवन जीना बड़ा सरल है। 4-5 किमी लम्बी एक ही सड़क में दफ्तर, बच्चों का स्कूल, अस्पताल, सब्जी, मार्केट, बैंक, डाकखाना, खेल का मैदान सभी है। एक पत्नी. दो बच्चे हों और घर में टी0वी0 न हो तो कम कमाई में भी जीवन आसानी से कट जाता है।
                   एक दिन कद्दू जैसे पेट वाले वरिष्ठ शर्मा जी मेरे घर पधारे और मार्निंग वॉक के असंख्य लाभ एक ही सांस में गिनाकर बोले, “पाण्डे जी, आप भी मार्निंग वॉक किया कीजिए। आपका पेट भी सीने के ऊपर फैल रहा है !” घबड़ाकर पूछा, “सीने के ऊपर फैल रहा है ! क्या मतलब ? शर्मा जी ने समझाया, “सीने के ऊपर पेट निकल जाय तो समझ जाना चाहिए कि आप के शरीर में कई रोगों का स्थाई वास हो चुका है ! हार्ट अटैक, शूगर, किडनी फेल आदि होने की प्रबल संभावना हो चुकी है।“ शर्मा जी ने इतना भयावह वर्णन किया कि मैं आतंकी विस्फोट की आशंका से ग्रस्त सिपाही की तरह भयाक्रांत हो, मोर्चे पर जाने के लिए तैयार हो गया। डरते-डरते पूछा, “कब चलना है ? शर्मा जी ने मिलेट्री कप्तान की तरह हुक्म सुना दिया, “कल सुबह ठीक चार बजे हम आपके घर आ जाएंगे, तैयार रहिएगा।
                    मार्निंग वॉक के नाम पर की जाने वाली निशाचरी से मैं हमेशा से चिढ़ता रहा हूँ। ये क्या कि सड़क पर घूमते आवारा कुत्तों के साथ ताल पर ताल मिलाते हुए, मुँह अंधेरे, धड़कते दिल घर से निकल पड़े। चार बजे का नाम सुनते ही मेरी रूह भीतर तक कांप गई। जैसे मेरी भर्ती कारगिल युद्ध लड़ने के लिए सेना में की जा रही हो। मैने पुरजोर विरोध किया, “अरे सुनिए, आप तो मार्निंग वॉक की बात करते-करते निशाचरी का प्रोग्राम बनाने लगे ! रात में भी कोई घूमता है ? मैं क्या रोगी-योगी हूँ ? भोगी इतनी सुबह नहीं उठ सकता ! कुत्ते ने काट लिया तो ? शर्मा जी मेरी तरफ ऐसे देखने लगे जैसे कोई नकल मार कर परीक्षा उत्तीर्ण करने वाला विद्यार्थी, फेल विद्यार्थी को हिकारत की निगाहों से देखता है। जैसे कोई रो-धो कर मिलेट्री की ट्रेनिंग ले चुका जवान नए रंगरूट को पहली बार आते देखता है। फिर समझाते हुए बोले, “पाण्डेय जी, आप तो समझते नहीं हैं। चार बजे घर से नहीं निकले तो देर हो जाएगी। पाँच बजे के बाद तो सब लौटते हुए मिलेंगे।“ मैने फिर विरोध किया, “अरे छोड़िए, सब लौटते हुए मिलें या लोटते हुए ! नाचते हुए मिलें या रोते हुए ! हमें इससे क्या ? हम तो तब चलेंगे जब प्रभात होगा।“ मगर शर्मा जी को नहीं मानना था, नहीं माने। जिद्दी बच्चों की तरह यूँ छैला गए मानो उन्हें जिस डाक्टर ने मार्निंग वॉक की सलाह दिया था, उसी ने 4 बजे का समय भी निर्धारित किया था। बोले, “देखिए आपने वादा किया है ! चलना ही पड़ेगा। चल कर तो देखिए फिर आप खुद कहेंगे कि चार बजे ही ठीक समय है।“ मरता क्या न करता ! हारकर चलने के लिए राजी हो गया । मुझे शर्मा जी ऐसे प्रतीत हुए मानो सजा सुनाने वाला जज भी यही, फाँसी पर चढ़ाने वाला जल्लाद भी यही । जाते-जाते मुझे सलाह देते गए, “एक छड़ी रख लीजिएगा !”
                   छड़ी क्या मैं उस घड़ी को कोसने लगा जब मैने शर्मा जी से मार्निंग वॉक पर चलने का वादा किया था। मेरे ऊपर तो मुसीबतों का पहाड़ ही टूट गया। शुक्र है कि उन दिनों ब्लॉगिंग का शौक नहीं था लेकिन देर रात तक जगना, टी0वी0 देखना या कोई किताब पढ़ना मेरी आदत रही है। अब ब्लॉगिंग ने टी0वी0 का स्थान ले लिया है। मैं कभी घड़ी देखता, कभी उस दरवाजे को देखता जिससे शर्मा जी अभी-अभी बाहर गये थे। मन ही मन खुद को कोस रहा था कि साफ मना क्यों नहीं कर दिया ! संकोची स्वभाव होने के कारण मेरे मुख से जल्दी नहीं, नहीं निकलता और अब किया भी क्या जा सकता था ! सोने से पहले जब मैने अपना फैसला श्रीमती जी को सुनाया तब उन्हें घोर आश्चर्य हुआ। वह बोलीं, “आज ज्यादा भांग छानकर तो नहीं आ गए ! तबीयत तो ठीक है !! उठेंगे कैसे ?” एक साथ इतने सारे प्रश्नों को सुनकर ऐसा लगा जैसे मिलेट्री में भरती होने से पहले साक्षात्कार शुरू हो गया हो ! बंदूक से निकली गोली और मुख से निकली बोली कभी वापस नहीं आती। अब अपनी बात से पीछे हटना मेरी शान के खिलाफ था। मैं बोला, “आप समझती क्या हैं ? मैं उठ नहीं सकता ! आप उठा के तो देखिए मैं उठ जाउंगा !!” श्रीमती जी मुझे ऐसे देख रही थीं जैसे उस पागल को जो मेरे घर कल सुबह-सुबह मुझसे पैसे मांग रहा था। फिर उन्होंने हंसते हुए कहा, “मैं क्यों उठाने लगी ? क्या मुझे भी घुमाने ले चलोगे !” मैं कभी शर्मा जी को याद करता कभी श्रीमती जी को साथ लिए अंधेरे में घूमने की कल्पना करता। झल्लाकर बोला, “आप रहने दीजिए, मैं अलार्म लगा कर सो जाउंगा।“ मैने सुबह 4 बजे का अलार्म लगाया और बिस्तर में घुस गया। मार्निंग वॉक और कुत्तों की कल्पना करते-करते गहरी नींद में सो गया।
                     जब मेरी नींद खुली तो पाया कि मेरी श्रीमती जी मुझे ऐसे हिला रही थीं जैसे कोई रूई धुनता हो और शर्मा जी दरवाजा ऐसे पीट रहे थे जैसे रात में उनकी बीबी कहीं भाग गई हो ! मैं हड़बड़ा कर जागृत अवस्था में आ गया। सर्वप्रथम तीव्र विद्युत प्रवाहिनी स्त्री तत्पश्चात टिकटिकाती घड़ी का दर्शन किया। घड़ी में चार बजकर पंद्रह मिनट हो रहे थे ! दरवाजे पर शर्मा जी अनवरत चीख रहे थे ! मैने उठकर ज्यों ही दरवाजा खोला शर्मा जी किसी अंतरिक्ष यात्री की तरह घर के अंदर घुसते ही गरजने लगे, “अभी तक सो रहे थे ? 15 मिनट से दरवाजा पीट रहा हूँ !” जैसे मिलेट्री का कप्तान डांटता है। उनकी दहाड़ सुनकर सुनकर सबसे पहले तो मेरा मन किया, दो झापड़ लगाकर पहले इसे घर के बाहर खदेड़ूं और पूछूं, “क्या रिश्ते में तू मेरा बाप लगता है ?” मगर क्या करता, अपनी बुलाई आफत को कातर निगाहों से देखता रहा। माफी मांगी, कुर्सी पर बिठाया और बेड रूम में जाकर घड़ी देखने लगा। तब तक मृदुभाषिणी दामिनी की तरह चमकीं, “घड़ी को क्यूँ घूर रहे हैं ? मैने ही अलार्म 6 बजे का कर दिया था ! सोचा था न बजेगा न आप उठेंगे !! चार बजे उठना हो तो कल से बाहर वाले कमरे में तकिए के नीचे अलार्म लगा कर सोइएगा और बाहर से ताला लगाकर चले जाइएगा ! मैं 6 बजे से पहले नहीं उठने वाली। अपने शर्मा जी को समझा दीजिए कि रात में ऐसे दरवाजा न पीटा करें।“ मैं सकपकाया। यह समय पत्नी से उलझने का नहीं था। एक जल्लाद पहले से ही ड्राईंगरूम में बैठा था ! दूसरे को जगाना बेवकूफी होती । जल्दी से जो मिला पहनकर बाहर निकल पड़ा। मेरे बाहर निकलते ही फटाक से दरवाजा बंद होने की आवाज सुनकर शर्मा जी मेंढक की तरह हंसते हुए बोले, “हें..हें..हें..लगता है भाभी जी नाराज हो गईं !” मैं उनके अजूबेपन को अपलक निहारता, विचारों की तंद्रा से जागता, खिसियानी हंसी हंसकर बोला, “नहीं, नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है।“
                    शर्मा जी काफी तेज चाल से चलते हुए एक बदबूदार गली में घुसे तो मुझसे न रहा गया। मैने पूछा, “ये कहाँ घुसे जा रहे हैं ? इसी को कहते हैं शुद्ध हवा ? शर्मा जी बोले, “बस जरा सिंह साहब को भी ले लूँ ! मेरे इंतजार में बैठे होंगे। एक मिनट की देर नहीं होगी। वो तो हमेशा तैयार रहते हैं।“ शर्मा जी बिना रूके, बिना घुमे, बोलते-बोलते गली में घुसते चले गए। अंधेरी तंग गलियों को पारकर वे जिस मकान के पास रूके उसके बरामदे पर एक आदमी टहल रहा था। दूर से देखने में भूत की तरह लग रहा था। हम लोगों को देखते ही दूर से हाथ हिलाया और लपककर नीचे उतर आया। आते ही उलाहना दिया, “बड़ी देर लगा दी !” मैने मन ही मन कहा, “साला.. मिलेट्री का दूसरा कप्तान ! कहीं ‘बड़ी देर हो गई’ सभी मार्निंग वॉकर्स का तकिया कलाम तो नहीं !” मैं अपराधी की तरह पीछे-पीछे चल रहा था और शर्मा जी, सिंह साहब से मेरा परिचय करा रहे थे, “आप पाण्डेय जी हैं। आज से ये भी हम लोगों के साथ चलेंगे।“ सिंह साहब ने मुझे टार्च जलाकर ऐसे देखा मानो सेना में भर्ती होने से पहले डा0 स्वास्थ्य परीक्षण कर रहा हो ! संभवतः इसी विचार से प्रेरित हो मेरी जीभ अनायास बाहर निकल गई ! सिंह साहब टार्च बंदकर हंसते हुए बोले, बड़े मजाकिया लगते हैं ! उनके हाव भाव से मुझे यकीन हो गया कि वे मन ही मन कह रहे हैं, “इस जोकर को कहाँ से पकड़ लाए !”
                       रास्ते भर सिंह साहब मार्निंग वॉक के लाभ एक-एक कर गिनाते चले गए और मैं अच्छे बच्चे की तरह हूँ, हाँ करता, मार्ग में दिखने वाले अजीब-अजीब नमूनों को कौतूहल भरी निगाहों से यूँ देखता रहा जैसे कोई बच्चा अपने पापा के साथ पहली बार मेला घूमने निकला हो। एक स्मार्ट बुढ्ढा, चिक्कन गंजा, हाफ पैंट और हाफ शर्ट पहन कर तेज-तेज चल रहा था। कुछ युवा दौड़ रहे थे तो कोई शर्मा जी की तरह अंतरिक्ष यात्री जैसा भेषा बनाए फुटबाल की तरह लुढ़क रहा था। शर्मा जी सबको दिखा कर मुझसे बोले, “देख रहे हैं पाण्डे जी ! (मैने सोचा कह दूं क्या मैं अंधा हूँ ? मगर चुप रहा) क्या सब लोग मूर्ख हैं ? देखिए, वो आदमी कितनी तेज चाल से चल रहा है ! चलिए उसके आगे निकलते हैं !! शर्मा जी लगभग दौड़ते हुए और हम सबको दौड़ाते हुए उसके बगल से उसे घूरकर विजयी भाव से आगे निकलने लगे तो वह आदमी जो दरअसल ट्रेन पकड़ने के लिए दौड़ रहा था, मार्निंग वॉकर नहीं था, हमें रोककर पूछ बैठा, “ आप लोगों को कौन सी ट्रेन पकड़नी है ?” उसके प्रश्न को सुनकर शर्मा जी हत्थे से उखड़ गए, “मैं आपको ट्रेन पकड़ने वाला दिखता हूँ ?” लगता है वो आदमी भी शर्मा जी का जोड़ीदार था। पलटकर बोला, “तो क्या चंदा की सैर पर निकले हो ? चले आते हैं सुबह-सुबह माथा खराब करने !” किसी तरह हम लोगों ने बीच बचाव किया तो मामला शांत हुआ।
                          हम लोग जब मैदान में पहुँचे तो वहाँ कई लोग पहले से ही गोल-गोल मैदान का चक्कर लगा रहे थे। शर्मा जी, सिंह साहब के साथ यंत्रवत तेज-तेज, गोल-गोल घूमने लगे और मैं एक जगह बैठकर वहाँ के दृष्य का मूर्खावलोकन करने लगा। पूर्व दिशा में ऊषा की किरणें आभा बिखेर रही थीं। सूर्योदय का मनोहारी दृष्य था। मैने बहुत दिनो के बाद उगते हुए सूर्य को देखा था। मेरा मन जगने के बाद पहली बार प्रसन्नता से आल्हादित हो उठा। चिड़ियों की चहचहाहट, अरूणोदय की लालिमा, हवा की सरसराहट ने न जाने मुझ पर कैसा जादू किया कि मैं भी उन्हीं लोगों की तरह गोल-गोल दौड़ने लगा ! दौड़ते-दौड़ते मेरी सांस फूलने लगी। मैं हाँफने लगा मगर देखा, शर्मा जी और सिंह साहब दौड़ते ही चले जा रहे हैं ! मारे शरम के मैं भी बिना रूके दौड़ता रहा। अनायास क्या हुआ कि मेरा सर मुझसे भी जोर-जोर घूमने लगा। मुझे लगा कि मुझे चक्कर आ रहा है ! घबड़ाहट में पसीना-पसीना हो गया और भागकर बीच मैदान में पसर गया ! यह तो नहीं पता कि मुझे नींद आ गई थी या मैं बेहोश हो गया था लेकिन जब मेरी आँखें खुलीं तो मार्निंग वॉकर्स की भीड़ मुझे घेर कर खड़ी थी ! शर्मा जी मेरे चेहरे पर पानी के छींटे डाल रहे थे। एक दिन की मार्निंग वॉकिंग ने मुझे शहर में ऐसी प्रसिद्धि दिला दी थी जो शायद शर्मा जी आज तक हासिल नहीं कर पाए होंगे।

मन की गाँठें खोल

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खुल्लम खुल्ला बोल रे पगले
खुल्लम खुल्ला बोल ।
मन की गाँठें खोल रे पगले
मन की गाँठें खोल ।।

मैं अटका श्वेत-स्याम में
दुनियाँ रंग-बिरंगी
कठिन डगर है, साथी वैरी
चाल चलें सतरंजी

गर्जन से क्या घबड़ाना रे
ढोल-ढोल में पोल ।
मन की गाँठें खोल रे पगले
मन की गाँठें खोल ।।

काम, क्रोध, लोभ, मोह से
कभी उबर ना पाया
ओढ़ी तो थी धुली चदरिया
फूहड़, मैली पाया

खुद को धोबी बना रे पगले
सरफ ज्ञान का घोल ।
मन की गाँठें खोल रे पगले
मन की गाँठें खोल ।।

ब्लॉगर सम्मेलन

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                          जहाँ तहाँ हो रहे ब्लॉगर सम्मेलन की खबरें पढ़ कर हम भी पूरी तरह बगुलाए हुए थे कि कब मौका मिले और चोंच मारें, तभी श्री अरविंद मिश्र जी का फोन घनघनाया, “हम लोग भी कुछ करेंगे ? कुछ नहीं तो बनारस में जितने ब्लॉगर हैं उन्हीं को जुटाकर एक मीटिंग कर लेते हैं ! सांस्कृतिक संकुल में शिल्प मेला लगा है इसी बहाने मेला भी घूम लेंगे और एक-दूसरे से परिचय भी हो जाएगा।“ अंधा क्या चाहे दो आँखें ! मैने कहा, “हाँ, हाँ, क्यों नहीं ! एक पंडित जी को मैं भी जानता हूँ जो पंहुचे हुए कवि और दो-चार पोस्ट पर अटके हुए नए-नए ब्लॉगर हैं। मेरे जवाब से उत्साहित होकर अरविंद जी बड़े प्रसन्न हुए, एक-दो को तो मैं भी जानता हूँ, आप बस समय तय कीजिए सारा इंतजाम हमारा रहेगा।
                         मेरी तो बाछें खिल गईं। खुशी का ठिकाना न रहा। बहुत दिनो से अरविंद जी की मेहमान नवाजी के किस्से उनके ब्लॉग पर पढ़-पढ़ कर अपनी जीभ लपालपा रही थी। आज उन्होने स्वयम् मौका दे ही दिया। मैने तुरंत अपने कोटे के एकमात्र ब्लॉगर पंडित उमा शंकर चतुर्वेदी ‘कंचन’ जी को फोन मिलाया, “कवि जी ! बनारस में ब्लॉगर सम्मेलन है.! आपको आना है। कवि जी कुछ उल्टा सुन बैठे, “क्या कहा ? पागल सम्मेलन ! ई कब से होने लगा बनारस में ? मूर्ख, महामूर्ख सम्मेलन तो होता है, 1अप्रैल को ! जिसका मैं स्थाई सदस्य हूँ । जाड़े में यह पागल सम्मेलन तो पहली बार सुना ! बनारस में बहुत हैं, बड़ी भीड़ हो जाएगी…! मुझे नहीं जाना।“ मैने सरपीट लिया, अरे नहीं ‘कंचन’ जी पागल नहीं, ब्लॉगर सम्मेलन ! इनकी संख्या बस अंगुली में हैं। अच्छा रहने दीजिए मैं आपको मिलकर समझाता हूँ। शाम को जब मैं उनसे मिला तो पूरी बात जानकर उनकी भी प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। कहने लगे, “लेकिन गुरू ई नाम ठीक नहीं लग रहा है..ब्लॉगर ! विदेशी संस्कृति झलक रही है। मैने कहा, “तकनीक आयातित है मगर कलाकार सभी देसी हैं। अपने रंग में ढ़ालना तो हमारा काम है।“ कंचन जी बोले, “चलिए, ठीक है।“
                      सौभाग्य से ब्लागिंग के दरमियान श्री एम. वर्मा जी की भी बनारस आने की खबर  हाथ लग गई। वे अपने भतीजे की शादी के सिलसिले में बनारस आ रहे थे। उनसे संपर्क साधा तो वे भी बड़े प्रसन्न हुए। अपना कोटा पूरा करके जब मैंने अरविंद जी से फोन मिलाया तो वर्मा जी के भी आने की खबर ने उन्हें और भी उत्साहित कर दिया। चार दिसंबर की तिथि तय की गई। स्थान सांस्कृतिक संकुल से बदल कर अरविंद जी का घर हो गया। निर्धारित समय से आधा घंटा पहले ही मैं जाकर ‘नाटी इमली’ चौराहे पर खड़ा, कभी विश्व प्रसिद्ध ‘भरत मिलाप के मैदान’ को देखता तो कभी वर्मा जी और कंचन जी को फोनियाता। मैने सोचा इस मैदान में राम नगर की प्रसिद्ध रामलीला के अवसर पर जब राम-भरत का मिलाप होता है तो कितनी भीड़ होती है ! यहाँ दो ब्लॉगर पहली बार मिल रहे हैं तो सांड़ भी चैन से खड़ा नहीं होने देता ! कभी इधर तो कभी उधर सींग ऊठाए चला आता है।
                       अधिक इंतजार नहीं करना पड़ा। स्वतः उत्साहित कंचन जी और वर्मा जी के साथ जब हम अरविंद जी के घर पहुँचे तो वहाँ नई कविता के सशक्त हस्ताक्षर व ब्लॉग जगत के श्रेष्ठ कवियों में से एक ‘आर्जव’, ख्याति प्राप्त कलाकार उत्तमा दीक्षित जी के साथ अरविंद जी ने जिस गर्मजोशी के साथ स्वागत किया इसको लिखने के लिए मेरी कलम कम पड़ रही है। सभी से तो मैं उनके ब्लॉग को पढ कर भली भांति परिचित था। लगा ही नहीं कि पहली पार मिल रहा हूँ लेकिन उत्तमा जी को लेकर मेरी स्थिति हास्यासपद हो गई। मैने उन्हें विद्यार्थी समझा मगर जब अरविंद जी ने परिचय कराया कि आप काशी हिंदू विश्वविद्यालय में वरिष्ठ प्रवक्ता हैं तो मेरा माथा ही घूम गया। इतनी सरलता, इतनी विनम्रता से वे मिलीं कि लगा कि ये एक अच्छी कलाकार हैं मगर आज जब उनका ब्लॉग देखा तो महसूस हुआ कि मैं मूरख कितने महान कलाकार के रूबरू बैठकर चला आया और उन्होने किंचित मात्र भी अपनी श्रेष्ठता का एहसास नहीं होने दिया।
                           अरविंद जी की मेहमान नवाजी की चर्चा न की जाय तो सारा लिखना बेकार। अपनी गिद्ध दृष्टि भी उधर ही अटकी हुई थी। एक से बढ़कर एक गर्मागर्म आईटम..एक खतम नहीं की दूजा शुरू। वे कहते, “एक और ?” मैं कहता, “आप चिंता ना करें, स्थान और लेने का ज्ञान मुझे बखूबी हो गया है !” वर्मा जी,  आर्जव जी फोटो खींचने में व्यस्त, हम उधर माल उड़ाने में मस्त। अरविंद जी से मिलकर किसी को भी यह सहज आश्चर्य हो सकता है कि इतनी विनम्रता, प्रसन्नता और सहजता से मिलने वाले व्यक्ति की कलम की धार इतनी कठोर कैसे हो सकती है !
                           पोस्ट तो लिख दी लगता है। अब सबसे बड़ी समस्या यह है कि फोटू कहाँ से उड़ाई जाय ? अपन तो भैया प्लेट खींचने में जुटे थे फोटुवा तो आर्जव और वर्मा जी खींच रहे थे । देखें उन्हीं के ब्लॉग से उड़ाने का प्रयास करते हैं….

यात्रा

…………….

सुपरफास्ट ट्रेन में बैठकर

तीव्र गति से भाग रहे थे तुम

तुमसे बंधा

यात्री की तरह बैठा

खिड़की के बाहर देख रहा था मैं ।


चाहता था पकड़ना

छूट रहे गाँव

घूमना

सरसों की वादियों में

खेलना

दोस्तों के साथ

क्रिकेट

भाग रहे थे तुम

और छूट रहे थे मेरे साथी, मेरे खेल

हेरी, मिक्की, तितलियाँ

गाय, भैंस, बकरियाँ

बिजली के खम्भों से जुड़े तार तो

चलते थे साथ-साथ

मगर झट से ओझल हो जाती थी

उस पर बैठी

काले पंखों वाली चिड़िया

तुम्हारे चेहरे से फिसलते

खुशियों वाले क्षणों की तरह।

रास्ते में कई स्टेशन आये

तुमको नही उतरना था

तुम नहीं उतरे

मेरे लाख मनाने के बाद भी

चलते रहे, चलते रहे

अब

जब हवा के हल्के झोंके से भी

काँपने लगे हो तुम

थक गए हैं तुम्हारे पाँव

आँखों में है

घर का आंगन

नीम की छाँव

चाहते हो

रूकना

चाहते हो उतरना

चाहते हो

साथ…!

खेद है मित्र !

अब नहीं चल सकता मैं तुम्हारे साथ

मित्रता की भी

एक सीमा होती है ।