यात्रा

…………….

सुपरफास्ट ट्रेन में बैठकर

तीव्र गति से भाग रहे थे तुम

तुमसे बंधा

यात्री की तरह बैठा

खिड़की के बाहर देख रहा था मैं ।


चाहता था पकड़ना

छूट रहे गाँव

घूमना

सरसों की वादियों में

खेलना

दोस्तों के साथ

क्रिकेट

भाग रहे थे तुम

और छूट रहे थे मेरे साथी, मेरे खेल

हेरी, मिक्की, तितलियाँ

गाय, भैंस, बकरियाँ

बिजली के खम्भों से जुड़े तार तो

चलते थे साथ-साथ

मगर झट से ओझल हो जाती थी

उस पर बैठी

काले पंखों वाली चिड़िया

तुम्हारे चेहरे से फिसलते

खुशियों वाले क्षणों की तरह।

रास्ते में कई स्टेशन आये

तुमको नही उतरना था

तुम नहीं उतरे

मेरे लाख मनाने के बाद भी

चलते रहे, चलते रहे

अब

जब हवा के हल्के झोंके से भी

काँपने लगे हो तुम

थक गए हैं तुम्हारे पाँव

आँखों में है

घर का आंगन

नीम की छाँव

चाहते हो

रूकना

चाहते हो उतरना

चाहते हो

साथ…!

खेद है मित्र !

अब नहीं चल सकता मैं तुम्हारे साथ

मित्रता की भी

एक सीमा होती है ।

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28 thoughts on “यात्रा

  1. शब्द सामर्थ्य, भाव-सम्प्रेषण, संगीतात्मकता, लयात्मकता की दृष्टि से कविता अत्युत्तम है। संवेदना के कई स्‍तरों का संस्‍पर्श करती यह कविता जीवन के साथ चलते चलते मन की छटपटाहट को पूरे आवेश के साथ व्‍यक्त करती है।

  2. खेद है मित्र !अब नहीं चल सकता मैं तुम्हारे साथमित्रता की भीएक सीमा होती है । Aah! Bada dard hai is rachana me!

  3. मित्रता की भीएक सीमा होती है ।सच को सामने ला दिया …बहुत खूब चलते -चलते पर आपका स्वागत है

  4. खेद है मित्र !अब नहीं चल सकता मैं तुम्हारे साथमित्रता की भीएक सीमा होती है । sunder abhivyakti, sunder prastuti……

  5. खेद है मित्र !अब नहीं चल सकता मैं तुम्हारे साथमित्रता की भीएक सीमा होती है ।—————पता नहीं भैया साथ चलो या इकल्ले। चलना खुद को होता है। यह रास्ता है, कभी साथ साथ कर देता है, कभी बदल देता है रास्ते।आप तो चलें, जैसे भी। रुके नहीं कि गये।

  6. देवन्द्र भाई ,आपसी नज़रें ,अंगुलियों में गिनी जा सकती हैं ,ईश्वर ने ये सलाहियत गिनों चुनों को ही दी है ! आपपे मेरी शुभकामनायें न्योछावर जानिये !

  7. रास्ते में कई स्टेशन आयेतुमको नही उतरना थातुम नहीं उतरेमेरे लाख मनाने के बाद भीचलते रहे, चलते रहे….जीवन की गति चलती रहती है ..कोई साथ होता है तो कोई बिछड जाता है …अच्छी रचना ..

  8. अव नहीं चल सकता तुम्हारे साथ उस वक्त तो बडी दु्रत गति से भाग रहे थे । भागते भागते जब उम्र का ऐसा पडाव आया कि घर के आगन और नीम की छाव याद आने लगी तो अव रुकना चाहते हो। उस वक्त वकरियां भैस गाय याद नहीं आई?चिडियां ,बचपन की खुशिया ग्रामीण अंचल का सौन्दर्य उस वक्त याद नहीं आया जब उडन खटोले पर उडते चले जारहे थे और पैर जमीन पर नहीं धर रहे थे

  9. मनोज जी ने सही कहा है कि कविता जीवन की एक्सप्रेस मे चलते मन की छटपटाहट की अभिव्यक्ति है..मन हमेशा हमें खींच कर वापस उन्ही गलियों-कूँचों मे ले जाना चाहता है..जहाँ उसकी जड़ें हैं..मगर हमारी महत्वाकाँक्षाएं हमारी विवशताएं बन जाती हैं..गाड़ी मे एक बार चढ़ जाने के बाद वापस पिछले स्टशन पर जाना संभव नही हो पाता..यहाँ हमारा दिल और दिमाग उन मित्रों की तरह लगते हैं जिनके साथ चलने और बिछड़ने का जिक्र यह कविता करती है….मगर हमारी स्मृतियाँ हमारी खुशियों की तरह ही अस्थाई होती हैं..झलक दिखा कर फिर लुप्त हो जाने वाली..काले पंखों वाली चिड़िया की तरह..मगर झट से ओझल हो जाती थीउस पर बैठीकाले पंखों वाली चिड़ियातुम्हारे चेहरे से फिसलतेखुशियों वाले क्षणों की तरह।

  10. मित्रता की भीएक सीमा होती है …मन के गहरे जज्बात शब्दों में उतार दिए हैं आपने देवेन्द्र जी …. इतना दूद नहीं निकलना चाहिए की वाप लौट न सको … बहुत खूब …

  11. "मगर झट से ओझल हो जाती थीउस पर बैठीकाले पंखों वाली चिड़ियाक्षणों की तरहतुम्हारे चेहरे से फिसलतेखुशियों वाले क्षणों की तरह…."अति सुन्दर लाइन.

  12. Devendra Ji,Asehmati nahi hai, lekin vishwas sa hai…shayad mitrata hi kuchh hai zindagi main jiski koi seema nahi.kam se kam mere liyewaise rachna kabil-e-tareef hai.:)

  13. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी रचना मंगलवार 07-12 -2010 को छपी है ….कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ …शुक्रिया ..

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