मन की गाँठें खोल

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खुल्लम खुल्ला बोल रे पगले
खुल्लम खुल्ला बोल ।
मन की गाँठें खोल रे पगले
मन की गाँठें खोल ।।

मैं अटका श्वेत-स्याम में
दुनियाँ रंग-बिरंगी
कठिन डगर है, साथी वैरी
चाल चलें सतरंजी

गर्जन से क्या घबड़ाना रे
ढोल-ढोल में पोल ।
मन की गाँठें खोल रे पगले
मन की गाँठें खोल ।।

काम, क्रोध, लोभ, मोह से
कभी उबर ना पाया
ओढ़ी तो थी धुली चदरिया
फूहड़, मैली पाया

खुद को धोबी बना रे पगले
सरफ ज्ञान का घोल ।
मन की गाँठें खोल रे पगले
मन की गाँठें खोल ।।

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38 thoughts on “मन की गाँठें खोल

  1. आदरणीय देवेन्द्र पाण्डेय जी नमस्कारखुद को धोबी बना रे पगलेसरफ ज्ञान का घोल ।xxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxमन की गांठें अगर खुल जाती हैं तो , फिर इंसान खुद को सही मायने में जिन्दगी के करीब पाता है , ज्ञान की तरफ बढ़ पाता है , मन की मैल तभी धुलती है जब हम खुद का निरिक्षण करते रहते हैं …..शुक्रिया

  2. काम, क्रोध, लोभ, मोह सेकभी उबर ना पायाओढ़ी तो थी धुली चदरियाफूहड़, मैली पायाये कहाँ पहुँच गये देवेन्द्र जीबहुत सुन्दर .. वाह

  3. सुन्दर रचना, देवेन्द्र जी, इस चदरिया को धो ही लेना चाहिए, वरना एक दिन जब जाने का वक्त आएगा तो सुनने को मिलेगा-"अब काहे शरमाये,देख मैले चदरिया,धोई नहीं पहले,बीती तेरी पूरी उमरिया.वैसे एक बात है, जब पता चल जाता है कि चदरिया मैली है, आधी तो उसी वक्त ही धुल जाती है…..आपका धन्यवाद

  4. खुद को धोबी बना रे पगलेसरफ ज्ञान का घोल । इस को धो ही लेना चाहिए,बहुत सुन्दर!

  5. देवेन्द्र जी,वाह…..क्या बात है…..और सादा बोली में बसी इस रचना में गूढ़ ज्ञान की बातें बता दी है आपने…..अपने अलग अंदाज़ में……बहुत सुन्दर

  6. खुद को धोबी बना रे पगलेसरफ ज्ञान का घोल ।मन की गाँठें खोल रे पगलेमन की गाँठें खोल ।। ……vaah …majedaar …sundar kavita.

  7. काम, क्रोध, लोभ, मोह सेकभी उबर ना पायाओढ़ी तो थी धुली चदरियाफूहड़, मैली पायाक्या बात है देवेन्द्र जी ,अगर हम इन में से किसी एक से भी उबर सकें तो जीवन धन्य हो जाए मनुष्य तो इनके साथ साथ और भी दोषों का भागीदार बन जाता हैबहुत सुंदर कविता ,बधाई

  8. काम, क्रोध, लोभ, मोह सेकभी उबर ना पायाओढ़ी तो थी धुली चदरियाफूहड़, मैली पाया ..बहुत खूब .. देवेन्द्र जी … इस लाजवाब रचने में जीवन दर्शन की महक है …

  9. लगता है किसी ख़ास के लिए यह आम हुआ है ….सर्फ़ के बजाय किसी नए डिटर्जेंट की शायद अब जरूरत है

  10. खुद को धोबी बना रे पगलेसरफ ज्ञान का घोल ।मन की गाँठें खोल रे पगलेमन की गाँठें खोल ।। ये सर्फ़ वाला ज्ञान सही लगा पर शायद ये सर्फ़ की कंपनी कंपनी पर भी निर्भर करता होगा की कहाँ कितना ज्ञान छुपा है हा …. हा

  11. काम, क्रोध, लोभ, मोह सेकभी उबर ना पायाओढ़ी तो थी धुली चदरियाफूहड़, मैली पायाबहुत सुंदर अभिव्यक्ति।

  12. मन की गांठे खोल रे पगले, मन की गांठें खोल.बहुत बढिया कविता, बेहतरीन अंदाज. मजा आया. धन्यवाद…मेरी नई पोस्ट 'भ्रष्टाचार पर सशक्त प्रहार' पर आपके सार्थक विचारों की प्रतिक्षा है…www.najariya.blogspot.com

  13. कम्प्यूटर की बेवफाई के चलते यहाँ पहुँचने में इतनी देर हुई कि सारे टिप्पणीकार धुलाई कर के निकल लिए हैं !कविता के मूल भाव से सहमत !

  14. वाह ! मजा आ गया.मन कर रहा है कि ये कविता जोर-जोर से गाते हुये,ढोल बजाते हुये निकल पडूं सड़क पर.

  15. वाह…वाह…वाह…क्या बात कही…प्रेरणाप्रद प्रभावशाली प्रवाहमयी मन को छूकर मुग्ध करती अतिसुन्दर रचना…

  16. @ खुल्लम खुल्ला बोल रे पगलेखुल्लम खुल्ला बोल ।— का कह रहे हैं , झेलना पड़ता है इही खातिर ! 🙂 कबीर याद आते हैं – '' सांच कही तो मारन धावे , झूठ कहे पतियाना / साधो जग बौराना '' ! , आखिर खुल्लमखुल्ला बोल ही दिए कबीर , नहीं माना फटफटिया ! @ खुद को धोबी बना रे पगलेसरफ ज्ञान का घोल ।— इहाँ भी कबीर याद आये , चदरिया झीनी रे झीनी , ऊ जुलहा थे , हम धोबी बन जाएँ . ऊ कहे थे 'जूं की तुं धर दीनी चदरिया' , हम सब तो ऐसा नहीं कह सकते काहे से कि 'चुनरिया में दाग लग गईल' पर धोबी बन साफ़ सूफ कर लिया करें , तो यही क्या कम है ! देवेन्द्र जी , सुन्दर कविता ! आभार !

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