चंदन

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मैं अक्सर सर्पों के झांसे में आ जाता हूँ
जब लिपटते हैं
समझता हूँ
बहुत प्यार करते है मुझसे
जब डंसते हैं
काठ हो जाता हूँ
और तुम्हें मेरे दर्द का जरा भी एहसास नहीं होता !

कितनी सहजता से मान लेते हो
सज्जन विष व्यापत नहीं…..!

सर्प से डरते हो
दूध पिलाते हो
मेरी तारीफ करते हो
घिसकर
ललाट पर सजाते हो !

कितनी चतुराई से जान लेते हो
चंदन शीतल लेप….!

और मैं
सह लेता हूँ चुपचाप
तुम्हें भी
वैसे ही
जैसे सहता आया हूँ
सर्पदंश ।

सच कहूँ
तो किसी भी विषधर से
भारी है
तुम्हारा यह
दोहरा चरित्र ।

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सफेद कबूतर

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घर की छत पर
बैठे थे
कई सफेद कबूतर
सबने सब मौसम देखे थे
सबके सब
बेदम
भूखे थे
घर में एक कमरा था
कमरे में अन्न की गठरी थी
मगर कमरा
कमरा क्या था
काजल की कोठरी थी

एक से रहा न गया
कमरे में गया
अपनी भूख मिटाई
और लौट आया

सबने देखा तो देखते ही रह गये
आपस में कहने लगे
हम सफेद कबूतरों में यह काला कहाँ से आ गया !
सबने चीखा-
चोर ! चोर !
काला कबूतर
दूर नील गगन में उड़ गया।

कुछ समय पश्चात
दूसरे से भी न रहा गया
वह भी कमरे में गया
अपनी भूख मिटाई
और लौट आया
सबने चीखा-
चोर ! चोर !
काला कबूतर
दूर नील गगन में उड़ गया।

धीरे-धीरे
सफेद कबूतरों का संख्या बल
घट गया
नील गगन
काले कबूतरों से
पट गया।

एक समय ऐसा भी आया
जब काले कबूतर
घर की छत पर
लौट-लौट आने लगे
सफेद कबूतर
या तो कमरे में
या नील गगन में
उड़-उड़ जाने लगे।

जिन्होंने
कमरे में जाना स्वीकार नहीं किया
भागना स्वीकार नहीं किया
वे
कवि, गुरू, या दार्शनिक हो गये
सबको समझाने लगे-
कमरे में अन्न की गठरी है
मगर रूको
कमरा
कमरा नहीं
काजल की कोठरी है।

किसी ने सुना
किसी ने नहीं सुना
किसी किसी ने
सुना अनसुना कर दिया
मगर उनमें
कुछ चालाक ऐसे भी थे
जिन्होंने विशेष परिधान बना लिए
कमरे में जाकर भी
हंस की तरह
उजले के उजले रह गए !

बात मामूली नहीं
संगीन है
उन्हीं की जिन्दगी
बेहद रंगीन है
उनके लिए
हर तरफ मजा ही मजा है
वे ही तय करते हैं
किसकी क्या सजा है !

उनका
बड़ा ऊँचा जज़्बा है

जी हाँ
आज घर में
उन्हीं का कब्जा है।

(….यह कविता हिन्दयुग्म में प्रकाशित है।)

पतंग

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आवा राजा चला उड़ाई पतंग ।

एक कन्ना हम साधी
एक कन्ना तू साधा
पेंचा-पेंची लड़ी अकाश में
अब तs ठंडी गयल
धूप चौचक भयल
फुलवा खिलबे करी पलाश में

काहे के हौवा तू अपने से तंग । [आवा राजा चला…]

ढीला धीरे-धीरे
खींचा धीरे-धीरे
हम तs जानीला मंझा पुरान बा
पेंचा लड़बे करी
केहू कबले डरी
काल बिछुड़ी जे अबले जुड़ान बा

भक्काटा हो जाई जिनगी कs जंग । [आवा राजा चला…]

केहू सांझी कs डोर
केहू लागेला अजोर
कलुआ चँदा से मांगे छुड़ैया
सबके मनवाँ मा चोर
कुछो चले नाहीं जोर
गुरू बूझा तनि प्रेम कs अढ़ैया

संझा के बौराई काशी कs भंग। [आवा राजा चला…]

सुख ! चैन ! प्यार ! नदिया के पार।

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आज का ताजा समाचार
पेट्रोल-डीजल
और हुआ महंगा
प्याज सत्तर रूपये किलो
भ्रस्टाचार
सीमा पार
जनता बेचैन
सरकार लाचार।

हुर्र….!
लड़की
प्रेमी के साथ
फुर्र….!

अरे..रे..रे..रे..
घोर कलजुग यार !
किशोरी के साथ
चलती कार में
सामूहिक बलात्कार !

ठांय-ठांय
खत्म हुआ
जीवन का
कांय-कांय !

दुःखी परिवार
मांग रहा
मुआवजा
क्रोध शांत कर
भय से भाग रहा
हत्यारा
पत्नी
भरी ज़वानी में
विधवा
बच्चों का सपना
चूर-चूर।

टूटी नाव
जीवन मझधार
पल-पल हाहाकार
सुख ! चैन ! प्यार !
नदिया के पार।
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आनंद की यादों से….1

…..यादें उन स्वप्नों की जो अनदेखे दिख गए थे अपने शैशव काल में, यादें उन संकल्पों की जो मंदिर की घट्टियों की गूँज बनकर रह गईं, यादें उन दिवास्वप्नों की जो यथार्त की धरातल पर कभी खरी नहीं उतरीं। यादें उन मित्रों की जो बहुत करीब से होकर गुजर गए। यादें ..अनगिन यादें।
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…….गोधुली बेला है। बैलों के गले में बंधी घंट्टियों की धुन बच्चे के कानों में पड़ती है। वह दौड़ा-दौड़ा आता है । माँ उसे दहक कर गोदी में उठा लेती है। वह खुशी के मारे चीखता है। खुशी ! इससे बड़ी खुशी की कल्पना भी उसके जेहन में नहीं है। वह औरत माँ को उसकी शरारत हंसते और शिकायत भरे स्वरों में सुना रही है। वह माँ को वह जगह दिखाती है जहाँ बच्चे ने काटा था। बच्चा गौर से देखता है। नंगे-तने स्तन को… जिसके निप्पल के चारों ओर नीला घेरा सा बना है , कुछ याद कर माँ के स्तन को छूता है। कई प्रश्न उसके बाल मन में कौंध जाते हैं। माँ और इस औरत के स्तन में इतना अन्तर क्यों है ? माँ के स्तन से इतना मीठा दूध आता है और इसके स्तन से नहीं ! क्यों ? फिर सब कुछ भूल जाता है। उसे माँ का स्तन ही अधिक अच्छा लगता है क्योंकि इससे मीठा दूध आता है। वह उस औरत को देखकर दांत चिढ़ाता है, ईं …s…s..s…s…s.. …!
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…..आनंद अचम्भित था हर बात पर । उसके बाल मन के आंगन मे एक पल सुबह तो दूसरे ही पल, शाम का आलम होता। चह-चह चहका करतीं अनगिन प्रश्न गौरैया और अपने प्रश्नों के उत्तर न पा भूखी-प्यासी, फुर्र-फुर्र उड़ जाया करतीं। मासूम आनंद, खूद से ही प्रश्न पर प्रश्न करता और जवाब के अभाव में कुंठित हो बड़ा होता जा रहा था। अब वह कुछ और बड़ा हो गया था। स्कूल जाने लगा था। स्कूल से लौटता तो कंधे और भारी प्रतीत होते प्रश्नों के बोझ से। कोई नहीं दे पाता उसके प्रश्नों के हल। पिता या बड़े भाइयों से पूछने का साहस नहीं था. संग-साथियों से पूछता तो वे भी हंस पड़ते। धीरे-धीरे उसका ह्रदय एक विशाल घोंसले में परिवर्तित हो चुका था जिसमें फुदका करती …अनगिन प्रश्न गौरैया।
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……निम्न मध्यम वर्गीय परिवारों की आशा का केंद्र यह अर्द्द-सरकारी विद्यालय, जहाँ अपने सामर्थ्य के अनुसार, नौनिहालों को शिक्षित कर रहा था, वहीं आनंद, धीरे-धीरे यहां के वातावरण से परिचित हो रहा था। आजादी के पहले से ही हमारे देश में अपने सामर्थ्य के अनुसार बच्चों को शिक्षित करने और अपने सामर्थ्य के अनुसार शिक्षा लेने का प्रचलन है ! गरीब अपने ढंग से, अमीर अपने ढंग से और मध्यम वर्गीय परिवार अपने ढंग से अपने-अपने बच्चों को शिक्षित करते है। यह अलग बात है कि सभी माँ-बाप अपने बच्चों में अपना और अपने देश का सुनहरा भविष्य तलाशते हैं। आजादी से पहले ‘देश’ आगे, ‘अपना’ पीछे-पीछे चलता था, आजादी के बाद ‘देश’ और ‘अपना’ हमसफर हो गए लेकिन अचानक से कब ‘अपना’ आगे हुआ और ‘देश’ पीछे छूट गया यह तो विचारक ही तय कर सकते हैं मगर आजादी के बाद भी शिक्षा की दशा और दिशा दोनो ही पूर्व परम्परा की तरह नीयति बन हमारे सामने विद्यमान है । सभी के लिए शिक्षा और शिक्षा का समान अवसर अभी भी दूर की कौड़ी है।
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………..पिता के आदेश पर श्रीकांत 10 पैसे का बर्फ लेने घर से निकलता (उन दिनों 10 पैसे में गमछे में बांधे जा सकने वाले गट्ठर के बराबर बर्फ मिल जाया करता था) और आनंद के दरवाजे से होकर गुजरता। न केवल गुजरता बल्कि आवाज देता-“आनंद चलो बर्फ लेने।” आनंद को तो मानो इसी पल का इंतजार होता, “अभी आया”, कहते हुए दौड़ पड़ता । गर्मियों में प्रायः लोग इमली के बीयें गलियों में फेंक दिया करते थे। “चलो यार, पहले चीयाँ बीनते हैं फिर बर्फ खरीदेंगे।” “चलो”- प्रस्ताव पास हो जाता। दोनो गली-गली घूम कर इमली के बीये बीनने में जुट जाते। दस मिनट का फासला घंटे-आध घंटे में तय कर वे दुकान तक पहुंचते। खूब मोलभाव कर बर्फ का टुकड़ा गमछे में बांधने के पश्चात चीखते, “घलुआ नहीं दोगे ?” दुकानदार बर्फ के छोटे-छोटे टुकड़े दोनों के हाथों में रख देता जिसे मुंह में दबाए घर की ओर मुड़ जाते। कभी तो सीधे घर आ जाते और ठंडे शरबत का मजा लेते कभी घर पहुंचने से पहले पुनः गलियों का चक्कर लगाने लगते। इमली के बीयें का एक गट्ठर बना, घर की ओर लौटते। घर पहुँचने तक बर्फ गल चुका होता ! बर्फ के स्थान पर इमली के बीयों का गट्ठर !! होश तब आता जब श्रीकांत के पिता फागू महराज हाथों में पंखा लिए दौड़ाते…”पंखे चा डांडि दौं साड़े ला”
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(……..आनंद की यादें  से )

नव वर्ष मंगलमय हो।

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हे नववर्ष ! न आते तुम तो जान ही नहीं पाता कि लोग कितना प्यार करते हैं मुझसे ! कितने सारे मेल भेज हैं लोगों ने मुझे ! किसी किसी ने तो मेल के पंपलेट ही छाप दिये हैं सौ-पचास एक साथ। वाह ! कितने प्यारे-प्यारे मैसेज हैं ! लगता है नया साल पक्का अच्छा होगा। देर तक जागने वाले देर रात तक और भिनसहरे उठने वाले मुंह अंधेरे मैसेज पर मैसेज भेजे जा रहे हैं। फोन आ रहे हैं…नया साल है, सोना जरूरी है क्या ? अरे नया साल है उठो ! क्या सो रहे हो ? अभी तक कम सोये ! कब जगोगे ? न रात को समय से सोने दे रहे हैं न सुबह देर तक सोने दे रहे हैं। ऐसे-ऐसे यक्ष प्रश्न पेले जाते हैं कि युधिष्ठिर भी बेहोश हो जायं। कब जगोगे ? स्वयम् भगवान बुद्ध को भी इसका ज्ञान न था कि वे कब जगेंगे ! मैं कैसे बता दूँ ? जब से होश संभाला जगने का ही तो प्रयास कर रहा हूं ! कुछ लोग बिना जगे जगाने लगते हैं ! उन्हें ऐसा लगता है कि वे जग चुके हैं। कितनी बुरी बात है ! खुद नींद में रहने वाला दूसरे को जगाता फिरे। कुछ लोग रात देर तक जगते रहते हैं। जब तक की घड़ी की सुईयाँ एक दूसरे से गले न मिल लें। 12 बजते ही अचानक से चीखने लगते हैं । घड़ी की सुई, बदलती तारीखें नये वर्ष का पक्का सबूत होती हैं। कुछ लोग कहते हैं- नहीं……! हम रात को नववर्ष नहीं मनायेंगे। आंग्ल नववर्ष को अपनाना है तो पूर्णतया भारतीय संस्कृति में ढाल दो ! रात को सुईयाँ मिलें तो सभी चीखते हैं, हम नववर्ष तब मनायेंगे जब सूर्योदय होगा। यह बात मुझे भी ठीक लगती है। या तो पूर्णतया उनके में ढल जाओ या पूर्णतया उनको अपने में ढाल लो । आधी-अधूरी जिंदगी जीना खुद को धोखा देना है।
ई-मेल का जवाब इसलिए नहीं दे पा रहा कि नेट का सिगनल एकदम खऱाब है। खुल गया यही कम है ! मैसेज का जवाब इसलिए नहीं दे पा रहा कि बैलेंस नहीं है ! एक भी मैसेज मोबाइल टॉपअप वाला नहीं आया..! Your account balance is credited with Rs. 99.56 paise….सभी शुभ चिंतक हैं लेकिन कोई इतना बड़ा शुभचिंतक नहीं मिला। जब भी किसी को फोन करो मोबाइल से बड़ी कातिल आवाज आती है….. आपका अकाउन्ट बैलेंस कम है। आपके पास है…एक….शून्य प्रभार दो…धत्त तेरे की ! अभी 2 दिन पहले तो 110/- का टॉप अप भरवाया था ! किसने उड़ा दिये ! अब इतनी सुबह करूँ तो क्या करूँ ? सोचा, नहा लूँ ! नहा धोकर साफ-साफ लिखूँ ! मगर यह क्या ! बिजली नहीं है ! कल शाम थोड़ी बूंदा-बांदी क्या हुई बिजली रानी रात से ही गायब है। लगता है फिर किसी राजनीति की शिकार हो गई। जब करने के लिए कुछ न मिला तो यही छाप रहा हूँ। शुक्र है कि लैपटॉप चल रहा है। नया है न ! नई चीज खूब चलती है । पुरानी होते ही खरखराने लगती है। लगता है नेट कनेक्शन मिल रहा है। जल्दी से इसे पोस्ट कर दूँ। कुछ गलत लिख दिया हो तो क्षमाप्रार्थी हूँ।
नव वर्ष मंगलमय हो।