चंदन

……………………

मैं अक्सर सर्पों के झांसे में आ जाता हूँ
जब लिपटते हैं
समझता हूँ
बहुत प्यार करते है मुझसे
जब डंसते हैं
काठ हो जाता हूँ
और तुम्हें मेरे दर्द का जरा भी एहसास नहीं होता !

कितनी सहजता से मान लेते हो
सज्जन विष व्यापत नहीं…..!

सर्प से डरते हो
दूध पिलाते हो
मेरी तारीफ करते हो
घिसकर
ललाट पर सजाते हो !

कितनी चतुराई से जान लेते हो
चंदन शीतल लेप….!

और मैं
सह लेता हूँ चुपचाप
तुम्हें भी
वैसे ही
जैसे सहता आया हूँ
सर्पदंश ।

सच कहूँ
तो किसी भी विषधर से
भारी है
तुम्हारा यह
दोहरा चरित्र ।

……………………………………

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41 thoughts on “चंदन

  1. …..सच कहूँतो किसी भी विषधर सेभारी हैतुम्हारा यहदोहरा चरित्र । sampurn kavita ka saar shayad inhi chand panktiyon main simat aaya hai ,sunder rachna hetu abhaar.

  2. झांसे में फँस जाता हूँजब लिपटते हैंसमझता हूँबहुत प्यार करते है मुझसेआज तो आपने अज्ञेय जी की कविता सांप की याद ताजा कर दी .. कविता सार्थक है ….

  3. .सच कहूँतो किसी भी विषधर सेभारी हैतुम्हारा यहदोहरा चरित्र क्या बात है !बेहतरीन अंश है ये कविता कापहली पंक्ति से अंतिम पंक्ति तक एक सशक्त कविता

  4. लेकिन सबकुछ जान कर भी चुपचाप यह दो मुहांपन सहते रहना चन्दन के बस की ही बात है …..इसीलिये वह चन्दन भी है …..

  5. भावपूर्ण मर्मस्पर्शी रचना सदैव की भांति…भावोद्गार के लिए सुन्दर बिम्ब प्रयोग किया है आपने…बड़ी प्रभावशाली बन पडी है रचना…एक निवेदन करना चाहूंगी…"मैं अक्सर सर्पों के झांसे में फँस जाता हूँ" इस पंक्ति में झांसे में फंसना,थोडा सा खटका…"झांसे में आना" प्रयोग ही आजतक सुना है न,हो सकता है इसलिए यह लग रहा हो…परन्तु यहाँ यदि "मैं अक्सर सर्पों के झांसे में आ जाता हूँ " भी व्यवहृत हो ,तो संभवतया ठीक ही लगेगा..नहीं ???देख लीजियेगा…कोई आवश्यक नहीं की सुझाव माना ही जाए…

  6. विषधर का चरित्र तो दोहरा नहीं होता है। वह तो जग जाहिर होता है कि उस में विष है। लेकिन यहां तो विषहीन नजर आने वाले अपने में इतना जहर भरे रहते हैं कि बस …….।

  7. देवेन्द्र जी,सुभानाल्लाह……वाह…..बेहतरीन….बिम्बों के सहारे आप बहुत गहरी बात कह गयें हैं जनाब….जो दिख रहा है उससे तो बचने का उपाय भी है…..दोहरों का कोई इलाज भी तो नहीं….बहुत खूब|

  8. क्या बात है! आज कल आप एक से बढ़कर एक मोती पेश कर रहे हैं !बेहतर ख्याल , बेहतर कविता !

  9. सुन्दर रचना.आदमी बेहद खतरनाक जानवर है,डरकर दूध पिलाता है और जिससे डर नहीं उसको चाहे जैसे भी उपयोग करता है.

  10. सच कहूँतो किसी भी विषधर से भारी हैतुम्हारा यहदोहरा चरित्र….दुमुहें चरित्र का सुन्दर बिम्ब … सर्प दंश से भी घातक है यह ……..बहुत अच्छी रचना..

  11. @रंजना जी..आपकी बात सोलह आने सही है। झांसे में आना भी झांसे में फंसना ही है । बेहतर है मुहावरे का सही प्रयोग किया जाय। कविता लिखते वक्त मुहावरे पर तनिक भी ध्यान नहीं गया। मन से पढ़ने और सुझाव देने के लिए आपका आभारी हूँ।@प्रेम बल्लभ पाण्डेय जी….आपने एकदम सही लिखा। इसी सामाजिक परिदृष्य ने इस कविता कोजन्म दिया। एक ओर हम डरकर दुष्टों का सम्मान करते हैं दूसरी ओर सज्जन का मनचाहा दोहन करने में तनिक भी संकोच नहीं करते।

  12. वाह देवेन्द्र जी ,आपमें अब आशु कवि प्रखरता प्रगट हैआप दुहरे चरित्र के साथ अब दुहरी राष्ट्रीयता को भी अपने काव्य से संस्पर्शित करें !

  13. सच कहूँतो किसी भी विषधर सेभारी हैतुम्हारा यहदोहरा चरित्र ।…..वाह क्या बात कही हैं..सुन्दर अभिव्यक्ति…

  14. सज्जन विष व्यापत नहींचंदन शीतल लेपइन दो अभिव्यक्तियों के माध्यम से बहुत ही सशक्त प्रस्तुति दी है देवेन्द्र भाई| बधाई|

  15. सच कहूँतो किसी भी विषधर से भारी हैतुम्हारा यहदोहरा चरित्र ।बहुत सटीक टिप्पणी..बहुत सुन्दर प्रस्तुति.

  16. ऐसे कितने ही दोहरे और दोगले चरित्र वालों के दंश सहते हुये जी रहे हैं हम!! पाण्डे जी चमत्कार है शब्दों का.टंकण त्रुटिःघीसकर = धिसकरकितनी चतुराई जान लेते हो = कितनी चतुराई से जान लेते हो

  17. वाकई यह विष दन्त बड़े मीठे दिखते हैं ….मगर वे अपना कार्य कर रहे हैं और करते भी रहेंगे देवेन्द्र ! आपकी नियति है इनका जहर झेलते जाना और उसके बावजूद जीने का प्रयत्न करना उनके लिए , जो आपको प्यार करते हैं और जिन्हें आपकी जरूरत है !शुभकामनायें !

  18. कितनी सहजता से मान लेते होसज्जन विष व्यापत नहीं…..! सच कहा आज आदमी का चरित्र किसी विशधर से कम नही। बेहतरीन रचना के लिये बधाई।

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