सतीश सक्सेना के ब्लॉग से लौटकर

अभी बड़े भाई आदरणीय सतीश जी के ब्लॉग पर यह पोस्ट पढ़ी। कमेंट लिखा तो लगा कविता बन गई ! मन हुआ पोस्ट कर दूँ । आपकी क्या राय है ?

दिल

अपेक्षा की दो बेटियाँ हैं

आशा और निराशा

तीनो जिस घर में रहती हैं उसका नाम दिल है

दिल कांच का नहीं पारे का बना है

टूटता है तो आवाज नहीं होती

जर्रा-जर्रा बिखर जाता है

जुटता है तो आवाज नहीं होती

हौले-हौले संवर जाता है

सब वक्त-वक्त की बात है

कभी हमारे तो कभी

तुम्हारे साथ है

किसी ने कहा भी है..

धैर्य हो तो रहो थिर

निकालेगा धुन

समय कोई।
 

Advertisements

35 thoughts on “सतीश सक्सेना के ब्लॉग से लौटकर

  1. दिल कांच का नहीं पारे का बना हैटूटता है तो आवाज नहीं होतीजर्रा-जर्रा बिखर जाता हैजुटता है तो आवाज नहीं होतीहौले-हौले संवर जाता हैKya gazab kee baat kah dee!

  2. अगर अपने प्यारों से मर्म आहत हो जाए तो वाकई असहनीय पीड़ा का अहसास होता है इस कष्ट का वर्णन आसान नहीं देवेन्द्र भाई ! थोड़ी देर पहले ही चला बिहारी …सलिल भाई ने मेरे ब्लॉग पर इसी पोस्ट के सन्दर्भ में एक शेर पोस्ट किया था वही आपकी नज़र है"तेरे जहान में ऐसा नहीं कि प्यार नहीं,जहाँ उम्मीद हो इसकी, वहाँ नहीं मिलता!"शुभकामनायें आपको !!

  3. सतीश जी के ब्लाग से होते हुए आपके ब्लाग तक पहुंची हूं । पहली बार ही आपको पढा । बहुत अच्छा लगा ।

  4. पाण्डे जी! सिक्का गिरने की आवाज़ तो होती है, मगर उठाने की आवाज़ नहीं होती!(श्री के.पी. सक्सेनाः फ़िल्म जोधा अकबर)… हमारे सतीश जी उसी दिल के गिरने की आवाज़ से विचलित हैं, ये नहीं देखते कि हज़ारों प्रशंसक उनका दिल थामे बैठे हैं… भावुक हैं!आपकी अभिव्यक्ति उनको बल प्रदान करेगी!!

  5. आज तो यार दोस्त बड़े मेहरबान लग रहे हैं ..कमाल है !हमने जब मौसमें बरसात से चाही तौबा !बादल इस जोर से बरसा कि इलाही तौबा !

  6. @ देवेन्द्र भाई ,अपेक्षा की एक बहन भी है , उपेक्षा , जो अपनी 'बहनजाई' निराशा का उतारा करती है ! सतीश जी कहिये कि दो बोल मुहब्बत के उसके साथ भी बोलें !शर्तिया फायदा होगा 🙂

  7. दिल कांच का नहीं पारे का बना है टूटता है तो आवाज नहीं होती जर्रा-जर्रा बिखर जाता है जुटता है तो आवाज नहीं होती हौले-हौले संवर जाता हैबहुत खूब देवेन्द्रजी बड़ी खूबसूरती है इन पंक्तियों में ..सुन्दर रचना…

  8. ये तो बहुत बढिया रहा……………इसी बहाने एक नयी रचना बन गयी …………बहुत ही सुन्दर रचना और सार्थक प्रस्तुति।

  9. टूटता है तो आवाज नहीं होतीजर्रा-जर्रा बिखर जाता हैजुटता है तो आवाज नहीं होतीहौले-हौले संवर जाता हैक्या बात कही है…बहुत ही बढ़िया…

  10. अभी मैं सतीश जी को पढ़कर आई हूँ ..यहाँ भी वैसा ही मिला ..बहुत अच्छी रचना ..बधाई

  11. दिल कांच का नहीं पारे का बना है टूटता है तो आवाज नहीं होती बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति

  12. बड़े फ़ास्ट कवि हैं। जय हो। क्या कविता है! बधाई! अपेक्षा की दो बेटियाँ हैंआशा और निराशा से याद आई कानपुर के कवि उपेन्द्र का यह गीत:प्यार एक राजा हैजिसका बहुत बड़ा दरबार हैपीड़ी इसकी पटरानी हैआंसू राजकुमार है।उन्हीं की पंक्तियां हैं:माना जीवन में बहुत-बहुत तम है,पर उससे ज्यादा तम का मातम है,दुख हैं, तो दुख हरने वाले भी हैं,चोटें हैं, तो चोटों का मरहम है,मुक्तिबोध की कविता की ये पंक्ति भी याद आ गयी: दुखों के दागों को तमगों सा पहना। 🙂

  13. इससे हमें यह शि‍क्षा मि‍ली कि‍ – यदि‍ आशा और नि‍राशा के पचड़े में नहीं पड़ना चाहते तो अपेक्षा यानि‍ उनकी माता से पंगा नहीं लेना चाहि‍ये

  14. @अनूप…माना जीवन में बहुत-बहुत तम है,पर उससे ज्यादा तम का मातम है …वाह अनूप जी ! आपने तो कवि उपेन्द्र के माध्यम से जीवन का कटु सत्य ही बयान कर दिया! सच है। हम जीवन भर तम का मातम ही मनाते रह जाते हैं और खुशी के क्षणों को वक्त बीत जाने के बाद बड़ी मासूमियत से याद करते हैं कि आह! वो भी क्या दिन थे! …इस पोस्ट से यूँ जुड़ने के लिए बहुत आभार आपका।

  15. पक्की बात कही आपने……चिंतन को खुराक देती,बहुत ही सुन्दर रचना रची आपने…आभार..

  16. अच्छा लगा कवि और कवि हृदयी जनों का यह जमावड़ा और कविता तो न्यारी प्यारी है ही

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s