आभासी दुनियाँ

एक ऐसी दुनियाँ
जहाँ
न कोई राजा न कोई रानी
न कोई मंत्री न कोई सैनिक
सभी मालिक
सभी प्रजा
न कोई भूखा न कोई नंगा
सभी मानते
मन चंगा तो कठौती में गंगा ।

एक से बढ़कर एक विद्वान
कुछ बड़े
कुछ औसत दर्जे के….
कवि, कहानीकार, पत्रकार, चित्रकार, व्यंग्यकार
कुछ अलग ढंग के फनकार
और कुछ
फनहीन चमत्कार
भौचक करती है जिनकी
औचक फुफकार !

क्या करना है
किसी की निजी जिंदगी में झांककर !
सब कुछ दिखाने वाला चश्मा क्या अच्छा होता है ?

वहाँ देखो !
वह
कितनी अच्छी
कितनी सच्ची बातें करता है
यूँ लगता है
विक्रमादित्य की कुर्सी पर बैठा है !

नहीं नहीं
शक मत करो
मान लो
वह वैसा ही है
जैसा कहता है

अरे याऱ….
एक दुनियाँ तो छोड़ो
चैन से जीने के लिए !

अच्छा  लिखने
अच्छा पढ़ते रहने में
अच्छे हो जाने की
प्रबल संभावनाएँ छुपी होती हैं

चार दिनो की तो बात है
फिर आभासी क्या
छूट जानी है
वास्तविक दुनियाँ भी
एक दिन
होना ही है हमें
स्वर्गवासी ।

………………………………..
 

आउट…! नॉट आउट…!

आज
ऑफिस से घर लौटते वक्त
दोस्तों ने छनाई है भांग
कहते थे
भांग छान कर जब लिखबा तs लिखबा ऊँची चीज !

पिलाना चाहते थे दारू भी
पर भाग आया हूँ
नहीं ला सकता घर में
अनपेक्षित गंध !

नशे में डूबा
नेट पर पढ़ता हूँ समाचार
संसद में हंगामा
विकिलीक्स की गेंद पर जोरदार अपील
विपक्ष ने कहा
आउट !
प्रधानमंत्री ने कहा
नॉट आउट !

दूर
मन मंदिर से
पास आ रहे हैं भजन के बोल….

तू ही खिलाड़ी
अंपायर तू ही
तू है कृपानिधान
हे राम !  हे राम !

देखना चाहता हूँ
टी0वी0 पर समाचार
बच्चे कहते हैं
बोर मत कीजिए
आ रहा है
होली पर रंगारंग प्रोग्राम
क्रिकेट
और मेरा मस्त सीरियल
समाचार में क्या है ?
राष्ट्रपति ने दी है
देशवासियों को
होली की शुभकामनाएँ !

सोचता हूँ
अपना ब्लॉग ही अच्छा है
यहाँ मिल जाते हैं मुझे
अपने !

क्यों न देखूँ
यहीं कुछ
नये सपने ।

…………………………..

काहे हौआ हक्का-बक्का !

काहे हौआ हक्का-बक्का !
छाना राजा भांग-मुनक्का !
इहाँ कहाँ सुनामी आयल
काहे हौवा तू घबड़ायल
कल फिर उठिहैं सीना ताने
आज भले जापानी घायल
देखा तेंदुलकर कs छक्का
काहे हौआ हक्का-बक्का !
प्रकृति से खिलवाड़ हम करी
नदियन के लाचार हम करी
धरती के दूहीला चौचक
सूरज कs व्यौपार हम करी
खड़मंडल होना हौ पक्का
काहे हौवा हक्का-बक्का
मर गइलन सादिक बाशा
रोच सबेरे 2 जी बांचा
सूटकेस में मिलल प्रेमिका
का खिंचबा जिनगी कs खांचा
 
ऐसे रोज चली ई चक्का
काहे हौवा हक्का बक्का
रमुआं चीख रहल खोली में
आग लगे ऐसन होली में
कहाँ से लाई ओजिया-गोजिया
प्राण निकस गयल रोटी में
निर्धन कs नियति में धक्का
काहे हौआ हक्का-बक्का !
रोज समुंदर पीया बेटा
सुख सुविधा में जीया बेटा
बिजुरी खेत उगावा चौचक
दिल टूटल जिन सीया बेटा
घड़ा पाप कs फूटी पक्का
काहे हौआ हक्का-बक्का !
…………………….
हक्का-बक्का = आश्चर्य चकित होना।
मुनक्का = नशे की मीठी गोली जिसे बनारसी खाना खिलाना जानते हैं।
सादिक बाशा = ए. राजा के सहयोगी जो कल मरे पाये गये।
खांचा = स्केच, तश्वीर।

हौ पुराना….!

एक आदमी कुएँ की जगत पर बैठकर रो रहा था । पूछने पर कहने लगा……अभी-अभी नीचे एक कवि कूद गया ! तो..? तुम उसके मरने पर दुःखी हो ? उसने कहा, नहीं…मैं इसलिए रो रहा हूँ कि इसने अपनी कविता सुना दी मगर जब मेरी सुनाने की बारी आई तो कुएँ में कूद गया।

कविता भी पढ़ ला । हौ पुराना…..!

फागु का त्यौहा
जले होलिका भेदभाव की, आपस में हो प्यार
तब समझो आया है सच्चा, फागुन का त्यौहार
हो जाएँ सब प्रेम दीवाने
दिल में जागें गीत पुराने
गलियों में सतरंगी चेहरे
ढूँढ रहे हों मीत पुराने
 

अधरों में हो गीत फागुनी, वीणा की झंकार
तब समझो आया है सच्चा, फागुन का त्यौहार
 

बर्गर, पीजा, कोक के आगे
दूध, दही, मक्खन को खाये !
कान्हां की बंसी फीकी है
राधा को मोबाइल भाये !
 

इन्टरनेट में शादी हो पर, रहे उम्र भर प्यार
तब समझो आया है सच्चा, फागुन का त्यौहार
 

अपने सोए भाग जगाएँ
दुश्मन को भी गले लगाएँ
जहाँ भड़कती नफ़रत-ज्वाला
वहीं प्रेम का दीप जलाएँ
भंग-रंग पर कभी चढ़े ना, महंगाई की मार
तब समझो आया है सच्चा, फागुन का त्यौहार.


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का कहबा ? कमेंट बाक्स बंद हौ ! जब कोई ऐसी चालाकी करे । अपनी सुना दे, दुसरे को कुछ कहने का मौका ही न दे तो बनारस में कहते हैं ……. हौ पुराना…! वैसे भी चुटकुला, गीत दुन्नो….हौ पुराना ।


बुरा न मानो होली है।

 

…और देखते ही देखते पूरा गांव कौआ हो गया !

आज महिला दिवस है। प्रस्तुत कविता  हिंद युग्म में और अपने ब्लॉग में भी एक बार ( वर्ष 2009 ) प्रकाशित कर चुका हूँ।  इस ब्लॉग से जुड़े नये पाठकों के लिये जिन्होंने इसे नहीं पढ़ा है…

चिड़िया

चिड़ि़या उडी
उसके पीछे दूसरी चिड़िया उड़ी
उसके पीछे तीसरी चिड़िया उड़ी
उसके पीछे चौथी चिड़िया उड़ी
और देखते ही देखते पूरा गांव कौआ हो गया !

कौआ करे कांव-कांव
जाग गया पूरा गांव
जाग गया तो जान गया
जान गया तो मान गया
कि जो स्थिति कल थी वह आज नहीं है
अब चिड़िया पढ़-लिख चुकी हैं
किसी के आसरे की मोहताज नहीं है ।

अब आप नहीं कैद कर सकते इन्हें किसी पिंजडे़ में
ये सीख चुकी हैं उड़ने की कला
जान चुकी हैं तोड़ना रिश्तों के जाल
अब नहीं फंसा सकता इन्हें कोई बहेलिया
प्रेम के झूठे दाने फेंक कर
ये समझ चुकी हैं बहेलिये की हर इक चाल
कैद हैं तो सिर्फ इसलिये कि प्यार करती हैं तुमसे
तुम इसे
इनकी नादानी समझने की भूल मत करना

इन्हें बढ़ने दो
इन्हें पढ़ने दो
इन्हें उड़ने दो
इन्हें जानने दो हर उस बात को जिन्हें जानने का इन्हें पूरा हक़ है ।

ये जानना चाहती हैं
क्यों समझा जाता है इन्हें ‘पराया धन’ ?
क्यों होती हैं ये पिता के घर में ‘मेहमान’ ?
क्यों करते हैं पिता ‘कन्या दान’ ?
क्यों अपने ही घर की दहलीज़ पर दस्तक के लिए
मांगी जाती है ‘दहेज’ ?
क्यों करते हैं लोग इन्हें अपनाने से ‘परहेज’ ?
इन्हें जानने दो हर उस बात को
जिन्हें जानने का इन्हे पूरा हक है ।

रोकना चाहते हो
बांधना चाहते हो
पाना चाहते हो
कौओं की तरह चीखना नहीं
चिड़ियों की तरह चहचहाना चाहते हो….
तो सिर्फ एक काम करो
इन्हें प्यार करो

इतना प्यार करो कि ये जान जायँ
कि तुम इनसे प्यार करते हो !

फिर देखना…
तुम्हारा गांव, तुम्हारा घर, तुम्हारा आंगन,
खुशियों से चहचहा उठेगा।

व्हाट इज योर मोबाइल नम्बर….?

मौज लेने के लिए लिखी गयी  हल्की-फुल्की छोटी कहानी। कृपया गंभीर साहित्यिक मूड में न पढ़ें….

दोनो साथ पढ़ते थे। लड़के के पिता एक कॉलेज के प्रिंसिपल थे तो लड़की की माँ दूरसंचार में अधिकारी। एक दिन लड़के ने लड़की से पूछा – व्हाट इज योर मोबाइल नम्बर ?  लड़की ने झट से अपनी माँ का मोबाइल नम्बर बता दिया जो वह कभी कभार रंग जमाने कॉलेज में लाया करती थी। फिर उसने लड़के से पूछा – व्हाट इज योर मोबाइल नम्बर ?  लड़के ने भी तुरंत अपने पिता का नम्बर बता दिया जो वह कभी कभार कॉलेज में रंग जमाने लाया करता था।
एक शाम ल़ड़की की माँ ने अपने मोबाइल में एक मैसेज पढ़ा – यू आर वेरी ब्युटीफुल ! पढ़कर वह शर्मा गई। सोंचने लगीं। जरूर अरोड़ा का काम होगा ! चार दिन से मुझे घूर रहा था। मन किया कि जोर की फटकार लगाऊँ मगर फिर रूक गई। चलो मजा लेते हैं। उत्तर दिया…थैंक्स ! यू हैंडसम ! इधर लड़के ने मैसेज पढ़ा तो मोबाइल फेंक नाचने लगा। रात में प्रिंसपल ने मैसेज बाक्स खोला तो पढ़कर दंग रह गया ! चिंतित हो गया। मैने क्या किया जो एक लड़की मुझे इस तरह धन्यवाद दे रही है ?  सेंट मैसेज खोला तो पाया….यू आर वेरी ब्युटीफुल !  समझ गया कि मेरा लड़का किसी लड़की के चक्कर में फंस गया है। फिर सोचा कि चलो लड़की देख लेते हैं। सुंदर सुशील होगी तो हर्ज क्या है ! बहुत से लड़के लव मैरिज करते हैं। मेरा लड़का भी करे तो क्या बुरा है ! लिखा….कल शाम छः बजे पार्क में मिलो। हाथ में गुलाब हो तो समझ जाऊंगा कि तुम भी मुझसे प्यार करती हो !
लड़की की माँ ने पढ़ा तो दो फीट उछल गई ! बड़बड़ाई…इस अरोड़ा के बच्चे को तो मजा चखाना ही पड़ेगा ! दूसरे दिन ऑफिस से छूटते ही पहुँच गई पार्क में। शाम का समय। हाथ में गुलाब। ठीक छः बजे प्रिंसपल साहब आये बहू देखने ! पूरा पार्क छान मारा। कहीं कोई षोड़शी न दिखी। दिखी तो एक प्रौढ़ महिला ! एक हाथ में गुलाब लिये ऐसे खड़ी थी मानो कृष्ण के मोरपंख में गुलाब टांकना चाहती हो ! उधर लड़की की माँ परेशान। कहाँ मर गया अरोड़ा का बच्चा ? आना नहीं था तो मुझे क्यों बुलाया ? लोग क्या सोचते होंगे ? वह बुढ्ढा तो मुझे ही घूर रहा है ! उंह..! झल्लाकर गुलाब झाड़ियों में फेंका और पैर पटकती जाने को हुई कि फोन कि घंटी बजी….हैलो..! कौन..?  उधर से आवाज आई…..तुम कहाँ हो ? मैं कितनी देर से पार्क में खड़ा तुम्हारा इंतजार कर रहा हूँ ? चौंककर पलटी तो कोई नहीं ! सिर्फ वही बुढ्ढा फोन में किसी से बात कर रहा था। अचानक ज्ञानचक्षु खुल गये ! पारा सातवें आसमान पर ! ओह…! तो ये हजरत हैं ! दनदनाती पहुँच गईं प्रिंसिपल साहब के पास ! बोलीं…ऐ मिस्टर ! व्हाट इज योर मोबाइल नम्बर ? प्रिंसपल सकपकाये। थोड़ा हकलाये…! क्यों ? क्यों पूछ रही हैं आप ? क..क..कहीं आपका मोबाइल नम्बर यह तो नहीं ? लड़की की माँ ने सुना तो तिलमिला कर बोलीं…हाँ…यही है ! मगर ज्यादा भोले बनने की जरूरत नहीं है। आपको शर्म आनी चाहिए ! किसी भद्र महिला को इस तरह परेशान करते हुए। प्रिंसिपल साहब भी तमतमा गये…शर्म ! मुझे आनी चाहिए ? आपको नहीं ? क्या जरूरत थी आपको मेरे मोबाइल में संदेश भेजने की ? मोबाइल में हैण्डसम ! सामने बद्तमीज ! लड़की की माँ सकपका गईं। उसे इस तरह के जवाब की उम्मीद न थी। बोली…जरूर हमलोगों को कुछ गलतफहमी हो गई है। आइए बैठकर बातें करते हैं। प्रिंसपल बोले…यह ठीक है। चलिए उस रेस्टूरेंट में चलकर एक कप कॉफी पीते हैं। एक घंटे के बाद दोनो जब उस रेस्टूरेंट से निकले तो उनके ठहाकों की गूँज दूर-दूर तक सुनाई दे रही थी।
कुछ दिनो पश्चात। लड़की ने दुःखी होकर लड़के से कहा…..आजकल एक बुढ़ढा रोज मेरे घर आ रहा है। कल वह मेरी माँ से देर तक हंस-हंस कर बातें कर रहा था। मुझे भी देखा। बोला…यदि आपकी लड़की मेरे साथ रहने को तैयार है तो मुझे यह शादी मंजूर है। लड़का चौंका ! अच्छा ! परसों शाम मेरे घर भी एक महिला आई थी। मेरे पिताजी से खूब हिलमिल कर बातें कर रही थी। पूछ रही थी…आपके लड़के को तो कोई आपत्ति नहीं ? पिताजी बोले उसे क्या आपत्ति हो सकती है ! तो बोली…मुझे यह शादी मंजूर है।
लड़की….इसका मतलब तुम्हारे पिता जी दूसरी शादी करना चाहते हैं ?
लड़का…ठीक कह रही हो। तुम्हारी बातों से भी यही लगता है कि तुम्हारी मम्मी दूसरी शादी करना चाहती हैं !
लड़की…कहीं तुम्हारे पिता प्रिंसिपल तो नहीं ?
लड़का…कहीं तुम्हारी मम्मी दूर संचार विभाग में अधिकारी तो नहीं ?
दोनो एक दूसरे से लिपटकर देर तक रोते रहे। घंटो पश्चात दोनो ने फैसला किया कि अब इस दुनियाँ में जीने से कोई फायदा नहीं। कल सुबह राजघाट पुल से गंगा में कूद कर आत्महत्या कर लेते हैं। हाँ फिर हमारे मम्मी-पापा जैसा चाहें वैसा करें। सुबह ठीक छः बजे मिलने का वादा कर दोनो अपने-अपने घर लौट गये। दोनो ने अपना-अपना सुसाइट नोट तैयार किया….
लड़के ने लिखा…पिता जी ! आपको शादी मुबारक हो…गुड बाय !
लड़की ने लिखा..मम्मी ! आपको शादी मुबारक हो…गुड बाय !
दूसरे दिन। लड़की ने माँ को अंतिम बार देखा। माँ गहरी नींद में सो रही थी। टेबल पर शादी के कार्ड रखे थे। मारे गुस्से के तिलमिलाई….ओह ! तो इनलोगों ने शादी के कार्ड भी छपवा लिये ! इस उम्र में धूम धाम से शादी करेंगे ? आँसूओं को जब्त कर धीरे से एक कार्ड उठा लिया।
पुल पर लड़का उसी का इंतजार कर रहा था। लड़की ने लड़के के हाथ में कार्ड रख दिया। लड़का बोला..यह क्या है ? लड़की बोली…मरने से पहले अपने पिताजी के शादी का कार्ड नहीं देखना चाहोगे ? लड़के ने कार्ड खोला। कार्ड में सुनहरे अक्षरों में उसका और लड़की का नाम लिखा हुआ था ! उसने मारे शर्म के लड़की को कार्ड थमाते हुए कहा…मरने से पहले तुम भी देख लो ! कहीं इस बात का अफसोस न रहे कि जीते जी हम अपने माँ-बाप को ठीक से पहचान नहीं सके !
नीचे नदी के बीच धार में नाव पर बैठा बूढ़ा माझी युवा जोड़े को आपस में लिपटते, रोते, हँसते, खिलखिलाते देख झूम कर गाने लगता है….जै गंगा मैया तोहें पियरी चढ़ैबे…….