जीत का जश्न

संघर्ष में जनता की जीत हुई। सरकार को झुकना पड़ा। यह राजतंत्र नहीं है कि राजा का तख्ता पलट दिया जाता और दूसरा निरंकुश तानाशाह राजगद्दी पर बैठ जाता। यह लड़ाई सत्ता के लिए भी नहीं थी। यह विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। लोकतंत्र में सच्चाई के लिए होने वाली हर लड़ाई में जीत हमेशा जनता की ही होती है। सरकार ने नोटिफिकेशन जारी कर दिया। अन्ना हजारे ने अपना अनशन तोड़ दिया। अनशन तोड़ते हुए महानायक ने कहा….यह आंदोलन की शुरूआत है, मैं देश के कोने-कोने में जाऊँगा, यह आजादी की दूसरी लड़ाई है। इसी रास्ते पर चलकर हम शहीद भगत सिंह और राजगुरू के एहसान को कुछ हद तक चुका सकते हैं।
यह ईमानदारी के लिए, ईमानदारी से किया गया संघर्ष था जिसके नायक बने अन्ना हजारी। इस संघर्ष में वे भी थे जो ईमानदार थे,  वे भी थे जो ईमानदार होना चाहते थे और वे भी थे जो ईमानदार दिखना चाहते थे। संघर्ष जिनसे था उनमें भी सभी प्रकार के लोग थे। वे भी जो ईमानदार थे,  वे भी थे जो ईमानदार होना चाहते थे और वे भी जो ईमानदार दिखना चाहते थे। यह ईमानदारी के लिए ईमानदारी से किया गया जन संघर्ष था। ऐसा लगा कि चैत्र नवरात्रि में माँ सरस्वती समस्त देशवासियों की जिह्वा पर विराजमान हो गई थीं। ऐसा वातावरण बना जिसने लोकपाल बिल के रूप में जनता के हाथ में एक अमोघ अस्त्र थमा दिया।
शोले फिल्म का एक दृश्य याद आ रहा है……
खूंखार डाकू गब्बर सिंह घोड़े पर बैठकर भागा जा रहा है। ईमानदार इंस्पेक्टर उसका पीछा कर रहा है। गब्बर गिड़गिड़ा रहा है…..छोड़ दे..छोड़ दे..ठाकुर। इंस्पेक्टर घोड़ा तेज दौड़ाते हुए अपने एक हाथ से डाकू के गरदन को पकड़ते हुए दहाड़ता है….गब्बर सिंह, ये हाथ नहीं फाँसी का फँदा है।
दूसरे दृश्य में गब्बर सिंह हथकड़ियों से जकड़े दिखाई देता है। इंस्पेक्टर को देखते ही चीखता है…बहुत पछताओगे ठाकुर। बहुत पछताओगे। मुझसे दुश्मनी महंगी पड़ेगी। दुनियाँ की कोई ताकत गब्बर सिंह को 20 वर्षों के लिए जेल में नहीं बंद कर सकती। जिस दिन मैं छूट कर बाहर आया। बहुत पछताओगे। वाकई ईमानदार इंस्पेक्टर को पहुत पछताना पड़ता है। ईमानदारी की कीमत चुकानी पड़ती है। मगर वह हिम्मत नहीं हारता। बुरे काम करने वाले सही मगर साहसी नव युवकों जय-विजय की मदद से डाकू का समूल नाश करके ही मानता है।
आज जनता के हाथ में भी वह रस्सी लग चुकी है जिससे फाँसी का फँदा तैयार हो सकता है। जिससे भष्टाचार रूपी डाकू का समूल नाश किया जा सकता है।  जरूरत है ईमानदारी से इस्तेमाल किये जाने की। जरूरत है सब कुछ सहकर भी डाकुओं से संघर्ष करने वाले ईमानदार इंस्पेक्टर की और जरूरत है जय-विजय की जो ईमानदार इंस्पेक्टर का पूरा साथ दें।
अन्ना हजारे ने सही कहा। यह तो अभी सिर्फ एक शुरूआत है। अभी कई प्रश्न हल करने हैं। आइये जनता की इस जीत का जश्न मनायें।

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17 thoughts on “जीत का जश्न

  1. सही कहा यह तो अभी सिर्फ एक शुरूआत आइये जनता की इस जीत का जश्न मनायें। अभी तो यह अंगड़ाई है आगे बहुत लड़ाई है अच्छी पोस्ट, आभार ……….

  2. अभी तो यह आगाज है अंजाम देखना है! भ्रष्टाचार को आख़िरी पैगाम भेजना है

  3. आगाज अच्छा हो तो अंजाम अच्छा होने का अनुमान तो लगाया ही जा सकता है .

  4. आज ज़रुरत है कि एक अन्ना हजारे के साथ हजारों , लाखों हजारे पैदा हो जाएँ जो इन शोलों को बुझने न दें ।अच्छा है शुरुआत तो हुई ।

  5. अन्ना और उनके साथियों के प्रयास, संघर्ष और जज्बे को सलाम…. जनता के समर्थन और जज्बे को देखकर लगता है कि अब लोगों में भ्रष्टाचार के प्रति जागरूकता बढ़ रही है….मेरा मानना है कि भर्ष्टाचार हमारे अन्दर से ही शुरू होता है, और जब तक आम जनता खुद इससे पीछा नहीं छुटाएगी, तब तक यह ज़हरीले सांप की तरह डसता ही रहेगा…. हम चाहते हैं कि दुसरे ठीक हो जाएं और हम वैसे के वैसे ही रहें…. दुसरे संघर्ष करें, भूख हड़ताल करें और हम बस दो शब्दों से उनकी वाहवाही करके इतिश्री पा लें…. इससे कुछ नहीं होने वाला… बल्कि बदलाव हमारे खुद को बदलने के प्रयास से ही आएगा… अन्ना ने शुरुआत की है, यह हर एक के लिए अपने अन्दर के बदलाव का एक बेहतरीन समय है… उम्मीद है शब्दों से आगे बढ़कर यह बात, दूर तक जाएगी…

  6. मैं भी सहमत हूं । ये तो सिर्फ़ एक शुरुआत है ।बस एक ख्वाहिश है -ऐसा ही कोई शख्स डा.बी.पी.सिंह और डा. आर्या के पक्ष में आ कर सच का पर्दाफ़ाश कर दे !

  7. नहीं बंधु जश्‍न मनाने का समय नहीं है। क्‍योंकि जश्‍न मनाने के बाद गहरी नींद आती है। और नींद का मतलब अवचेतना। हमें जागते रहने की जरूरत है। हर बार अन्‍ना नहीं आएंगे जगाने। तो जागते रहो…।

  8. क़ानून बन जाने से भ्रस्टाचार नहीं मिट सकता.वैसे अन्ना हजारेजी की मेहनत काबिलेतारीफ है,उनकी मेहनत कुछ तो रंग लाये,मेरी यही कामना है'

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