बहुत अच्छा शहर है क्या..!

पिछले पोस्ट मैं बनारस बोल रहा हूँ  में आपने समग्र बनारस दर्शन को पढ़ा। इस लेख को पसंद करने वालों में कई ऐसे लेखक भी थे जो यहाँ पहली बार आये। कई नियमित पाठक अपनी व्यस्तताओं के कारण नहीं पढ़ सके। मैं सभी का आभारी हूँ जिन्होने मेरा श्रम सार्थक किया। अरूण प्रकाश जी ने लिखा कि आज कल बनारस कि क्या दुर्गति हुई है इस पर आप ने प्रकाश नही डाला शायद इस समय आप बनारस मे नही है ….। उनके इसी कमेंट को आधार बनाते हुए प्रस्तुत है एक व्यंग्य गीत जो बनारस के यश गान के विपरीत बनारस की दुर्दशा का आंशिक चित्रण है। अभी इसमें खस्ता हाल सड़कों का वर्णन नहीं है। उसके लिए तो अलग से पुराण ही लिखना पड़ेगा।
बड़ी तारीफ करते हो

बहुत अच्छा शहर है क्या !

ये गंगा घाट की नगरी
ये भोले नाथ की नगरी
यहां आते ही धुल जाते
सभी के पाप की गठरी

जहां हो स्वर्ग की सीढ़ी
कहीं ऐसा शहर है क्या !

[बड़ी तारीफ करते हो….]

कहीं चोरी कहीं डाका
कहीं मस्ती कहीं फांका
यहां के भांड़ भौकाली
यहां हर बात में झांसा

पढ़ी क्या आज की खबरें
कहीं अच्छी खबर है क्या !

[बड़ी तारीफ करते हो….]

यहां चलती है रंगदारी
यहां मरते हैं व्यापारी
यहां मरना ही मुक्ति है
यहां जीना है लाचारी

यहां हर मोड़ पर गुंडे
शरीफों का बसर है क्या !

[बड़ी तारीफ करते हो….]

सड़कें जाम रहती हैं
कभी बिजली नहीं रहती
जनता चीखती मन में
जुबां से कुछ नहीं कहती

चढ़ी है भांग की बूटी
उसी का ये असर है क्या !

[बड़ी तारीफ करते हो….]

यहां हर घाट पर बगुले
मुसाफिर को कहें मछरी
लुटाते पुन्य का दोना
चलाते पाप की चकरी

कहाँ की बात करते हो
बनारस भी शहर है क्या !

[बड़ी तारीफ करते हो….]

मैं बनारस बोल रहा हूँ

एक नायाब ललित निबंध हाथ लगा। इस्पात भाषा भारती के अगस्त-सितम्बर 2010 के अंक में प्रकाशित इस निबंध के लेखक हैं प्रसिद्ध साहित्याकार डा0 उदय प्रताप सिंह। इस निबंध ने मुझे इतना प्रभावित किया कि मैं सब काम छोड़कर इसे टंकित करने और आप सभी को पढ़ाने का मोह नहीं त्याग सका। मेरा विश्वास है कि यह बनारस को समझने/जानने में थोड़ा सहायक जरूर सिद्ध होगा। अब आप ही बताइये कि  कैसा है यह निबंध ?
मैं बनारस बोल रहा हूँ
मैं बनारस हूँ बनारस ! राजा बनार की राजधानी। मैं कभी नीरस नहीं होता। मेरा रस सूखता नहीं। मेरा रस ही मेरा जीवन है। बहुत पहले से मुझे काशी कहा जाता है। आज भी जिन्हें अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ने की ललक है वे मुझे काशी ही कहते हैं। मैं एक पवित्र नदी का उत्तरमुखी गंगा तीर्थ हूँ। वरूणा की लोललहर और अस्सी नदी की स्फीत भरी जलराशियों में आबद्ध हूँ इसीलिए लोग मुझे वाराणसी (वरूण+अस्सी) भी कहते हैं। वैसे मैं गंगा सेवित हूँ पर बारहों महीने गंगा की सेवा करता हूँ। गंगा मेरी बड़ी सहायता करती हैं, नहीं तो मुझे घास कौन डालता ! शताब्दियों से मैं गंगा तीर्थ का इकलौता प्राचीनतम नगर हूँ। यहाँ पंचनद भी बहते हैं। इन्हे ही मेरे समर्थक पंचगंगा कहते हैं। गंगा, यमुना और सरस्वती की धारा प्रयोग को संस्पर्शित करती हुई मेरी किरणा और धूतपापा से पंचगंगा पर ही संगमन कर बैठती है। इस संगमन का महत्व कार्तिक मास में और बढ़ जाता है। यह लोकजीवन की धारा से जुड़ जाता है। यहीं आकाशदीप जलते हैं। पानी में टिमटिमाते उनके प्रतिबिम्ब को देख सौंदर्यप्रेमी कवि जयशंकर प्रसाद मोहित हो उठे। उन्होने आकाशदीप नाम की कहानी ही लिख दी। मेरे सीने पर गंगा बहती है या यों कहें कि गंगा में ही मेरा वास है। मैने गंगा को तीर्थ, पूर्णतीर्थ, परमतीर्थ बनाने के लिए क्या-क्या नहीं किया कुंड, पुष्कर, वापी, गढ़हा और मत्स्योदरी (मछोदरी) झील जैसी जल संस्थाओं को गंगोन्मुखी बनाया। मेरी भूमी पर मर कर लोग मोक्ष प्राप्त करते हैं। इसीलिए मुझे मुक्ति क्षेत्र कहा जाता है। मेरे शहर में जीने के लिए चना-चबैना और गंगाजल पर निर्भरता ही पर्याप्त मानी जाती है। ये मेरी कुछ विशेषताएँ हैं जिन्हें बता देना मैं अपना कर्तव्य समझता हूँ।
मेरी भूमि पर हर आँख पढ़ने के लिए खुलती है, होठ और जिह्वा मंत्रोच्चार के लिए आतुर रहते हैं। हर छोटा बड़ा आदमी मुझे संस्पर्श कर ऋषी बन जाता है। अभी मेरी सड़कें खुरदुरी और विषम हैं। मेरे पार्कों में प्रेमी युगल अभी स्वतंत्र नहीं घूम सकते। उन पर हजार आँखें लगी हुई हैं कि ये बनारस का बना रस न खट्टा कर दें। अभी मेरे पास बहुत सुंदर सभाकक्ष भी नहीं है। आश्रमों के पांडाल हैं। उन्हीं में ज्ञान की वर्षा होती है। मेरी फिजाओं में मस्ती का आलम है। यहाँ जो भी आया यहीं का होकर रह गया। आने वाला आते ही आसमान में चलने लगता है, ऋतुओं की हवाओं में नहाने लगता है। मंदिरों के शिखरों पर पग प्रणाम करने लगता है। यहाँ कोई आना चाहे, चाहे न चाहे, आने पर जाना नहीं चाहता।
हाँ जनाब ! मैं बनारस बोल रहा हूँ। भक्ति गंगा के भगीरथ स्वामी रामानंद से मेरा बहुत पुराना नाता है। कहते हैं तैलंग स्वामी ने जलराशि पर पद्मासन लगाकर साढ़े तीन सौ वर्षों का जीवन यहीं जिया था। कबीर और रैदास तो मेरे लाड़ले ही हैं। तुलसीदास रामगाथा के लिए मुझे ही चुनते हैं। वह तुलसीघाट मेरे परिवार का जाग्रत सदस्य आज भी बना हुआ है। बुद्ध ने मेरे ही सहोदर की सरजमीं सारनाथ में प्रथम उपदेश प्रदान कर धर्मचक्र प्रवर्तन किया। महात्मा गाँधी ने हरिजन आंदोलन की प्रेरणा मेरे कबीरचौरा मठ से प्राप्त की। साहित्य सर्जना में लीन पंडितराज जगन्नाथ ने सभी पंडितों का मानमर्दन मेरा ही अन्न-जल ग्रहण कर पूरा किया। ‘सुस्तनी’ और ‘कुरंगी’ यवन कन्या को ‘दृगंगी’ करने का पश्चाताप उन्होने ‘गंगा लहरी’ लिखकर किया और मेरी ही गंगा की उठती लहरों में एक लहर की तरह तर गए। मेरी ही भूमि पर पश्चाताप कर लोग शांति प्राप्त करते हैं। मैं कहाँ किसी को बख्सने वाला ! तमाम भ्रांत परिभ्रांत सम्भ्रांत जन मेरे ही आगोश में पापक्षय की लीला करते हैं। मेरे एक नहीं अस्सी पचासी घाट किसी न किसी रूप में तारक मंत्र को सार्थक कर देते हैं जो उनके भी वश में नहीं होते उनके लिए पिशाचमोचन का पोखरा है। मैं पाप और शाप दोनो से मुक्ति देता हूँ। पाप गंगा में धुल जाते हैं और शाप शास्त्रों के ज्ञान से मिट जाते हैं।
भारतेन्दु, प्रेमचंद, प्रसाद, रामचंद्र शुक्ल, गोपीनाथ कविराज, जयदेव सिंह, धूमिल, हजारी प्रसाद द्विवेदी मेरे ही कुल-खानदान के हैं। ये सभी अपने-अपने क्षेत्र के क्षत्रप हैं। स्वाधीन चेतना को सतर्क करने वाला बनारस अखबार मेरा ही नाम ग्रहण कर प्रसिद्ध हो गया। रणभेरी और मर्यादा जैसी पत्रकाएं मेरी ही कुक्षि से उत्पन्न हुईं। मैं अभिमान कैसे करूँ पर गर्व की बात है कि मेरे राजनेता भी साहित्यकार कहलाने में गौरवान्वित होते हैं। यहां के संत महात्मा भी उपदेश देने के लिए साहित्य को ही माध्यम बनाते हैं। स्वामी रामानंद से काष्ठ जिह्वास्वामी तक और राजाओं में मेरे राजा ईश्वर प्रसाद नारायण सिंह से अंतिम काशिराज विभूतिनारायण सिंह तक साहित्य को ही अपना कर्म मानते थे। कहाँ तक कहूँ मेरे नगर सेठों में साहित्य के प्रति वही निष्ठा है जो शिव के प्रति। साहित्य और शास्त्र की इसी उदार मनोभूमि पर हमने अन्यों को वही आदर दिया जो अपनों को। अरे, भाई कबीर तो जुलाहे हैं लेकिन उन पर प्रेम भक्ति का चढ़ा रंग तो देखिए। वह कितना गाढ़ा है, कितना पक्का है कितना बनारसीपन लिए हुए है। वर्जित और स्वीकृत रास्तों के बीच वह अपने प्रभु का मार्ग कैसे तलाश लेते हैं। उन्हें छोड़िए रैदास को देखिए। वह दलित हैं पर बड़े-बड़े काशी के विद्वान उन्हें दंडवत करते हैं। उनकी भक्ति साधना की संजीवनी वर्ण को विवर्ण कर देती है। ऐसी गुणग्राहकता मेरे सिवा और कहाँ मिलेगी ? ईरान से शेख अली आकर बनारस के औलिया बन गये। दाराशिकोह के गुरू शेख चेहली पर मेरी फक्कड़ाना रंगत कैसे चढ़ गई है-यह किसी से छिपा नहीं। तेगअली तो रामधै की कसम खा कर अपनी मौज मस्ती का इजहार करते रहते थे। कलकत्ते जाते समय मियाँ गालिब सुबह-ए-बनारस के इतने मुरीद बन गए कि एक दिन का ठहराव एक माह तक चलता रहा। वह तो मेरे जर्रे-जर्रे में यहाँ तक कि भस्मीभूत शवों के खाक तक में देवता के दीदार करने लगे।
मैं आपसे क्या-कया कहूँ जनाब ! सन् 1857 की वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई को मैने ही अपनी धरती पर जन्म दिया। क्रातिंकारी शचींद्रनाथ लाहिड़ी और क्रांतिदूत चंद्रशेखर आजाद मेरे गंगाजल और चना-चबैना पर ही फिदा थे। आजाद को तो मैं इतना जम गया कि वह यहीं रहकर अध्ययन के साथ क्राँतिकारी गतिविधियाँ भी संचालित करने लगे। यहीं पहली और अंतिम बार गिरफ्तार किए गए। मुझे लोग राजा बनारस भी कहते हैं। मुझे लोग ‘काSरजा’ ‘बाSरजा’ कहकर एक दूसरे का स्वागत करते हैं। मेरे अखाड़ों के पहलवान बड़े-बड़े डीलडौल वाले पंजाबियों पर कालाजंग दाव लगाकर ऐसे धराशायी कर देते हैं मानो कोई सिंह शावक किसी हाथी के मस्तक पर सवार हो गया हो। मैने कलाजगत को कई नायाब चीजें दी हैं। लकड़ी के खिलौने बड़ी-बड़ी कंपनियों के उत्पादों को श्रीहीन कर देते हैं, पर आज बहुराष्ट्रीय कपंनियों की मार मेरे हलक को सूखा कर दे रहीँ है। बनारसी साड़ियों का क्या कहना ! हर नवयुवती चाहती है कि वह प्रियतम से पहला मनुहार बनारसी साड़ी में करे। रानी इसे पहनकर महारानी बन जाती है और नौकरानी इसे धारण कर अपने ‘राजा’ की ‘रानी’। गज़ब का क्रेज है इस साड़ी का, उससे अधिक इसकी कला का। पर आज ये साड़ियाँ भी नकली बनारसी साड़ियों को देखकर अपने को हतभाग्य समझ अवाक हो गयी हैं। यह मेरा दर्द है, किससे कहूँ, कौन सुनने वाला है ? समरसी संस्कृति के विकास में मैने कई शताब्दियाँ लगा दीं। सबका आदर किया, सबको सम्मान दिया चाहे वह जिस धर्म-मजहब का हो, जाति बिरादरी का हो, रंग- कविरंग-बदरंग हो। पर मेरी ही गोदी में बैठकर मुझे ही आँखें तरेरने वाले का मैने हाथ भी मरोड़ दिया। इसका साक्षी मैं स्वयं हूँ। राजा चेत सिंह और वारेन हेस्टिंग्स का संघर्ष इसका दूसरा प्रमाण है। मेरे विद्वानो ने इसे इतिहास में अक्स कर लिया है। मेरी ही क्रोड़ में अनेक ग्यानी-ध्यानी और जगतगुरूओं ने विश्वकल्याण की कामना की। मेरे पास ज्ञान केद्रों की लम्बी सूची है। विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों की ज्ञानराशियाँ हैं। मकतब-मदरसों और सनातनी संस्थानों के संस्कार केन्द्र भी हैं। महामना मालवीय को मैं ऐसा जमा कि त्रिवेणी त्याग यहीं के हो गए। राजर्षि उदय प्रताप सिंह जू देव ने अपनी पूरी संपत्ति को अपने नाम की संस्था में 1909 ई. में ही खर्च कर दिया। मुझे लोग कितना पसंद करते हैं मैं क्या-क्या बताऊँ ?
पूरे हिन्दुस्तान को एक स्थान पर देखना हो तो मेरी यात्रा कीजिए। मुझे लघु भारत कहा जाता है। मैने भाषा, मजहब, पूजा पद्धति, संस्कृति धर्म, रीति-नीति, बोलचाल, पहनावा, खानपान सबमें अंतर देखा पर मनुष्य के स्तर पर सब बराबर हैं- ‘आत्मवत सर्वभूतेषु’ को कभी विस्मृत नहीं किया। मेरे यहाँ बंगाली, पंजाबी, तमिल तेलगु, मलयालम, केरली, कन्नड़, मराठी, गुजराती और राजस्थानी सबके अपने-अपने घाट हैं, मुहल्ले हैं, आश्रम और मंदिर हैं पर सभी नहाते हैं गंगा में और रहते हैं बनारस में। यह मैं इसलिए कह रहा हूँ कि यह मेरी मिट्टी की विशेषता है। मराठी को हिन्दी बोलने पढ़ने का दबाव मैने कभी नहीं बनाया। तमिल को भोजपुरी और काशिका बोलने का आग्रह मैने कभी नहीं किया। मैं मगही पान जमाने की राय नहीं देता पर लोग हैं कि भोजपुरी बोलते हैं, काशिका में मजाक करते हैं और मुख में मगही पान जमाए जबड़े को आकाशमुखी किए ध्वनि और संकेत के आधार पर गूढ़ से गूढ़ बातें कर लेते हैं। इसमें बंगाली हैं, तमिल हैं, कन्नड़ हैं, भोजपुरिया भी हैं।
अरे भाई ! मैं तो गलियों का देहातनुमा शहर हूँ। सारी गलियाँ पूर्व दिशा में गंगा की ओर खुलती हैं। गंगा को निहार कर गलियाँ निहाल हो जाती हैं। कहती हैं इसके आगे भी संसार होता है क्या ? हाँ, आप सबको एक नई सूचना दूँ अब मैं आधुनिक बन रहा हूँ। मेरे सीने में बड़े-बड़े मॉल चुभाये जा रहे हैं। मेरा शरीर दर्द से फटा जा रहा है। मेरी गुह्य और रहस्यभरी साधनाएं बाजारू बनायी जा रही हैं। मुझ पर चित्र बन रहे हैं, फिल्में बन रही हैं। हर नगर में एक बनारस बसा जा रहा है। देश में परदेश में हिन्दुस्तान के कई बड़े अखबारों का मैं उपनिवेश बन चुका हूँ। इतना ही नहीं संगठित अपराध का केन्द्र भी बन चुका हूँ। रेडियो,  दूरदर्शन-साहित्य, छोटी-बड़ी मीडिया की संस्थाएं यहाँ दिल्ली का रक्त लेकर मुंबई शैली में धड़कने लगे हैं। बड़े-बड़े उपरिगामी सेतु बन रहे हैं। उनकी चौहद्दी में आने वाले उनके नीचे हजारों वर्ष का इतिहास समेटे भवन टूट रहे हैं, मूर्तियाँ बिखर रही हैं। बढ़ते हुए पूँजीवाद, चिकनी सड़कें, पेट्रोल उगलती गाड़ियाँ रबर और प्लास्टिक का हमला इन सबका डर मेरे खेत-गाँव बचे रहें, ईंटों और कंक्रीट से मेरी साँस फूलती है। मेरी मंशा है ‘घर’ बचे रहें। लोग रामचरितमानस, गोदान, कामायनी और तितली पढ़ें। माँ को माँ, बहन को बहन, मित्र को मित्र, पत्नी को पत्नी, गाँव को गाँव, घर को घर कहते रहें। चाहे यह मेरा सपना ही क्यों न हो। उसे देखने का पूरा अधिकार है। मैं सच कहता हूँ कभी-कभी सच से ज्यादा मुखर और प्रमाणिक सपना भी होता है। मेरी जेहन में यह प्रश्न बार-बार कौंधता है कि मनुष्य ने इतनी लम्बी यात्रा निर्वसन होते हुए भी निर्वसन होने के लिए नहीं की है।
मैं बनारस कभी एकांत में सोचता हूँ कि हिन्दुस्तान में रहते हुए पाकिस्तान के नाम पर आतिशबाजी करने वाले लोग यदि बुरे हैं तो सामाजिक समता के नाम पर हिंसा फैलाने वाले लोग उससे भी अधिक जघन्य हैं। अमेरिका और जापान, जर्मनी या कोरिया को स्वप्न लोक मानने वाले लोग भी घृणित हैं। मैं बनारस अपनी आत्मा से बोल रहा हूँ कि धर्म का कोई भी नया संस्करण मुझे स्वीकार नहीं। मेरा पुराना धर्म ही मनुष्य बनने बनाने में समर्थ है। नये धर्म में धर्म परिवर्तन का अजीब बवाल है। ईसाई हिन्दू को कट्टर हिन्दू बना रहा है। मुसलमान भी हिन्दू को ज्यादा हिन्दू बना रहा है और हिन्दू मुसलमान को याद दिला रहा है कि तुम मुसलमान हो। ईसाई को हिन्दू बताना चाहता है कि तुम ईसाई हो। धर्म के इस नये कलेवर में मैं-बनारस आहत हूँ। आदमीयत की मुकम्मल तलाशी ही मेरा स्वरूप (बनारसीपन) है। मैं बनारस के रूप में सोचता हूँ कि आदमी की तलाश के लिए धर्म या धर्मों के मूल सच को मनुष्य के पक्ष में जोड़ देना होगा।
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(चित्र गूगल से साभार) 

गंगा रोड…!

गंगा दशहरा पर विशेष……..

जून, 2111 की शाम । वाराणसी के गंगा रोड के किनारे बीयर बार की दुकान पर बैठे पाँच युवा मित्र। एक-एक बोतल पी लेने के बाद आपस में चहकते हुए………

तुमको पता है ? ये जो सामने 40 फुट चौड़ी गंगा रोड है न ! वहां आज से 100 साल पहले तक गंगा नदी बहती थी !

हाँ, हाँ पता है। आज भी बहती है। सड़क के नीचे नाले के रूप में।

सच्ची ! आज भी बहती है ? पहले नदी बहती थी तो उस समय पानी बीयर से सस्ता मिलता होगा !

बीयर से सस्ता ! अरे यार, बिलकुल मुफ्त मिलता था। चाहे जितना नहाओ, चाहे जितना निचोड़ो। और तो और मेरे बाबा कहते थे कि उस जमाने में यहाँ, जहाँ हम लोग बैठ कर बीयर पी रहे हैं, गंगा आरती हुआ करती थी।

ठीक कह रहे हो। मेरे बाबा कहते हैं कि यहां से वहाँ तक इस किनारे जो बड़े-बड़े होटल बने हैं न, लम्बे-चौड़े घाट हुआ करते थे और नदी में जाने के लिए घाट किनारे पक्की सीढ़ियाँ बनी थीं।

तब तो नावें भी चलती होगी नदी में ? गंगा रोड के उस किनारे जो लम्बा ब्रिज है वो दूसरा किनारा रहा होगा क्यों ?

और नहीं तो क्या दूर-दूर तक रेतीला मैदान हुआ करता था, जहाँ लोग नैया लेकर निपटने जाते थे और लौटते वक्त नाव में बैठ कर भांग बूटी छानते थे।

भांग-बूटी ? बीयर नहीं पीते थे !

चुप स्साले ! तब लोग गंगा नदी को माँ की तरह पूजते थे। नैया में बैठकर कोई बीयर पी सकता था भला ?

उहं ! बड़े आए माँ की तरह मानने वाले। क्या तुम यह कहना चाहते हो कि माँ मर गई और हमारे पूर्वज देखते रह गये ? कुछ नहीं किया ?

हमने इतिहास की किताब में पढ़ा है। राजा भगीरथ गंगा को धरती पर लाये थे।

यह नहीं पढ़ा कि हमारे दादाओं, परदादाओं ने पहले नदी में इतना मल-मूत्र बहाया कि वो गंदी नाली बन गई और बाद में गंदगी छुपाने के लिए लोक हित में उस पर चौड़ी सड़क बना दी !

बड़े शातिर अपराधी थे हमारे पुर्वज। माँ को मार कर अच्छे से दफन कर दिये।

अरे यार ! गंदी नाली को रखकर भी क्या करते ? अब तो ठीक है न। नाली नीचे, ऊपर सड़क। विज्ञान का चमत्कार है।

विज्ञान का चमत्कार ! इतना ही चमत्कारी है विज्ञान तो क्यों नहीं गंगा की तरह एक नदी निकाल देता ? बात करते हो ! पानी का बिल तुम्हीं देना मेरे पास पैसा नहीं है । बाबूजी से मुश्किल से दो हजार मांग कर लाया थो वो भी खतम हो गया। सौ रूपया गिलास पानी, वो भी खारा !

जानते हो ! मैने पढ़ा है कि सौ, दो सौ साल पहले गंगा नदी का पानी अमृत हुआ करता था। जो इसमें नहाता था उसको कोई रोग नहीं होता था। तब लोग नदी के पानी को गंगाजल कहते थे। पंडित जी, गंगा स्नान के बाद कमंडल या तांबे-पीतल के गगरे में भरकर ठाकुर जी को नहलाने के लिए या पूजा-आचमन के लिए ले जाते थे। सुना है दूर-दूर से तीर्थ यात्री आते और गंगाजल को बड़ी श्रद्धा से प्लास्टिक के बोतल में रख कर ले जाते।

हा…हा…हा…दूर के यात्री ! प्लास्टिक के बोतल में गंगाजल घर ले जाते थे ! घर ले जाकर सड़ा पानी पीते और मर जाते थे । क्या बकवास ढील रहे हो ! एक बोतल बीयर ही फुल चढ़ गई क्या ?

पागल हो ! जब कुछ पता न हो तो दूसरे की बात को ध्यान से सुननी चाहिए। तुम्हे जानकर आश्चर्य होगा कि गंगाजल कभी सड़ता ही नहीं था। उसमें कभी कीड़े नहीं पड़ते थे।

क्या बात करते हो ! गंगाजल में कभी कीड़े नहीं पड़ते थे ? इसी पानी को घर ले जाओ तो फ्रेशर से फ्रेश किये बिना दूसरे दिन पीने लायक नहीं रहता और तुम कह रहे हो कि गंगाजल में कभी कीड़ा नहीं पड़ता था !

हाँ मैं ठीक कह रहा हूँ। गंगा में पहाड़ों से निकलने वाली जड़ी-बूटियाँ इतनी प्रचुर मात्रा में घुल जाती थीं कि उसका पानी कभी सड़ता ही नहीं था। माँ के जाने के बाद यह धरती अनाथ हो गई है।

इससे भी दुःख की बात तो यह है कि हम अपन संस्कृति को इतनी जल्दी भूल चुके हैं !

ठीक कह रहे हो। हमारी सरकारों ने भी संस्कृति को मिटाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी। तुम्हें पता है एक समय था जब वाराणसी में तीन-तीन नदियाँ बहती थीं। वरूणा, अस्सी और गंगा।

हाँ मैने सुना है। बनारस का नाम वाराणसी इसीलिए पड़ा कि यह वरूणा और अस्सी नदी के बीच बसा था। दायें बायें अस्सी-वरूणा और सामने गंगा नदी।

कल्पना करो…. तब यह कितना रमणीक स्थल रहा होगा !

पहले अस्सी नदी के ऊपर लोगों ने अपने घर बनाये फिर वरूणा नदी को पाट कर लिंक रोड निकाल दिया। गंगा नदी तो तुम्हारे सामने है ही….गंगा रोड।

इस सड़क का नाम क्यों गंगा रोड रख दिया ?

हा हा हा…हमारी सरकार चाहती है कि है जब लोग यहाँ बैठें तो बीयर पी कर थोड़ी देर इस नाम पर सोंचे और अपनी संस्कृति के विषय में आपस में चर्चा करें।

हाँ। सरकारें, संस्कृति की रक्षा ऐसे ही किया करती हैं।

……………………….

(चित्र गूगल से साभार)

राजनेता

बड़े भले लगते हैं
जब करते हैं
हमारे लिए
संघर्ष
दे रहे होते हैं
आश्वासन

बड़े बुरे लगते हैं
जब बैठे होते हैं
कुर्सी पर

दीन हीन लगते हैं
खटखटाते हैं
दरवाजा
मांगते हैं
वोट

राक्षस लगते हैं
जब चलवाते हैं डंडे
करते हैं अत्याचार

सभी जानते हैं
गिरगिट की तरह
बदलते हैं रंग
लगाते हैं
मुखौटे

समय-समय पर
बेनकाब भी हुए हैं
रावणी चेहरे

मगर अफसोस
जितने गहरे होते हैं
जिंदगी के जख्म
उतनी कमजोर होती है
जनता की याददाश्त।

      ……………….

सुबह तक विश्व पर्यावरण की चिंता कर रहा था मगर क्या पता था कि विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश का पर्यावरण ही पूरी तरह बिगड़ चुका है !

ये कोई और है…..!

प्रस्तुत है विश्व पर्यावरण दिवस को समर्पित एक नवगीत जो वर्ष 2002 में  उत्तर प्रदेश के नौ कवियों के काव्य संग्रह, काव्य स्वर में प्रकाशित है।

कहने लगीं अब बूढ़ी दादियाँ…..                                      

कहने लगीं अब बूढ़ी दादियाँ
बच्चों के हाथों में डोर है।
शहरों की आबादी जब बढ़ी
खेतों में पत्थर के घर उगे
कमरों में सरसों के फूल हैं
चिड़ियों को उड़ने से डर लगे।
कटने लगी आमों की डालियाँ
पिंजड़े में कोयल है मोर है।
[कहने लगीं अब बूढ़ी दादियाँ…..]
प्लास्टिक के पौधे हैं लॉन हैं
अम्बर को छूते मकान हैं
मिटा दे हमें जो इक पल में
ऐसे भी बनते सामान हैं।
उड़ने लगी धरती की चीटियाँ
पंखों में सासों की डोर है।
[कहने लगीं अब बूढ़ी दादियाँ…..]
सूरज पकड़ने की कोशिश ने
इंसाँ को पागल ही कर दिया
अपनी ही मुठ्ठी को बंद कर
कहता है धूप को पकड़ लिया।
दिखने लगीं जब अपनी झुर्रियाँ
कहता है ये कोई और है।
[कहने लगीं अब बूढ़ी दादियाँ…..]
……………………………………………………
(चित्र गूगल से साभार)