ये कोई और है…..!

प्रस्तुत है विश्व पर्यावरण दिवस को समर्पित एक नवगीत जो वर्ष 2002 में  उत्तर प्रदेश के नौ कवियों के काव्य संग्रह, काव्य स्वर में प्रकाशित है।

कहने लगीं अब बूढ़ी दादियाँ…..                                      

कहने लगीं अब बूढ़ी दादियाँ
बच्चों के हाथों में डोर है।
शहरों की आबादी जब बढ़ी
खेतों में पत्थर के घर उगे
कमरों में सरसों के फूल हैं
चिड़ियों को उड़ने से डर लगे।
कटने लगी आमों की डालियाँ
पिंजड़े में कोयल है मोर है।
[कहने लगीं अब बूढ़ी दादियाँ…..]
प्लास्टिक के पौधे हैं लॉन हैं
अम्बर को छूते मकान हैं
मिटा दे हमें जो इक पल में
ऐसे भी बनते सामान हैं।
उड़ने लगी धरती की चीटियाँ
पंखों में सासों की डोर है।
[कहने लगीं अब बूढ़ी दादियाँ…..]
सूरज पकड़ने की कोशिश ने
इंसाँ को पागल ही कर दिया
अपनी ही मुठ्ठी को बंद कर
कहता है धूप को पकड़ लिया।
दिखने लगीं जब अपनी झुर्रियाँ
कहता है ये कोई और है।
[कहने लगीं अब बूढ़ी दादियाँ…..]
……………………………………………………
(चित्र गूगल से साभार)
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21 thoughts on “ये कोई और है…..!

  1. प्लास्टिक के पौधे हैं लॉन हैंअम्बर को छूते मकान हैंमिटा दे हमें जो इक पल मेंऐसे भी बनते सामान हैं।sahi kaha dadi nani ne

  2. प्लास्टिक के पौधे हैं लॉन हैंअम्बर को छूते मकान हैंबहुत सुंदर प्रस्तुति सच्चाई से कही गयी दिल की बात …..

  3. प्लास्टिक के पौधे हैं लॉन हैंअम्बर को छूते मकान हैंमिटा दे हमें जो इक पल मेंऐसे भी बनते सामान हैं।क्या बात है. बहुत सुंदर कटाक्ष आजकी स्थिति पर.शुभकामनायें.

  4. प्लास्टिक के पौधे हैं लॉन हैंअम्बर को छूते मकान हैंमिटा दे हमें जो इक पल मेंऐसे भी बनते सामान हैं।वर्तमान हालातों को आपने बखूबी अभिवयक्त किया है …..आज हम बिलकुल भी चिंतित नहीं है पर्यावरण के प्रति …अगर आज हम पेड़ लगायेंगे तो कल आने वाली पीढ़ी को उसका लाभ होगा …बस यह सोचकर हमें निरंतर पर्यावरण के प्रति सचेत रहना चाहिए …आपका आभार

  5. पर्यावरण के बदलते रूप पर सचेत करती सुन्दर रचना ।दिखने लगीं जब अपनी झुर्रियाँकहता है ये कोई और है।कब तक झुठ्लायेंगे इस के दुष्प्रभाव को ।

  6. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी हैकल (6-6-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकरअवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।http://charchamanch.blogspot.com/

  7. जलवायु बहुत बदल गई है,इस बार पोखरा में अब तक उतनी गरमी नहीं हुई है,जितनी होती थी.तरकारी औए फल खाने से डर लगता है,न जाने कौन सा रसायन हो ? न जाने कितनी आपदाएं सहनी पड़ेंगी !न जाने हमारे बाद की पीढ़ी कैसे जीवन गुजारेगी !

  8. प्लास्टिक के पौधे हैं लॉन हैंअम्बर को छूते मकान हैंमिटा दे हमें जो इक पल मेंऐसे भी बनते सामान हैं।bahut sunder .har jagah jhoot aur fareb hai …asliyat kahan gayi …?gahan abhivyakti ke liye badhai …!!

  9. yathart batati hui saarthak rachanaa.प्लास्टिक के पौधे हैं लॉन हैंअम्बर को छूते मकान हैंमिटा दे हमें जो इक पल मेंऐसे भी बनते सामान हैं।badhaai sweekaren.please visit my blog.thanks

  10. प्लास्टिक के पौधे हैं लॉन हैंअम्बर को छूते मकान हैंबहुत सुन्दर .. यथार्थ

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