राजनेता

बड़े भले लगते हैं
जब करते हैं
हमारे लिए
संघर्ष
दे रहे होते हैं
आश्वासन

बड़े बुरे लगते हैं
जब बैठे होते हैं
कुर्सी पर

दीन हीन लगते हैं
खटखटाते हैं
दरवाजा
मांगते हैं
वोट

राक्षस लगते हैं
जब चलवाते हैं डंडे
करते हैं अत्याचार

सभी जानते हैं
गिरगिट की तरह
बदलते हैं रंग
लगाते हैं
मुखौटे

समय-समय पर
बेनकाब भी हुए हैं
रावणी चेहरे

मगर अफसोस
जितने गहरे होते हैं
जिंदगी के जख्म
उतनी कमजोर होती है
जनता की याददाश्त।

      ……………….

सुबह तक विश्व पर्यावरण की चिंता कर रहा था मगर क्या पता था कि विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश का पर्यावरण ही पूरी तरह बिगड़ चुका है !

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27 thoughts on “राजनेता

  1. मगर अफसोसजितने गहरे होते हैंजिंदगी के जख्मउतनी कमजोर होती हैजनता की याददाश्त।सही कहा है आपने …जितने गहरे जख्म होते जाते हैं उतनी ही जनता की यादाश्त भी कमजोर होती जाती है ..और जनता फिर से उन्हीं को चुनकर संसद में भेजती है ..और यह स्वार्थी राजनेता फिर से अपना रंग दिखाना शुरू कर देते हैं …..आपका आभार

  2. जनता की याददाश्त सच में बहुत कमजोर है, ये भी भुला दिया जायेगा जब वोटों से पहले पेट्रोल की कीमत कर कर दी गई या ऐसा ही कुछ फ़ंडा सरकार अपनायेगी।

  3. जनता की यादाश्त बहुत ही कमजोर होती है इसी का फायदा हमारे राजनेता उठते है अपने कुचक्र रचने के लिए .

  4. सोलह आने सच्ची बात देवेन्द्र भाई! सुबह के लिए हमने भी हरियाली सजाने का कार्यक्रम बनाया था..क्या पता था कि कालिख पुत जायेगी उसपर!!!

  5. मगर अफसोसजितने गहरे होते हैंजिंदगी के जख्मउतनी कमजोर होती हैजनता की याददाश्त।पाण्डेय जी डेमोक्रेसी का एक अर्थ है जिसमें जनता की ऐसी तैसी वही हुआ आज …

  6. सुबह तक विश्व पर्यावरण की चिंता कर रहा था मगर क्या पता था कि विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश का पर्यावरण ही पूरी तरह बिगड़ चुका है !अत्यंत सटीक विचारों से परिपूर्ण समसामयिक रचना…….सही कहा है आपने …

  7. शानदार व्यंग्य है ……जनता की याददाश्त कमज़ोर नहीं है पर वो उन सवालो के आगे इन्हें दरकिनार करती जो उसके सामने मुंह बाये खड़े है…..रोटी,कपडा और मकान….और अब तो इसमें और भी कई चीज़े जुड़ गयी हैं मसलन…..दूध,पेट्रोल, फीस इत्यादि…..बहुत अच्छी लगी पोस्ट |

  8. नेता बनने की चाहत में जब कोई अछ्छे काम करना छोड़ राजनीति करने लगता है,तो और भी बुरा लगता है.

  9. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 07- 06 – 2011को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ …शुक्रिया ..साप्ताहिक काव्य मंच — चर्चामंच

  10. जितने गहरे होते हैं जिंदगी के जख्मउतनी कमजोर होती हैजनता की याददाश्त।यकीनन इसी याददाश्त की कमजोरी ही तो हराती रही है और उन्हें जिताती रही है

  11. मगर अफसोसजितने गहरे होते हैं जिंदगी के जख्मउतनी कमजोर होती हैजनता की याददाश्त।-और ये नेता इस बात को भली भाँति जानते हैं, इसलिए फायदा उठाते हैं.

  12. मगर अफसोसजितने गहरे होते हैंजिंदगी के जख्मउतनी कमजोर होती हैजनता की याददाश्त…Indeed it's sad Devendra ji..

  13. बहुत खूब … देश के वातावरण से न सिर्फ़ पर्यावरण बल्कि सब कुछ प्रभावित होता है …. नेताओं का खाका जो आपने खींचा है शायद इससे भी ज़्यादा चालाक होते हैं …. कोई पार नही पा पाता ….

  14. मगर अफसोसजितने गहरे होते हैं जिंदगी के जख्मउतनी कमजोर होती हैजनता की याददाश्त।बहुत सटीक कथन…जनता की इसी कमजोरी का फायदा उठाते हैं हमारे तथाकथित नेता..बहुत सुन्दर और सटीक प्रस्तुति..

  15. मगर अफसोसजितने गहरे होते हैं जिंदगी के जख्मउतनी कमजोर होती हैजनता की याददाश्त।very true.

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