नदी में हलचल है

मेढक उछल रहे किनारे

मछली का मन चंचल है

नदी में हलचल है

मगरमच्छ लाचार पड़े हैं

संत समाधी पर अड़े हैं

आगे गहरा कुआँ खुदा है

पीछे चौड़ी खाई है

कल कल में अब दलदल है

नदी में हलचल है।

एक भगीरथ ने ललकारा

निर्मल होगी नदी की धारा

गंदे नाले सभी हटेंगे

कचरे साफ अभी करेंगे

निरूपाय खल का बल है

नदी में हलचल है।

हंसो से कह रहे शिकारी

नीर क्षीर विवेक छोड़ दे

पंछी चीख रहे मूर्ख तू

अब पिंजड़े के द्वार खोल दे

बढ़ रहा ज्वार पल पल है

नदी में हलचल है।

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22 thoughts on “नदी में हलचल है

  1. इस सुन्दर रचना पर टिप्पणी में देखिए मेरे चार दोहे-अपना भारतवर्ष है, गाँधी जी का देश।सत्य-अहिंसा का यहाँ, बना रहे परिवेश।१।शासन में जब बढ़ गया, ज्यादा भ्रष्टाचार।तब अन्ना ने ले लिया, गाँधी का अवतार।२।गांधी टोपी देखकर, सहम गये सरदार।अन्ना के आगे झुकी, अभिमानी सरकार।३।साम-दाम औ’ दण्ड की, हुई करारी हार।सत्याग्रह के सामने, डाल दिये हथियार।४।

  2. बहुत ही सार्ह्तक रचना.. आज के हालात को सही तरह से दर्शाती हुई है .. आभार विजय ———–कृपया मेरी नयी कविता " फूल, चाय और बारिश " को पढकर अपनी बहुमूल्य राय दिजियेंगा . लिंक है : http://poemsofvijay.blogspot.com/2011/07/blog-post_22.html

  3. सिंह जगे, कोलाहल न हो,शुद्धि हेतु गंगाजल न हो? साभार प्रवीण पाण्डेय जी .

  4. नमस्कार….बहुत ही सुन्दर लेख है आपकी बधाई स्वीकार करें मैं आपके ब्लाग का फालोवर हूँ क्या आपको नहीं लगता की आपको भी मेरे ब्लाग में आकर अपनी सदस्यता का समावेश करना चाहिए मुझे बहुत प्रसन्नता होगी जब आप मेरे ब्लाग पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराएँगे तो आपकी आगमन की आशा में……..आपका ब्लागर मित्र नीलकमल वैष्णव "अनिश"इस लिंक के द्वारा आप मेरे ब्लाग तक पहुँच सकते हैं धन्यवाद्वहा से मेरे अन्य ब्लाग लिखा है वह क्लिक करके दुसरे ब्लागों पर भी जा सकते है धन्यवाद् MITRA-MADHUR: ज्ञान की कुंजी ……

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