व्यवस्था परिवर्तन

कुछ लोग जगे रहते हैं। कुछ लोग सोए रहते हैं। कुछ ऐसे हैं जो न जगते हैं न सोते हैं सिर्फ बेचैन रहते हैं। सिर्फ चिंता करते हैं। चिंतित होते हैं बच्चों के भविष्य के प्रति। चिंतित होते हैं स्वास्थ के प्रति। चिंतित होते हैं भौतिक साधनो के प्रति। जो नहीं रहता उसी की कमी उन्हें अधिक खटकती है। समूह में हुए तो सभी दुःखों के लिए बढ़ रही महंगाई, बढ़ रहे भ्रष्टाचार और इन पर नियंत्रण न कर पाने वाली सरकार को ही जिम्मेदार मानते हैं। इस प्रक्रिया में कहीं खुद में दोष दिखा भी तो यह सोचकर कंधे झटक लेते हैं कि उहं.! ऐसा तो सभी करते हैं। इस तरह वे राष्ट्र के प्रति भी चिंतित होकर अपने कर्तव्य का निर्वहन करते हैं। हल दिखता है तो हल की तरफ भागते हैं। नहीं दिखता तो कुंठित होते हैं, हताश होते हैं या नशा करते हैं। नशे में खुश रहते हैं। ख्वाब देखते हैं। सुनहरे ख्वाब ! सुखी जीवन के सुंदर ख्वाब। सुंदर प्रेयसी के ख्वाब। हैंडसम युवक के ख्वाब। सती सावित्री पत्नी के ख्वाब । पूर्ण पुरूष के ख्वाब। श्रवण कुमार जैसे पुत्र के ख्वाब। इतना देख कर तृप्त नहीं होते, नशा पूरी तरह नहीं उतरता तो आगे बढ़ती है उसके ख्वाबों की दुनियाँ। देखने लगते हैं भ्रष्टाचार मुक्त राष्ट्र के ख्वाब !

इन सबके अलावा अधिसंख्य और भी हैं जो जीवित हैं । उन्हे पता ही नहीं चलता कि जगना या सोना किसे कहते हैं ! वे बेचैन भी नहीं रहते क्योंकि बेचैन होने के लिए उनके पास वक्त ही नहीं होता। उठने के साथ ही उनके आँखों के सामने दिन में तारे की तरह नाचने लगती है रोटी। वे भूखे हैं। नंगे हैं। रोगी हैं। जन्म से लेकर मृत्यु तक भूखे, नंगे, रोगी। जैसे थे वैसे के वैसे। एक बात मजे की है कि होता है उनके पास मतदाता पहचान पत्र या राशन कार्ड। थोड़े सशक्त हुए तो आ जाता है बीपील कार्ड भी। इन कार्डों से उनके आदमी होने और राष्ट्र के नागरिक होने का भान होता है। इन कार्डों से उनके धर्म और जाति का ज्ञान होता है। इन कार्डों से वे बांटे जा सकते हैं । यही वे कार्ड हैं जिसके आधार पर धर्मोपदेशक और नेता उन्हें पहचान पाते हैं। कौन मेरे हैं, कौन पराये ! इन्हीं कार्डों के बल पर वे भी जान पाते हैं कि वे भी आदमी हैं उनका भी महत्व है।

जो जगे हैं वे सबको जगाना चाहते हैं। जो सोए थे उनमें से कुछ जग भी जाते हैं, कुछ जगने की प्रकृया में बेचैन हो जाते हैं। जो बेचैन हैं उनकी स्थिति बड़ी विचित्र रहती है। वे मानते ही नहीं कि वे जगे नहीं हैं। लाख जगाओ जगते ही नहीं बस भीड़ में शामिल भर हो जाते हैं। वैसे ही जैसे चिंतित हो नशे में खो जाते हैं। जगे हुए लोगों के सामने सबसे बड़ी समस्या अधिसंख्य को जगाने की होती है। बिना अधिसंख्य के जगे वे क्रांति नहीं कर पाते। बिना क्रांति के सत्ता परिवर्तन की लड़ाई अधूरी रह जाती है। दुर्भाग्य यह होता है कि सत्ता उनके मतों पर राज करती है जिन्हें नहीं मालूम कि जगना और सोना किसे कहते हैं। वे बेचैन भी नहीं होते क्योंकि बेचैन होने के लिए उनके पास वक्त ही नहीं होता। उठने के साथ ही शुरू हो जाता है जीने के लिए संघर्ष। सत्ता जानती है कि बिना इनके जगे उन्हें कोई हटा नहीं सकता। सत्ता मानती है कि ये मेरे साथे हैं और बिना इनके कोई परिवर्तन संभव हो ही नहीं सकता। वे जो जीवित हैं, वे जो सिर्फ रोटी कपड़ा और मकान के लिए ही जीवन भर संघर्ष करते-करते मर जाते हैं, वे उन्हें ही अपना गॉड फादर मानते हैं जिन्होने उनके लिए मतदाता पहचान पत्र बनवाया, राशन कार्ड बनवाये, बीपीएल कार्ड बनावाये और तो और बच्चों को स्कूल भी भेज रहे हैं पढ़ने के लिए जहाँ मिलती है रोटियाँ…..!

कभी-कभी सत्ता से चूक हो जाती है। बढ़ जाती है जब हद से ज्यादा लूट तो बढ़ने लगती है महंगाई। महंगाई छीनने लगती है भूखों के मुँह से निवाले। मिल नहीं पाती जनता को रोटियाँ भी। विद्रोही हो जाती है अधिसंख्य जनता जिनके बल पर राज करती आई है सत्ता। भूख इंसान को पागल बना देती है। साथियों को मरते देख घबड़ा जाती है जनता। शामिल हो जाती उनकी भीड़ में जो लाना चाहते हैं क्रांति। बेसूध सत्ता जागती है मगर तब तक देर हो चुकी होती है। लटक चुका होता है फांसी का फंदा। हो चुकी होती है क्रांति।

अन्ना हजारे का संघर्ष सत्ता परिवर्तन के लिए नहीं व्यवस्था परिवर्तन के लिए है। वह संघर्ष जिसमें सोते को जगाने की व्यवस्था है। वह संघर्ष जिसमें भ्रष्टाचारियों को जेल में भेजने की व्यवस्था है। फिर चाहे वह कितना भी ताकतवर क्यों न हो। वह संघर्ष जिसमें बेचैन को सही दिशा दिखाने की व्यवस्था है। वह संघर्ष जिसमें अधिसंख्य जनता को यह एहसास कराने की व्यवस्था है कि तुम्हारे लिए भी खुले हैं स्कूल, कॉलेज, अस्पताल। तुम्हारे लिए भी हैं विज्ञान के चमत्कार। भूख मिटाना, जनसंख्या बढ़ाना और सो जाना सिर्फ यही नहीं है तुम्हारी दुनियाँ। तुम भी आदमी हो। तुम भी इस देश के नागरिक हो। तुम्हारे लिए भी आई थी आजादी। तुम भी हो आजादी के हिस्सेदार।

देखना यह है कि कितना गड़बड़ाया है व्यवस्था का संतुलन ! कितनी जगी है अधिसंख्य की भूख ! कब होता है व्यवस्था परिवर्तन ! चाहे जो हो, चाहे जब हो लेकिन एक बात तो आइने की तरह साफ होती जा रही है कि यह परिवर्तन होकर रहेगा। आगे चलकर राजनैतिक दलों में परिवर्तन का श्रेय लेने की होड़ लग जाय तो भी कोई आश्चर्य नहीं होगा। अभी तो जनता के हाथों में सत्ता के लिए सोसाइट नोट बनकर फड़फड़ा रहा है जन लोकपाल बिल।

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19 thoughts on “व्यवस्था परिवर्तन

  1. @देखना यह है कि कितना गड़बड़ाया है व्यवस्था का संतुलन ! कितनी जगी है अधिसंख्य की भूख ! कब होता है व्यवस्था परिवर्तन ! चाहे जो हो, चाहे जब हो लेकिन एक बात तो आइने की तरह साफ होती जा रही है कि यह परिवर्तन होकर रहेगा। ..एकदम सही कह रहे हैं,सामयिक और अच्छी पोस्ट,,आभार.आपको कृष्ण जन्माष्टमी पर्व की शुभकामनायें और बधाइयाँ.

  2. जागे हुवे सोये हैं या सोते में जागते का नाटक कर रहे हैं … पर ये सरकार जरूर कोई खेल रही है जबकि ये व्यवस्था परिवर्तन है न की सरकार परिवर्तन .. कृष्ण जन्माष्टमी की शुभकामनाएं …

  3. इन सोये हुए लोंगों को जगाना भी एक मुश्किल काम है | बैचैन लोगों के बारे में एक बैचैन ही ज्यादा अच्छा जान सकता है 🙂

  4. नया क़ानून तो अवश्य आएगा,इसमे कोई शंका नहीं है. इससे भ्रस्टाचार में कमी आये तो स्वागत योग्य है.

  5. इस संघर्ष का सबसे साकारात्मक पक्ष यही है कि जो सोये थे वे भी जग गये हैं।… और कईयों की तो नींद ही हराम हो गई है …।कम से कम मतदाताओं को अहसास हुआ है कि वे सेवकों को चुनते हैं, मालिकों को नहीं।

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