जीने की कला

वह
एक पंथ
दो काज करता है
कल के लिए
आज मरता है

डरते-डरते हँसता
हँसते-हँसते रोता है
पाने की कोशिश में
खुद को भी खोता है

मार्निंग वॉक के समय
तोड़ लाता है
सार्वजनिक उद्यान से
पूजा के लिए फूल

अखबार पढ़ते-पढ़ते
पी लेता है चाय

नहाते वक्त
गा लेता है गीत

पूजा के समय
दे देता है
पूरे घर को उपदेश

खाते-खाते
देख लेता है टी0वी0

मोटर साइकिल चलाते-चलाते
कर लेता है
जरूरी काम की बातें

दफ्तर में काम करते-करते
कर लेता है
क्रिकेट, राजनीति, मौसम या फिर
देश के हालात पर चर्चा

कम्प्युटर में
सुनता है म्युजिक
करता है चैट
देखता है ब्लॉग
और….
थककर सोते समय़
कर लेता है
रिश्तों की चिंता

सभी कहते हैं
वह बहुत ‘स्मार्ट’ है !
क्या जीने का
यही ‘आर्ट’ है ?

…………………………………..

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41 thoughts on “जीने की कला

  1. वर्तमान में मानव के जीवन को देखें तो यही कुछ उसके जीवन का हिस्सा है …..उसका दिमाग एक दिशा में नहीं बल्कि कई दिशाओं में कार्य करता है ….आपका आभार

  2. क्या बात है! क्या बात है! मजे आ गये सबेरे-सबेरे! :)एक कविता में हम लिखे थे:ये दुनिया बड़ी तेज चलती हैबस जीने के खातिर मरती हैपता नहीं कहां पहुंचेगीवहां पहुंचकर क्या कर लेगी। 🙂

  3. भइया, ई तौ जद्दोजहद रहतै है! बाहर औ भीतर कै अस संबाद संबेदनसील मनई कीनै करत है। अंतिम मा ‘ब्लोग’ संदर्भ जोड़ि के हमैं लाग कि आप आप बीती कहिन जैसे! सुंदर !

  4. कम्प्युटर मेंसुनता है म्युजिककरता है चैटदेखता है ब्लॉगऔर….थककर सोते समय़कर लेता हैरिश्तों की चिंतासभी कहते हैंवह बहुत 'स्मार्ट' है !क्या जीने कायही 'आर्ट' है ?sarthak kataksh

  5. @अमरेन्द्र भाई..न फूल तोड़त हैं न पूजा करत हैं बकिया आप बीती मानही लें तो कौनो हरज नाहीं । अवधी, तुलसी बाबा के परेम में परसाद जस रचिके मिलीगा..अब आप सिखाई दें तS हमहूँ जानकार कहाउब एहमा कौनो संदेह नाहीं हमका।

  6. सुन्दर रचना,सबकी बीती यही है.मगर ये जीने की कला तो नहीं.होना तो यह चाहिए कि हम, एक काम इस तरह करें कि उसमे पूरा डूब जाएँ.

  7. एक आम आदमी के जीवन की यही कहानी है । यही है उसकी आर्ट ऑफ़ लिविंग । इसी मस्ती me जिंदगी कट जाती है । बढ़िया लिखा है भाई ।

  8. दफ्तर में काम करते-करतेकर लेता हैक्रिकेट, राजनीति, मौसम या फिरदेश के हालात पर चर्चाकम्प्युटर मेंसुनता है म्युजिककरता है चैटदेखता है ब्लॉगक्या बात है…बहुत खूब…दफ्तर में इतना समय जो निकाल लेते हैं …वरना जीने की ये कला सब के नसीब में कहां….इस भावपूर्ण कविता के लिए हार्दिक बधाई।

  9. बहुत सुन्दर लिखा है आपने ! गहरे भाव और अभिव्यक्ति के साथ ज़बरदस्त प्रस्तुती!

  10. पांडे जी!जगबीती है ये तो.. एक पंथ के अलग अलग मुसाफिर साथ हो लिए.. एक ही ऑफिस के लिए, एक जगह से तीन गाड़ियों में बैठकर ऑफिस क्यों जाना.. एक गाड़ी में तीन लोग बैठकर जाएँ!!अच्छा ओब्ज़र्वेशन है आपका, हमेशा की तरह!!

  11. देव बाबु आज के 'स्मार्ट' आदमी की पूरी कलई खोल दी है……….अजी इंसान बचे ही कहाँ है अब जो थोड़े बहुत है वो भी नए युग से जूझ रहे हैं……..ये 'स्मार्ट' तो मशीने हैं…..होड़ ये है कौन ज्यादा 'स्मार्ट' है|हैट्स ऑफ आपको इस पोस्ट के लिए|

  12. मेरी तेरी हम सबकी रोजमर्रा की बात .काव्यात्मक अंदाज़ ,अल्फाजों की परवाज़

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  15. @@क्या जीने कायही 'आर्ट' है ?..वाह भैया वाह.गजब का दर्शन दे दिए हैं आप.सुंदर लेखनी,हम देर से आके पछता रहे हैं,बहुत आभार.

  16. रोज जीता हुआ रोज मरता हुआ अपनी ही लाश का खुद मजार आदमी आप कहत बानी इ हई स्मार्ट…………………………..आदमी तो स्मार्ट आदमी 😦 😦 😦 😦

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