क्या बतलाएँ बापू तुमको दाने कहाँ गये…!

उड़ गए पंछी, सो गए हम 
हमको है लुटने का गम
क्या बतलाएँ बापू तुमको दाने कहाँ गये !
जब उजले पंछी आए थे
हम उनसे टकराए थे
थे ताकतवर, नरभक्षी थे
पर हमने दूर भगाए थे
जान लड़ाने वाले वे दिवाने कहाँ गये !
क्या बतलाएँ बापू तुमको दाने कहाँ गये !
गैरों से तो जीते हम
अपनो से ही हारे हम
कैसे-कैसे सपने देखे
नींद खुली आँखें थीं नम
बजुके पूछ रहे खेतों के दाने कहाँ गये !
क्या बतलाएँ बापू तुमको दाने कहाँ गये !
भुना रहे हैं एक रूपैय्या 
जाने कैसे तीन अठन्नी
पैर पकड़ कर हाथ मांगते
अब भी अपनी एक चवन्नी
मुठ्ठी वाले हाथ सभी ना जाने कहाँ गये !
क्या बतलाएँ बापू तुमको दाने कहाँ गये !
तुलसी के पौधे बोए थे
दोहे कबीर के गाए थे
सत्य अहिंसा के परचम
जग में हमने फहराये थे
नैतिकता के वे ऊँचे पैमाने कहाँ गये !
क्या बतलाएँ बापू तुमको दाने कहाँ गये !
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34 thoughts on “क्या बतलाएँ बापू तुमको दाने कहाँ गये…!

  1. दाने अगर खेत में जाते तो और दाने पैदा होते, दाने अगर देश में ही रहते तो देश की उन्नति में काम आते पर दाने तो स्विस बैंकों मे चले गये अब बताईये क्या किया जाये?रामराम.

  2. तुलसी के पौधे बोए थेदोहे कबीर के गाए थेसत्य अहिंसा के परचमजग में हमने फहराये थेनैतिकता के वे ऊँचे पैमाने कहाँ गये !क्या बतलाएँ बापू तुमको दाने कहाँ गये !Bahut,bahut sashakt rachana!

  3. गैरों से तो जीते हमअपनो से ही हारे हमकैसे-कैसे सपने देखेनींद खुली आँखें थीं नमसत्य कथन ।सुन्दर भावपूर्ण रचना ।

  4. गैरों से तो जीते हमअपनो से ही हारे हमकैसे-कैसे सपने देखेनींद खुली आँखें थीं नमबजुके पूछ रहे खेतों के दाने कहाँ गये !क्या बतलाएँ बापू तुमको दाने कहाँ गये !सच कहा आपने गांधी जयंती के उपलक्ष पर सटीक एवं सुंदर अभिवक्ती समय मिले तो कभी आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका स्वागत है http://mhare-anubhav.blogspot.com/

  5. सच !तभी तो कोई एक अकेला शहर में कोई आबो दाना ढूंढता है और अब मिलता नहीं !

  6. बेहतरीन प्रस्‍तुति….मौजूदा दौर की कुव्‍यवस्‍था का चित्रण। आज गांधी जी होते तो शायद वो भी रो देते….

  7. बाज़ारवाद और वैश्वीकरण ने लील लिया है। कविता के बिम्ब और प्रतीकों के प्रयोग ने कविता में एक नई चेतना प्रस्तुत की है। आभार इस उत्कृष्ट प्रवृष्टि के लिए।

  8. गैरों से तो जीते हमअपनो से ही हारे हमकैसे-कैसे सपने देखेनींद खुली आँखें थीं नमhbut acha.

  9. तुलसी के पौधे बोए थेदोहे कबीर के गाए थेसत्य अहिंसा के परचमजग में हमने फहराये थेनैतिकता के वे ऊँचे पैमाने कहाँ गये !क्या बतलाएँ बापू तुमको दाने कहाँ गये !बहुत खूबसूरत प्रस्तुति. आभार.

  10. तुलसी के पौधे बोए थेदोहे कबीर के गाए थेसत्य अहिंसा के परचमजग में हमने फहराये थेनैतिकता के वे ऊँचे पैमाने कहाँ गये !क्या बतलाएँ बापू तुमको दाने कहाँ गये !बहुत सशक्त प्रस्तुति। लाजवाब….आपकी लेखनी को नमन…

  11. सशक्‍त और बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति| धन्यवाद|….बापू और शास्त्री जी को सादर नमन…

  12. बहुत सुन्दर रचना लिखा है आपने! बापू जी को मेरा शत शत नमन! बेहतरीन प्रस्तुती!आपको दुर्गा पूजा की हार्दिक बधाइयाँ एवं शुभकामनायें!मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-http://seawave-babli.blogspot.com/http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/

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