अरे…! यह तो मुझसे भी बेचैन है…!!


कल मनोज जैसवाल जी के ब्लॉग के माध्यम से एक विजेट लिया। यही जो दिख रहा है….दौड़ता हुआ आदमी। इसके बाद जब भी ब्लॉग खोलता, इसी दौड़ते हुए आदमी पर नज़र ठहर जाती। मुझे लगा यह तो मुझसे भी बेचैन है..! आज सुबह इसी पर एक कविता लिख दिया। सुबह जल्दी में पोस्ट नहीं कर पाया तो अभी कर रहा हूँ। कविता का शीर्षक है….दौड़। बताइये न कैसी है..?

दौड़
दौड़ नशे मेंदौड़
और छलक के दौड़।
जब तक तन मेंसाँस है
जब तक मन मेंफाँस है
जब तक चौचक भूखहै
जब तक गहरीप्यास है
आँख मूंद के दौड़
और हचक के दौड़।
नहीं कभी थकनेवाला
नहीं कभी रूकनेवाला
और और ही कहताहै
और नहीं सुननेवाला
छोटी धरती छोड़
कम्प्यूटर मेंदौड़।
जिस दिन तू थकजायेगा
जिस दिन तू रूकजायेगा
सभी हंसेंगे तुझपर, तू
ठगा खड़ा रहजायेगा
राम नाम सत्य है
झूठ मूठ कीदौड़।

…………………

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37 thoughts on “अरे…! यह तो मुझसे भी बेचैन है…!!

  1. यह दौड़ता हुआ आदमी वास्तव में कहीं नहीं पहुँच रहा… एक ही जगह ठहरा हुआ है!! आज की दौड़ती दुनिया भी इसी आदमी की तरह है!

  2. दौड़ दौड़ तू दौड़ -न थकना कभी न रुकना कभी ……कविता ने तो बिलकुल माहौल को संगीन बना दिया नहीं तो इस जोकर को देख पहले तो हंसी आयी थी 🙂

  3. ये कैसी बेचैन आत्मा है कि पढने ही नही देता? मेहरवानी इसकी कि टिप्पणी बक्से पर नही कूद रहा है.:)बहुत सटीक रचना.रामराम.

  4. जीवन का दूसरा नाम ही दौड़ है जिसमें हर कोई बस्स दौड़े जा रहा है न मंज़िल का पता है न ज़िंदगी में कोई मक़ाम पाने की इच्छा में किसी तरह की कोई संतुष्टि उदेश्य है केवल अंधी दौड़ में भेद चाल की भांति केवल दौड़ …. बढ़िया प्रस्तुति समय मिले तो कभी आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका स्वागत है http://mhare-anubhav.blogspot.com/

  5. बढिया। कोई दौडता है सडकों पर, पेट भरने के लिए और कोई दौडता है ट्रेडमिल पर, पेट कम करने के लिए…. पर दौड हर कोई रहा है इस दुनिया में…..

  6. @ दौड़ ,अकारथ ना हो /अयाचित ना हो /आंख मूंद कर ना हो , तो चलेगी !@ बेचैन ,पंडित जी इतना बेचैन होना एक खतरनाक स्थिति है 🙂

  7. बहुत जुलुम वाला काम कर रहे हैं इस इन्सान के साथ आप! बेचारा दौड़े चला जा रहा है बिना किसी प्रतिवाद के। आप तो इत्ते जालिम न थे जी। 🙂

  8. वाह देव बाबू…..इस दौड़ में बहुत कुछ कह गए आप……..शानदार |मेरे ब्लॉग की नयी पोस्ट आपके ज़िक्र से रोशन है……जब भी फुर्सत मिले ज़रूर देखें|

  9. अंतिम सत्य वही है जो अंतिम पंक्तियों में आपने लिखा है। इस बेचैनी सो तो भला है कि राम नाम की दौड़ में शामिल हो जाएं!

  10. कल सोचा था कि यह दौडता हुआ आदमी शायद मेरे लैपटॉप से बाहर निकल जाएगा तो मैं कमेन्ट कर लूंगा.. आज भी देखा तो यह दौड ही रहा था.. एक अमूल्य सीख इस दौड़ते मानव के माध्यम से! पांडे जी आपकी बातें अनोखी होती हैं!!

  11. बहुत बढ़िया लिखा है आपने! लाजवाब प्रस्तुती!आपको एवं आपके परिवार को दशहरे की हार्दिक बधाइयाँ एवं शुभकामनायें !

  12. देवेन्द्र जी, रचना बहुत अच्छी है…बधाईवैसे ये दौड़ता हुआ आदमी कुछ ऐसा संदेश देता प्रतीत हो रहा है-रुक जाना नहीं तू कहीं हारकेकांटों पे चलके मिलेंगे साए बहार के

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