कैद हैं परिंदे

आज एक कविता और पोस्ट कर रहा हूँ। इस वादे के साथ कि अब कुछ दिन चैन से टिपटिपाउंगा। सुरिया जाता हूँ तो लिखने से खुद को रोक नहीं पाता। इसे पोस्ट करने की जल्दी इसलिए कि जब से  श्री अरविंद मिश्र जी की बेहतरीन पोस्ट मोनल से मुलाकात पढ़ी तभी से यह कविता बाहर आने के लिए छटपटा रही थी।  प्रस्तुत है कविता …

कैद हैं परिंदे


मीठी जितनी बोली
ज़ख्म उतने गहरे
कैद हैं परिंदे
जिनके पर सुनहरे
चाहते पकड़ना
किरणों की डोरउड़कर
सूरज की पालकीके
ये कहार ठहरे
झील से भी गहरी
हैं कफ़स कीनज़रें
तैरते हैं इनमें
आदमी के चेहरे
वे भी सिखा रहेहैं
गोपी कृष्ण कहना
जानते नहीं जो
प्रेम के ककहरे
आदमी से रहना
साथी जरा संभलके
ये जिनसे प्यारकरते
उनपे इनके पहरे।
……………………………..

( चित्र भी वहीं से उड़ा लिया )
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21 thoughts on “कैद हैं परिंदे

  1. अपने वादे के पक्के …सूरज की पालकी के ये कहार ठहरे …..वाह कितना सुन्दर इन्द्रधनुषी बिम्ब …..कविता बहुत मार्मिक और पूर्णता लिए है ..सोदेश्य भी ..झील शब्द बदल कर अगर पाताल या कर दिया जाय तो ? ….

  2. पक्षियों पर लिखा मुझे यूँ भी भाता है और आपकी कविता तो है भी बहुत सुंदर.सूरज की पालकी के ये कहार…. शब्द बहुत भले लगे.घुघूतीबासूती

  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!–यहाँ पर ब्रॉडबैंड की कोई केबिल खराब हो गई है इसलिए नेट की स्पीड बहत स्लो है।सुना है बैंगलौर से केबिल लेकर तकनीनिशियन आयेंगे तभी नेट सही चलेगा।तब तक जितने ब्लॉग खुलेंगे उन पर तो धीरे-धीरे जाऊँगा ही!

  4. शुरु के दो छन्द बहुत सुन्दर है……चाहते ….ये कहार ठहरे – अतिसुन्दर.इसके बाद मेरे विचार से येक और छन्द कफस लिए हुए आदमी का वर्णन करता हुआ होता तो और अछ्छा लगता.

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