उल्लू

शहर में
या गांव में
कहीं नहीं दिखे
उल्लू
बिन लक्ष्मी के
फीकी रहीदीपावली
इस बार की भी।
सोचा था
दिख जायेंगे
तो अनुरोधकरूँगा
ऐ भाई !
उतार दे न इसबार
लक्ष्मी को
मेरे द्वार !
शहरों में
बाजार दिखा
पैसा दिखा
कारें दिखीं
महंगे सामानो कोखरीदते / घर ले जाते लोग दिखे
रिक्शेवान दिखे
और दिखे
अपना दिन बेचनेको तैयार
चौराहे पर खड़े
असंख्य मजदूर।
गांवों में
जमीन दिखी
जमींदार दिखे
भूख दिखी
और दिखे 
मेहनती किसान
सर पर लादे
भारी बोझ
भागते बदहवास
बाजार की ओर ।
न जाने क्यों
दूर-दूर तक
कहीं नहीं दिखे
लेकिन हर बार
ऐसा लगा
कि मेरे आस पासही हैं
कई उल्लू !
जब से सुना हैकि
लोभी मनुष्य
तांत्रिकों केकहने पर
लक्ष्मी के लिए
काट लेते हैं
उल्लुओं की गरदन
मेरी नींद
उड़ी हुई है।
…………………………….

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43 thoughts on “उल्लू

  1. कशमकश और असमंजस से, जिन्दगी अपनी घिरी |ढूंढते देवेन्द्र पांडे , इक अदद उल्लू सिरी |हैं बद्दुआएं फलक पर, दो चार मिलती फिरी |बाजार में कबिरा सिखाये, क्वालिटी कितनी गिरी | आपकी उत्कृष्ट पोस्ट का लिंक है क्या ??आइये –फिर आ जाइए -अपने विचारों से अवगत कराइए ||शुक्रवार चर्चा – मंचhttp://charchamanch.blogspot.com/

  2. ज्यादा बेचैन न हों, देवेन्द्र भाई! उल्लू अमर है, अमर रहेगा। उल्लू की गर्दन काटने से उल्लू प्रजाति को नष्ट नहीं किया जा सकता…क्योंकि गर्दन काटने वाला उल्लू और गर्दन कटवाने वाला उल्लू तो जीवित ही बचा रहता हैं!!

  3. सुंदर प्रस्‍त‍ुति। *दीवाली *गोवर्धनपूजा *भाईदूज *बधाइयां ! मंगलकामनाएं !ईश्वर ; आपको तथा आपके परिवारजनों को ,तथा मित्रों को ढेर सारी खुशियाँ दे. माता लक्ष्मी , आपको धन-धान्य से खुश रखे .यही मंगलकामना मैं और मेरा परिवार आपके लिए करता है!!

  4. गज़ब का लिखा है देवेन्द्र भाई। नींद तो हर उस आदमी की उड़ी हुई है जिसमें संवेदनायें बची हैं।

  5. मनुष्य जितना आगे जा रहा है उतना पीछे भी जा रहा है … ये त्रासदी है इंसान का पागलपन बड़ता जा रहा है … प्रभावी रहना है …

  6. संगीता जी कि बात से सहमत हूँ कई सारी बातें कहती हुई और उन बातों पर विचार करने को मजबूर करती हुई रचना …बहुत बढ़िया समय मिले कभी तो आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका स्वागत है http://mhare-anubhav.blogspot.com/2011/10/blog-post_27.html

  7. पते की बात..वो भी दूर की कही है.. टोना-टोटका में अगला बलि कौन होता है उसकी योजना भी बन गयी होगी..

  8. आपको एक भी न दिखे पक्षी वाले ,यहाँ तो बस बस मनुष्य रूपी उल्लूओं की भरमार है!

  9. देवेन्द्र जी,मेरे पोस्ट पर आने तथा हौसला बढाने के लिए आभार,….सुंदर प्रस्तुती अच्छी रचना…बधाई …

  10. असली उलूक भोपाली मुद्रा बनाए छुट्टे घूम रहें हैं बगल में मंद बुद्धि बालक दबाए मम्मीजी को सर नवाए .

  11. उल्लू को काट डालते है लोग तान्त्रिक के कहने पर जानकर दुख हुआ,मगर इस दुनिया मे क्या नही होता !तान्त्रिक के कहने पर लोग इन्सानी बच्चे तक की बलि दे देते है.कविता अछ्छी लगी,मगर ये बात कि लछ्मी उल्लु पे वैठ आती है,कुछ जमता नहीं.जहा लछ्मी पूजा नही होती वही के लोग ज्यादे अमीर है.

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