मध्यम वर्गीय चरित्र

पिछले सप्ताह वाराणसी में पुस्तक मेला लगा था। मैं उस दिन गया जब वहाँढेर सारे उल्लू जमा थे। मेरा मतलब उस दिन उलूक महोत्सव भी था। कार्तिक मास मेंबनारस में यह घटना भी होती है । दूर-दूर के बड़े-बड़े हास्य-व्यंग्य के कवि उल्लूकहलाने में गर्व महसूस करते हैं। धूम धाम से उलूक महोत्सव मनाया जाता है। मंच परवही कवि श्रेष्ठ माना जाता है जो अपने उल्लूपने से, शेष जमा हुए उल्लुओं को ठहाकालगाने पर मजबूर कर दे। मैने पुस्तकें भी खरीदी और कविताओं का आनंद भी लिया।कविताएँ उल्लुओं की जमात में बैठकर सुनते वक्त तो अच्छी लगी होंगी तभी मैं भी हंसरहा था लेकिन इतनी अच्छी भी नहीं थीं कि अब तक याद रहें और टेप कर के आपको सुनायींजायं। ऐसी कविताएं उल्लुओं की जमात में बैठकर सामूहिक रूप से सुनते वक्त ही अच्छीलगती हैं। आप हड़बड़ी में सरसरी तौर पर नज़र डालेंगे तो वाहियात लगेंगी सो मैने नतो टेप किया न उसे यहां लिखकर आपका कीमती वक्त जाया करना चाहता हूँ। यहाँ तो उसपुस्तक मेला से लाई हरिशंकर परसाई के एक व्यंग्य संग्रह प्रेमचंद्र के फटे जूते सेएक छोटी सी व्यंग्य कथा पढ़ाना चाहता हूँ जिसे पढ़कर मैं सोचता हूँ कि परसाई जी जोलिख कर चले गये उसके सामने हम आज भी कितने बौने हैं ! न पढ़ी हो तो पढ़ हीलीजिए परसाई जी की यह छोटी सी व्यंग्य कथा जिसका शीर्षक है…एक मध्यम वर्गीयकुत्ता।
मध्यम वर्गीय कुत्ता
मेरे मित्र की कार बँगले में घुसी तो उतरते हुए मैने पूछा, इनके यहाँ कुत्ता तो नहींहै?”

मित्र ने कहा, तुम कुत्ते से बहुत डरते हो!”

मैने कहा, आदमी की शक्ल में कुत्ते से नहीं डरता। उनसे निपट लेता हूँ। पर सच्चेकुत्तों से बहुत डरता हूँ।

कुत्तेवाले घर मुझे अच्छे नहीं लगते। वहाँ जाओ तो मेजबान के पहलेकुत्ता भौंककर स्वागत करता है। अपने स्नेही से नमस्ते हुई ही नहीं कि कुत्तेने गाली दे दी-क्यों आया बे ? तेरेबाप का घर है ? भाग यहाँ से !”

फिर कुत्ते के काटने का डर नहीं लगता-चार बार काट ले। डर लगता है उनचौदह बड़े-बड़े इंजेक्शनों का जो डाक्टर पेट में घुसेड़ता है। यूँ कुछ आदमी कुत्तेसे अधिक जहरीले होते हैं। एक परिचित को कुत्ते ने काट लिया था। मैने कहा, इन्हें कुछ नहीं होगा।हालचाल उस कुत्ते के देखो और इंजेक्शन उसे लगाओ।

एक नये परिचित ने मुझे घर पर चाय के लिए बुलाया। मैं उनके बंगले परपहुँचा तो फाटक पर एक तख्ती टँगी दिखी-कुत्ते से सावधान!’ मैं फौरन लौटगया। कुछ दिनो बाद वे मिले तो शिकायत की, आप उस दिन चायपीने नहीं आये!” मैने कहा, माफ करें। मैं बंगले तक गया था।वहाँ तख्ती लटकी थी-कुत्ते से सावधान। मेरा खयाल था, उस बंगले में आदमी रहते हैं। पर नेमप्लेट कुत्ते की टँगीदीखी।

यूँ कोई-कोई आदमी कुत्ते से बदतर होता है। मार्क ट्वेन ने लिखा है-यदि आप भूखे मरते कुत्तेको रोटी खिला दें, तो वह आपको नहीं काटेगा। कुत्ते में और आदमी में यही मूल अंतरहै।

बँगले मे हमारे स्नेही थे। हमें वहाँ तीन चार दिन ठहरना था। मेरेमित्र ने घंटी बजायी तो जाली के अंदर से वही भौं-भौं की आवाज आयी।  मैं दो कदम पीछे हट गया। हमारे मेजबान आये।कुत्तों को डाँटा-टाइगर, टाइगर ! उनका मतलब था-शेर, ये लोग कोई चोर डाकू नहीं हैं। तू इतना वफादार मत बन।

कुत्ता जंजीर से बंधा था। उसने देख भी लिया था कि हमें उसके मालिक खुदभीतर ले जा रहे हैं पर वह भौंके जा रहा था। मैं उससे काफी दूर से लगभग दौड़ता हुआभीतर गया।

मैं समझा, यह उच्चवर्गीय कुत्ता है। लगता ऐसा ही है। मैं उच्चवर्गीयका बड़ा अदब करता हूँ। चाहे वह कुत्ता ही क्यों न हो। उस बंगले में मेरी अजबस्थिति थी। मैं हीन भावना से ग्रस्त था-इसी अहाते में एक उच्चवर्गीय कुत्ता और इसीमें मैं ! वह मुझे हीकारत की नजर सेदेखता।

शाम को हम लोग लॉन में बैठे थे। नौकर कुत्ते को अहाते में घुमा रहाथा। मैने देखा, फाटक पर आकर दो सड़किया आवारा कुत्ते खड़े हो गये। वे आते और इसकुत्ते को बड़े गौर से देखते। फिर यहाँ-वहाँ घूमकर लौट आते और इस कुत्ते को देखतेरहते। पर यह बंगलेवाला उन पर भौंकता था। वे सहम जाते और यहाँ-वहाँ हो जाते। पर फिरआकर इस कुत्ते को देखने लगते।

मेजबान ने कहा, यह हमेशा का सिलसिला है। जब भी यह अपना कुत्ता बाहर जाता है, वे दोनोकुत्ते इसे देखते रहते हैं।

मैने कहा, पर इसे इन पर भौंकना नहीं चाहिए। यह पट्टे और जंजीरवाला है। सुविधाभोगीहै। वे कुत्ते भुखमरे और आवारा हैं। इसकी और उनकी बराबरी नहीं है। फिर यह क्योंचुनौती देता है!”

रात को हम बाहर ही सोये। जंजीर से बंधा कुत्ता भी पास ही अपने तखत परसो रहा था। अब हुआ यह कि आसपास जब भी वे कुत्ते भौंकते, यह कुत्ता भी भौंकता। आखिरयह उनके साथ क्यों भौंकता है ? यह तो उन पर भौंकता है। जब वे मुहल्ले में भौंकते हैं तो यह भी उनकी आवाजमें आवाज मिलाने लगता है, जैसे उन्हें आश्वासन देता हो कि मैं यहाँ हूँ, तुम्हारेसाथ हूँ।

मुझे इसके वर्ग पर शक होने लगा है। यह उच्चवर्गीय नहीं है। मेरे पड़ोसमें ही एक साहब के पास थे दो कुत्ते। उनका रोब ही निराला ! मैने उन्हें कभी भौंकतेनहीं सुना। आसपास कुत्ते भौंकते रहते, पर वे ध्यान नहीं देते थे। लोग निकलते, परवे झपटते नहीं थे। कभी मैने उनकी एक धीमी गुर्राहट ही सुनी होगी। वे बैठे रहते याघूमते रहते। फाटक खुला होता, तो भी बाहर नहीं निकलते थे। बड़े रोबीले, अहंकारी औरआत्मतुष्ट।

यह कुत्ता उन सर्वहारा कुत्तों पर भौंकता भी है और उनकी आवाज में आवाजभी मिलाता है। कहता है-मैं तुममें शामिल हूँ। उच्चवर्गीय झूठा रोब भी और संकट केआभास पर सर्वहारा के साथ भी-यह चरित्र है इस कुत्ते का। यह मध्यम वर्गीय चरित्रहै। यह मध्यम वर्गीय कुत्ता है। उच्चवर्गीय होने का ढोंग भी करता है और सर्वहाराके साथ मिलकर भौंकता भी है।

तीसरे दिन रात को हम लौटे तो देखा, कुत्ता त्रस्त पड़ा है। हमारी आहटपर वह भौंका नहीं. थोड़ा सा मरी आवाज में गुर्राया। आसपास वे आवारा कुत्ते भौंकरहे थे, पर यह उनके साथ भौंका नहीं। थोड़ा गुर्राया और फिर निढाल पड़ गया।

मैने मेजबान से कहा, आज तुम्हारा कुत्ता बहुत शान्त है।

मेजबान ने बताया, आज यह बुरी हालत में है। हुआ यह कि नौकर की गफलत के कारण यह फाटक के बाहरनिकल गया। वे दोनो कुत्ते तो घात में थे ही। दोनो ने इसे घेर लिया। इसे रगेदा।दोनो इस पर चढ़ बैठे। इसे काटा। हालत खराब हो गयी। नौकर इसे बचाकर लाया। तभी से यहसुस्त पड़ा है और घाव सहला रहा है। डॉक्टर श्रीवास्तव से कल इसे इंजेक्शनदिलाउँगा।

मैने कुत्ते की तरफ देखा। दीन भाव से पड़ा था। मैने अन्दाज लगाया। हुआयों होगा-

यह अकड़ से फाटक के बाहर निकला होगा। उन कुत्तों पर भौंका होगा। उनकुत्तों ने कहा होगा -‘अबे, अपना वर्ग नहीं पहचानता। ढोंग रचता है। यो पट्टा और जंजीर लगाये है।मुफ्त का खाता है। लॉन पर टहलता है। हमें ठसक दिखाता है। पर रात को जब किसी आसन्नसंकट पर हम भौंकते हैं, तो तू भी हमारे साथ हो जाता है। संकट में हमारे साथ है,मगर यों हम पर भौंकेगा। हममें से है तो निकल बाहर। छोड़ यह पट्टा और जंजीर। छोड़आराम। घूरे पर पड़ा अन्न खा या चुराकर रोटी खा। धूल में लोट।

यह फिर भौंका होगा। इस पर वे कुत्ते झपटे होंगे। यह कहकर – अच्छा ढोंगी, दगाबाज, अभीतेरे झूठे वर्ग का अंहकार नष्ट किये देते हैं।

इसे रगेदा, पटका, काटा और धूल खिलायी।

कुत्ता चुपचाप पड़ा अपने सही वर्ग के बारे में चिन्तन कर रहा है।

………………………………………………………………. 
Advertisements

33 thoughts on “मध्यम वर्गीय चरित्र

  1. परसाई जी का जवाब नहीं!…आपका क्लासिकल व्यंग्य पढ़वाने के लिए आभार!! कृपया कुत्ते को चिंतन करने दें…

  2. कुत्ते (कुतिया भी शामिल मन जाय) जितना लेखकों के प्रिय रहे हैं उतना ही ब्लागरों के भी !ये बेचारे खुद तो निशाना बनते हैं और इसका फायदा हम मानुषों को होता है !ब्लॉग की सफाई मुबारक !

  3. बहुत सुन्दर व्यंग है,बडे लोगो के बडे चम्चो के लिए.मगर आपने स्केनिंग किया या खुद टाईप किया ? अगर खुद टाईप किया तो बहुत मेहनत किया है आपने,धन्यवाद.

  4. क्‍या व्‍यंग्‍य है? कितनी बाते कह दी हैं। यह भी सच है कि उच्‍च वर्ग के कुत्ते भौंकते नहीं है। मैंने अमेरिका के कुत्ते देखे, वे भौंकते ही नहीं है। अब समझ में आया कि वे उच्‍च वर्ग के हैं। इतना उच्‍च स्‍तरीय व्‍यंग्‍य पढ़वाने के लिए आपका आभार।

  5. मज़ेदार कहानी ।एक बार आदमी और कुत्ते में बहस हो गई कहींकुत्ता बोला –कभी मैं भी इन्सान था , मगर तेरी तरह कुत्ता नहीं ।

  6. मैं बहुत डरते डरते कमेन्ट कर रहा हूँ -इसे कुत्ता पोस्ट कहूं या कुत्ती पोस्ट ! जब कोई श्वान पोस्ट आती है मेरी घबराहट बढ़ जाती हैं ..और अनूप जी तुरंत मेरी घबराहट ताड़ लेते हैं ..इन दिनों दिख नहीं रहे कहीं ..उन्हें और गिरिजेश जी को जबरिया यह लिंक भेजिए दीजिये मेरी और से साभार !तो यह उलूक महोत्सव के उपलक्ष्य में हुयी समझिये !

  7. पुस्तक, उल्लू से डॉक्टर और कुत्ते तक पहुंचता आलेख पसंद आया. परसाई जी का व्यंग्य तो यथार्थ है ही, इंसान व कुत्ते के बारे में मार्क ट्वेन का कथन भी प्रासंगिक है.

  8. बहुत ही मज़ेदार लगा! शानदार और ज़बरदस्त व्यंग्य! लाजवाब प्रस्तुती!

  9. पांडे जी!! मेले वेले की तो नहीं जानता..लेकिन परसाई जी की कुछ किताबें मैंने फ्लिप्कार्ट से मंगवाई हैं और उन्हीं में से एक पुस्तक में मिली यह रचना.. घटिया और फूहड़ व्यंग्य देखकर ऊब चुका था.. सोचा परसाई जी और शरद जोशी को पढूं.. और यकीन मानिए एक ठंडी हवा का झोंका हैं ये लोग…नमन है उन्हें!!

  10. परसाईं जी तो फिर परसाईं जी थे .आज होते तो कृष्ण राधा को लिविंग इन रिलेशन का सूत्रधार बतलाते .बकौल उनके हनुमान पहले स्मगलर थे .तस्कर थे पूरा पहाड़ उठा लाये जब चेक पोस्ट पर टोका कहने लगे भाई अपने लक्ष्मण भैया को शक्ति लगी है और बस सीमा पार .

  11. ई कुत्तई भी बड़ी बेढब चीज है जो अब तक अपना जलवा कायम किये हुए है! कुत्तों के बहाने इस अनवरत विमर्श से बेचारे उन कुत्तों पर क्या बीतती होगी?

  12. मध्य वर्ग का हूं, सो सह लेता हूं इस व्यंग को। मध्यवर्ग का मनई जहां वश न चले, वहां सहने के मोड में जल्दी/सहजता से आ जाता है।

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s