चुहल ही चुहल में…

अलसुबह
घने कोहरे में
सड़क की दूसरी पटरी से आती
सिर्फ सलवार-सूट में घूम रही कोमलांगना को देख
मेरे सर पर बंधा मफलर
गले में
साँप की तरह
लहराने लगा !

वह ठंड को
अंगूठा दिखा रही थी
और मैं
आँखें फाड़
उँगलियाँ चबा रहा था।
…………………………..

चुहल ही चुहल में ये पंक्तियाँ बन गईं। कल कमेंट बॉक्स बंद होने से कुछ साथी नाराज थे कि हमें भी चुहल का अवसर क्यों नहीं दिया ? आज खोले दे रहा हूँ। कर लीजिए जो कर सकते हैं..!

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38 thoughts on “चुहल ही चुहल में…

  1. भाई,जब आप अंतरजाल में हो,सरे-आम हो,तो चुहल करने का अधिकार सीमित क्यों हो ?मेरी भी यही शिकायत थी कि हमें क्यों नहीं चुहल करने दिया जा रहा ?अब चुहलबाजी बाद में…!

  2. जैसे स्विस आल्प्स की बर्फीली वादियों में हिंदी फिल्म की हिरोइन –आधे कपड़ों में और हीरो पूरा ढका हुआ . क्या खाका खींचा है भाई . अच्छा किया कमेंट्स ऑप्शन खोल दिया . वर्ना ऐसा लग रहा था जैसे जल बिन मछली .

  3. गरम आँसू और ठंडी आहें मन में क्या-क्या मौसम हैं इस बगिया के भेद न खोलो, सैर करो खामोश रहो(इब्ने इंशा)

  4. उम्र मेरी जो रही हो पर सुबह को ताड़ कर देखता हूं उस बला को अपने दीदे फाड़ कर :)यूं घना कोहरा मुझे कुछ भी नज़र आता नहीं तौबा उसकी बेहिजाबी हुस्न छुप पाता नहीं :)जिस्म मेरा बे-हरारत गर्म कपड़ों पे यकीन वो गज़ब की खूबसूरत और कपड़े हैं महीन :)सैर को निकला तो हूं पर सैर उसके जिस्म की फ़िक्र-ए-सेहत जान लीजे है अलग ही किस्म की:)टिप्पणीकारों को क्या जलते हैं तो जलते रहें हम तो तापेंगे देविंदर हाथ वो मलते रहें 🙂

  5. देवेन्द्र भाई!जब बिना देखे उन्होंने ताड़ ली युवती हसीन,यह भी कह डाला कि उसने कपडे पहने थे महीन.एक्स-रे सी नज़रें पाईं हैं अली साहब ने वाह,ताड़ ली एम्.पी.से लड़की, और बनारस में थी आह.आप तो 'सो स्वीट' कहते रह गए थे देखकर,वे कहें नमकीन है, नमकीन है ओ बेखबर!!पांडे जी, अपना पहला कमेन्ट खारिज माना जाए और इसे दाखिल करें!!

  6. अली साब जहाँ पहुँचते ,वहीँ बहार आ जाती है,नदी उफनने लगती है,झील सूख-सी जाती है !कपडे उनके महीन हैं,जान इधर जाती है,वह बल खाके चलती है,ठण्ड सिकुड़ती जाती है !!अली साब और चला बिहारी ब्लॉगर बनने को न्योछावर !

  7. ये शेर देवेन्द्र जी के लिए खास तौर पे :)देखता हूं जो उसे ,'बेचैन' नज़रे गाड़ के दोस्तों ने छुपके मारा टिप्पणी की आड़ से 🙂

  8. देवेन्द्र भाई!आज तो सचमुच ब्लॉग नाम सार्थक कर डाला आपने.. झेलिये भाई:अब नहीं ताड़ेंगे लडकी,कनखियों की आड़ से,ताड़ भी ली, तो कभी कविता नहीं लिखेंगे हमलिख भी ली कविता,तो यारो ब्लॉग में देंगे नहींब्लॉग में छापी भी तो टिप्पणी खुली होगी नहीं हों अली सैयद,सलिल,संतोष, इनको झेलना मेरे बस का है नहीं खतरों से ऐसे खेलना!

  9. आप हैं इक नेक इंसां ताका कह के फंस गये वर्ना खांटी लोग कितने बनके मफलर डंस गये :)आपने रस्ते में ताका , कोई गुंजायश ना थी नंगे उनके घर घुसे और फिर वहीं पर बस गये :)आप घर की खिड़कियां खोले ,यही दरकार है शर्म उनको आये जिनकी टिप्पणियां व्यापार हैं 🙂

  10. मानसिक द्वन्द का अद्भुत चित्र खींचा है आपने……ठण्ड में यूँ मुस्कुराना मफलर के साथ …. वाह क्या विम्ब है बहुत ही विचारोत्तेजक कविता….

  11. ये तो अच्छा था कि आप मफलर लपेटे थे वरना आपको बुखार चढ जाता,..बढ़िया चुहल सुंदर पोस्ट,…मेरे नए पोस्ट में पढ़े …………..आज चली कुछ ऐसी बातें, बातों पर हो जाएँ बातें ममता मयी हैं माँ की बातें, शिक्षा देती गुरु की बातेंअच्छी और बुरी कुछ बातें, है गंभीर बहुत सी बातेंकभी कभी भरमाती बातें, है इतिहास बनाती बातेंयुगों युगों तक चलती बातें, कुछ होतीं हैं ऎसी बातें

  12. कुहरा हो या बर्फबारी चाँद को क्या फर्क पड़ता है उन्हें तो बिजलियाँ गिराने से है मतलब कपड़े कम हों या पूरे क्या फर्क पड़ता है. यह तो गनीमत है कि पांडे जी पूरे पहन के निकले वरना किसी के ख़ाक होने से किसी को क्या फर्क पड़ता है.

  13. प्रवीन पांडेजी की चुहल बहुत सटीक लगी.यहाँ पहाड़ों की ठंड में भी कुछ स्कूली लडकियां जब केवल फ्रॉक पहन,स्लैक्स बिना स्कूल जाती हैं तो वो गरीबी के कारण होता है.

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