ओ दिसंबर !

ओ दिसंबर !
जब से तुम आयेहो
नये वर्ष की, नईजनवरी
मेरे दिल में
उतर रही है।
ठंडी आई
शाल ओढ़कर
कोहरा आया
पलकों पर
छिम्मी आई
कांधे-कांधे
मूंगफली
मुठ्ठी भर-भर  
उतर रहे हैं लालतवे से
गरम परांठे
चढ़ी भगौने
मस्त खौलती
अदरक वाली चाय।
ओ दिसम्बर !
जब से तुम आये हो
उम्मीदों की ठंडीबोरसी
अंधियारे में
सुलग रही है।
लहर-बहर हो
लहक रही है
हर घर के दरवज्जेपर
ललचौहीं कुतिया
उम्मीद से है
जनेगी
पिल्ले अनगिन
चिचियाते-पिपियाते
घूमेंगे गली-गली
भौंकेंगे
कुछ कुत्ते
नये वर्ष को
आदत से लाचार ।
ओ दिसंबर !
जब से तुम आयेहो
गंठियाई मेरीरजाई
फिर धुनने को
मचल रही है।
भड़भूजे की लालकड़ाही
दहक रही है
फर फर फर फर
फूट रही है
छोटकी जुनरी
वक्त सरकता
धीरे-धीरे
चलनी-चलनी
काले बालू से
दुःख के पल   
झर झर झरते
ज्यों चमक रहीहो
श्यामलिया की
धवल दंतुरिया।
ओ दिसम्बर !
जब से तुम आयेहो
इठलाती नई चुनरिया
फिर सजने को
चहक रही है।
………………………….
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33 thoughts on “ओ दिसंबर !

  1. वाह दिसम्बर में ही नववर्ष की नूतनता =,एक नव विहान का उद्घोष कवि ने कर दिया! कवि तुम्हे भी मुबारक ….पिल्ले लल्ले और चिबिल्ले सब ! 🙂

  2. नयी शैली में एक बहुत सुन्दर कविता की रचना के लिए धन्यवाद,और बधाई.और और यैसी रचनाएँ आयें तो और मजा आयेगा.

  3. उम्मीदों की ठंडी बोरसी अंधियारे में सुलग रही है. देख-देख नंगों का नर्तन छाती में आग धधक रही है.मोतियाबिन्द हुआ बाबा को दादी की सांस उखड़ रही है.रे, निर्लज्ज दिसंबर ! तू क्यों इतना कोहरा लेकर चलता हैयूँ भी, उनकी कोहराई आँखें हैंलूट-लूट कर देश हमारा उनका घर पलता है

  4. भड़भूजे की कढ़ाई तक आते आते कविता परवान चढ़ गयी… दमक ही उठी! बहुत बढ़िया!!

  5. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल मंगलवार के चर्चा मंच पर भी की जा रही है! आपके ब्लॉग पर अधिक से अधिक पाठक पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

  6. आहि गया दिसंबर ॥मगर अफ़्स्स की यहाँ न ठेले की वो गरमा गरम मुगफलियाँ हैं और न ही गज़क रेओडी की मिट्टी स्वगात …. अगर कुछ है तो वो christmas की धूम चोरो और बस cake choclates ice-creams…इस रचना के माध्यम से बहुत ही बढ़िया स्वागत किया है आपने दिसंबर का समय मिले कभी तो आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका स्वागत है http://mhare-anubhav.blogspot.com/

  7. नए अंदाज की सुंदर रचना….बेहतरीन पोस्ट मेरी नई पोस्ट की चंद लाइनें पेश है….जहर इन्हीं का बोया है, प्रेम-भाव परिपाटी मेंघोल दिया बारूद इन्होने, हँसते गाते माटी में,मस्ती में बौराये नेता, चमचे लगे दलाली मेंरख छूरी जनता के,अफसर मस्ती के लाली में,पूरी रचना पढ़ने के लिए काव्यान्जलि मे click करे

  8. पांडे जी बहुत मनमोहक रचना ..प्रादेशिक शब्दों का बढिय प्रयोग किया है …..एक बात और मेरे पुत्र की एक wave side hai उसका नाम भी बैचेन नगरी है ..बहत कुछ आपके ब्लॉग से मिलता जुलता …आभार

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