छुट्टे पशुओं का आतंक।

आपके शहर में कितना है यह तो मैं नहीं जानता लेकिन बनारस में छुट्टे पशुओं का भंयकर आतंक है। नींद खुलते ही कानों में चिड़ियों की चहचहाहट नहीं बंदरों की चीख पुकार सुनाई पड़ती है। खिड़की से बाहर सर निकाले नहीं कि “खों…!” की जोरदार आवाज सुनकर ह्रदय दहल उठता हैं। आँख मलते हुए मुँह धोने के लिए उठे तब तक कोई बंदर कुछ खाने की चीज नहीं मिली तो आँगन से कूड़े का थैला ही उठाकर ‘खों खों’ करता छत पर चढ़कर चारों ओर कूड़ा बिखेरना प्रारंभ कर देता है। टाटा स्काई की छतरी टेढ़ी कर देना, फोन के तार उखाड़ कर फेंक देना या छत की मुंडेर की ईंट से ईंट बजा देना सामान्य बात है। कई बार तो बंदरों के द्वारा गिराई गई ईंट से गली से गुजर रहे राहगीर के सर भी दो टुकड़ों में विभक्त हो चुके हैं। मनुष्यों ने बंदरों का आहार छीना अब बंदर अपने आहार के चक्कर में आम मनुष्यों का जीना हराम कर रहे हैं। वे भी आखिर जांय तो जांय कहाँ? उनके वन, फलदार वृक्ष तो हमने जै बजरंग बली’ का नारा लगाकर पहले ही लूट लिया है। गर्मी के दिनों में इन बंदरों का जीना मुहाल हो जाता है और ये हमारा जीना मुहाल कर देते हैं। रात में या भरी दोपहरी में तो नहीं दिखाई पड़ते, कहीं छुपे पड़े रहते हैं लेकिन सुबह- शाम भोजन की तलाश में एक छत से दूसरी छत पर कूदते फांदते नजर आ ही जाते हैं। किशोर बच्चों के लिए इनका आना कौतुहल भरा होता है। ले बंदरवा लोय लोय के नारे लगाते ये बच्चे बंदरों को चिढ़ाते-फिरते हैं। बंदर भी बच्चों को खौंखिया कर दौड़ाते हैं। इसी बंदराहट को देखकर  बड़े बूढ़ों ने कहा होगा..बच्चे बंदर एक समान। मामला गंभीर हो जाने पर बच्चों के पिता श्री, लाठी लेकर बंदरों को भगाने दौड़ पड़ते हैं। एक बच्चा छत में गहरी नींद सो रहा है। कब भोर हुई उसको पता नहीं। घर के और सदस्य नीचे उतर चुके हैं। उसकी नींद दूसरे घरों की छतों पर होने वाली चीख पुकार सुनकर खुल जाती है। देखता है, उसी के छत की मुंडेर पर बंदरों का लम्बा काफिला पीछे की छत से एक-एक कर आता जा रहा है और सामने वाले की छत पर कूदता फांदता चला जा रहा है। काटो तो खून नहीं। डर के मारे घिघ्घी बंध जाती है। सांस रोके बंदरों के गुजरने की प्रतीक्षा करते हुए मन ही मन हनुमान चालिसा का पाठ करने लगता है...जै हनुमान ज्ञान गुन सागर, जै कपीस तिहुँ लोक उजागर… ! कपि के भय से कपि की आराधना करता बालक तब कपि समान उछल कर नीचे उतर जाता है जब उसे ज्ञान हो जाता है कि अब कपि सेना उसके घर से प्रस्थान कर चुकी है। नीचे उतर कर वह खुशी के मारे जोर से चीखता है..ले बंदरवा लोय लोय।


बंदर पुराण खत्म हुआ। आप नहा धोकर भोजनोपरांत घर से बाहर निकलने को हुए तब तक आपकी निगाह अपने बाइक पर गयी। गली का कुत्ता उसे खंभा समझ कर मुतार चुका है! अब आपके पास इतना समय नहीं है कि आप पाईप लगाकर गाड़ी धो धा कर उसपर चढ़ें। ‘मुदहूँ आँख कतो कछु नाहीं’ कहते हुए बिना किसी से कुछ शिकायत किये कुक्कुर को आशीर्वचन देते हुए घर से प्रस्थान करते हैं तभी पता चलता है कि आगे सड़क जाम है। पूछने पर पता चलता है कि सांड़ के धक्के से गिरकर एक आदमी  बीच सड़क पर बेहोश पड़ा है। माथे से खून बह रहा है। लोग उसे घेर कर खड़े सोंच रहे हैं कि जिंदा है/ उठाया जाय या मर चुका/ उठाना बेकार है। तब तक पुलिस आ जाती है और सड़क/भीड़ साफ होती है। बुदबुदाते हुए बाइक आगे बढ़ाता हूँ..रांड़, सांड़, सीढ़ी, सन्यासी, इनसे बचे तS सेवे काशी। 🙂


दफ्तर से लौटते वक्त बाइक जानबूझ कर धीमे चलाता हूँ। शाम के समय   दौडती भैंसों की लम्बी रेल से भी सड़क जाम हो जाती है। इनके धक्के से साईकिल सवार कुचले जाते हैं। इन पालतू पशुओं के अतिरिक्त छुट्टे सांड़ का आतंक बनारस में बहुतायत देखा जा सकता है।  न जाने कहाँ से कोई सांड़, गैया को दौड़ाते-दौड़ाते अपने ऊपर ही चढ़ जाय !  


ज्येष्ठ को दोपहरी में तपते-तपाते घर पहुँचे तो देखा, लड़का रोनी सूरत बनाये बैठा है! पूछने पर पता चला..साइकिल चलाकर स्कूल से घर आ रहा था कि रास्ते में गली के कुत्ते ने दौड़ा कर काट लिया। चलो भैया, लगाओ रैबीज का इंजेक्शन। अब पहले की तरह 14 इंजेक्शन नहीं लगाने पड़ते नहीं तो बेटा गये थे काम से। सरकारी अस्पताल में ट्राई करने पर सूई मिलने की कौन गारंटी? आनन-फानन में जाकर एक घंटे में मरहम पट्टी करा कर इंजेक्शन लगवाकर घर आये तो चाय पीन की इच्छा हुई। पता चला… दूध नहीं है। दूध बिल्ली जुठार गई! अब कौन पूछे की दूध बाहर क्यों रखा था? जब जानती हो कि बिल्ली छत से कूदकर आंगन में आ जाती है। यह पूछना, अपने भीतर नये पशु को जन्म देने के समान है।:) शाम को फिर से घंटा-आध घंटा के लिए बंदरों का वही आंतकी माहौल। जैसे तैसे नाश्ता पानी करके समाचार देखने के लिए टीवी खोला तो पता चला टीवी में सिगनल ही नहीं पकड़ रहा है। ओह! तो फिर बंदर ने टाटा स्काई की छतरी टेढ़ी कर दी!! भाड़ में जाय टीवी, नहीं चढ़ते छत पर। ब्लॉगिंग जिंदाबाद। देखें, ब्रॉडबैण्ड तो ठीक हालत में है। शुक्र है भगवान का। बंदरों ने फोन का तार नहीं तोड़ा।


खा पी कर गहरी नींद सोये ही थे कि रात में बिल्ली के रोने की आवाज को सुनकर नींद फिर उचट गई। आंय! यह बिल्ली फिर आ गई! दरवाजा तो बंद था! बिजली जलाई तो देखा दरवाजा खुला था। ओफ्फ! अब इसे भगाने की महाभारत करनी पड़ेगी। इस कमरे से भगाओ तो उस कमरे की चौकी के नीचे घुस जाती है। हर तरफ जाली लगी है सिवाय घर में प्रवेश करने वाले कमरे और आँगन में खुले छत के। उसके निकलने के लिए एक ही मार्ग बचा है। घर के सभी सदस्य रात में नींद से उठकर बिल्ली भगा रहे हैं!  मकान मालिक से कई बार कह चुका हूँ कि भैया इस पर भी जाली लगवा दो लेकिन वह भी बड़का आश्वासन गुरू निकला, “काल पक्का लग जाई…!”  बिल्ली जिस छत से घर के आँगन में कूदती है, वहीं से चढ़कर भाग नहीं सकती । इस कमरे से उस कमरे तक दौड़ती फिरेगी। फिर रास्ता न पा किसी के बिस्तर को गीला करते हुए, कहीं कोने बैठ म्याऊँ- म्याऊँ करके रोने लगेगी। बिल्ली न रोये, चुपचाप पड़ी रहे तो भी ठीक। कम से कम रात की नींद में खलल तो न होगी। लेकिन वह भी क्या करे? इस घर में तो दूध-चूहा कुछ  मिला नहीं। पेट तो भरा नहीं। दूसरे घर में नहीं तलाशेगी तो जीयेगी कैसे ?


विकट समस्या है। यह समस्या केवल अपनी नहीं है। आम शहरियों की समस्या है। किसी की थोड़ी किसी की अधिक। लाख जतन के बावजूद किसी न किसी समस्या से रोज दो चार होना ही पड़ता है। जरूरी नहीं कि एक ही दिन बंदर, बिल्ली, कुत्ते, सांड़ सभी आक्रमण कर दें लेकिन यह नहीं संभव है कि आप इनसे किसी दिन भी आतंकित होने से बच जांय। आंतक के साये में तो आपको जीना ही है। सावधान रहना ही है। सावधानी हटी, दुर्घटना घटी। मुझे याद है एक बार कई दिन जब फोन ठीक नहीं हुआ तो मैने बी एस एन एल दफ्तर में फोन किया। फोन किसी महिला ने उठाया। मैने उनसे पूछा, “मैडम! मेरे फोन का तार बंदर प्रायः हर महीने तोड़ देता है, इसका कोई परमानेंट इलाज नहीं हो सकता?” उन्होने तपाक से उत्तर दिया..“क्यों नहीं हो सकता? हो सकता है। एक काम कीजिए, आप एक लंगूर पाल लीजिए।” अब इतना बढ़िया आइडिया सरकारी दफ्तर से पाकर तबियत हरी हो गई। मैने सोचा कि इसी तर्ज पर क्यों न हम भी इस समस्या के परमानेंट इलाज के लिए नये-नये आईडियाज की तलाश करें। 


बहुत सोचने के बाद एक बात जो मेरी समझ में  अच्छे से आ गई कि हम लाख परेशान सही लेकिन हमारी परेशानियों के लिए इन जानवरों का कोई दोष नहीं। जिस किसी जीव ने धरती में जन्म लिया उसे भोजन तो चाहिए ही । अपनी भूख मिटाने के लिए श्रम करना कोई पाप तो है नहीं। अब यह आप को तय करना है कि आप इनसे कैसे बचते हैं? आपको छत में कूदते बंदर, गली में घूमते कुत्ते, बीच सड़क पर दौड़ते सांड़ नहीं चाहिए तो फिर इनके रहने और भोजन के लिए परमानेंट व्यवस्था तो करनी ही पड़गी। आखिर जानवरों को इस तरह दर दर इसीलिए भटकना पड़ रहा है क्योंकि आपने अपने स्वार्थ में इनके वन क्षेत्र को शहरी क्षेत्र में बदल दिया। अंधाधुंध जंगलों की कटाई की और खेती योग्य जमीन में कंकरीट के जंगल उगा दिये। क्यों न हम वृद्धाश्रम की तर्ज पर वानराश्रम, कुक्कुराश्रम, नंदी निवास गृह की स्थापना के बारे में शीघ्रता से अपनी सोच दृढ़ करें और सरकार से प्रार्थना करें कि इन जानवरों के रहने, खाने- पीने की समुचित व्यवस्था करें। भले से इसके लिए हमे अपनी आय का कुछ एकाध प्रतिशत टैक्स के रूप में सरकारी खजाने में जमा कराना पड़े। इस तरह हम सभ्य मानव कहलाकर शांति पूर्वक जीवन यापन कर सकते हैं। आप या तो इस आइडिया पर मुहर लगाइये या दूसरा बढ़िया आइडिया दीजिए ताकि हम कह सकें..“व्हाट एन आइडिया सर जी!”

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