पीपल

हम भटके
बेचैनी में
तुम
ठहरे
हातिमताई।

 

हम सहते
कितने लफड़े
तुमने
खड़े खड़े
बदले कपड़े !
मेहरबान तुम पर रहती
हरदम  ही
धरती माई।

 

ना जनम लिया ना फूँका तन
वैसे का वैसा ही मन
कर डाला
सुंदर तन
कहाँ से सीखी
चतुराई ?

 

बूढ़े हो
दद्दू से भी
दद्दू के दद्दू से भी
बच्चा बन
इठलाते हो
हमे पाठ पढ़ाते हो
अपनी चादर धोने में
हम ढोते
पूरा जीवन
खुद को निर्मल करने में
तुमको लगता
बस एक साल

 

सच बोलो !  
क्या पतझड़ में
नंगे होते
शरम नहीं आई ?
………………….

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