ओ दिसंबर !

ओ दिसंबर !
जब से तुम आयेहो
नये वर्ष की, नईजनवरी
मेरे दिल में
उतर रही है।
ठंडी आई
शाल ओढ़कर
कोहरा आया
पलकों पर
छिम्मी आई
कांधे-कांधे
मूंगफली
मुठ्ठी भर-भर  
उतर रहे हैं लालतवे से
गरम परांठे
चढ़ी भगौने
मस्त खौलती
अदरक वाली चाय।
ओ दिसम्बर !
जब से तुम आये हो
उम्मीदों की ठंडीबोरसी
अंधियारे में
सुलग रही है।
लहर-बहर हो
लहक रही है
हर घर के दरवज्जेपर
ललचौहीं कुतिया
उम्मीद से है
जनेगी
पिल्ले अनगिन
चिचियाते-पिपियाते
घूमेंगे गली-गली
भौंकेंगे
कुछ कुत्ते
नये वर्ष को
आदत से लाचार ।
ओ दिसंबर !
जब से तुम आयेहो
गंठियाई मेरीरजाई
फिर धुनने को
मचल रही है।
भड़भूजे की लालकड़ाही
दहक रही है
फर फर फर फर
फूट रही है
छोटकी जुनरी
वक्त सरकता
धीरे-धीरे
चलनी-चलनी
काले बालू से
दुःख के पल   
झर झर झरते
ज्यों चमक रहीहो
श्यामलिया की
धवल दंतुरिया।
ओ दिसम्बर !
जब से तुम आयेहो
इठलाती नई चुनरिया
फिर सजने को
चहक रही है।
………………………….
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पिता

चिड़ियाँ चहचहाती हैं 
फूल खिलते हैं 
सूरज निकलता है 
बच्चे जगते हैं 
बच्चों के खेल खिलौने होते हैं 
मुठ्ठी में दिन 
आँखों में 
कई सपने होते हैं 
पिता जब साथ होते हैं 

तितलियाँ 
उँगलियों में ठिठक जाती हैं 
मेढक 
हाथों में ठहर जाते हैं 
मछलियाँ
पैरों तले गुदगुदातीहैं
भौंरे 
कानों में
सरगोशी से गुनगुनातेहैं 
इस उम्र के 
अनोखे जोश होते हैं 
हाथ डैने
पैर खरगोश होते हैं 
पिता जब साथ होते हैं। 

पिता जब नहीं होते 
चिड़ियाँ चीखतीं हैं 
फूल चिढ़ाते हैं 
खेल खिलौने  
सपने 
धूप मेंझुलस जाते हैं 
बच्चे 
मुँह अंधेरे 
काम पर निकल जाते हैं 
सूरज पीठ-पीठ ढोते
शाम ढले 
थककर सो जाते हैं। 
पिता जब नहीं रहते 
जीवन के सब रंग 
तेजी से बदल जाते हैं 
तितलियाँ, मेढक, मछलियाँ, भौंरे 
सभी होते हैं 
इस मोड़ पर 
बचपने
कहींखो जाते हैं 
जिंदगी हाथ से
रेतकी तरह फिसल जाती है
पिताजब नहीं रहते 
उनकी बहुतयाद आती है।
पिता जब साथ होते हैं 

समझ में नहीं आते 
जब नहीं होते 
महान होते हैं। 


…………………..

वह आया, घर के भीतर, चुपके से…!

वह
चुपके से आया।
वैसे नहीं
जैसे बिल्ली आती है दबे पांव किचेन मे
पी कर चली जाती है
सारा दूध
वैसे भी नहीं
जैसे आता है मच्छर
दिन दहाड़े
दे जाता है डेंगू
न खटमल की तरह
गहरी नींद
धीरे-धीरे खून चूसते
न असलहे चमकाते
न दरवाजा पीटते
वह आया
बस
चुपके से।
न देखा किसी ने, न पहचाना
सिर्फ महसूस किया   
आ चुका है कोई
घर के भीतर
जो कर रहा है
घात पर घात।
तभी तो…

कलकिंत हो रहे हैं
सभी रिश्ते 

धरे रह जा रहे हैं
धार्मिक ग्रंथ 

धूल फांक रहे हैं
आलमारियों में सजे
उपदेश

खोखले हो रहे हैं
सदियों के 
संस्कार
नहीं
कोई तस्वीर नहीं है उसकी मेरे पास
नहीं दिखा सकता
उसका चेहरा
नहीं बता सकता
हुलिया भी
मैं
अक्षिसाक्षी नहीं
भुक्त भोगी हूँ
ह्रदयाघात से पीड़ित हूँ
यह भी नहीं बता सकता 
कब आया होगा वह
सिर्फ अनुमान लगा सकता हूँ 


तब आया होगा
जब हम
असावधान
सपरिवार बैठकर
हंसते हुए
देख रहे थे
टीवी।
हाँ, हाँ
मानता हूँ
इसमें टीवी का कोई दोष नहीं
था मेरे  पास
रिमोट कंट्रोल।
…………………..
अक्षिसाक्षी=चश्मदीद गवाह।

डंड़ौकी


उठल डंड़ौकी, चलल हौ बुढ़वा, दिल में बड़ा मलाल बा।

बड़कू  क  बेटवा  चिल्लायल, निन्हकू चच्चा भाग जा
गरजत  हौ  छोटकी  क  माई,  भयल सबेरा  जाग जा

घर से  निकसल,  घूमे-टहरे,  चिन्ता धरल  कपार बा
उठल डंड़ौकी, चलल हौ बुढ़वा, दिल में बड़ा मलाल बा।

घर  में  बिटिया  सयान  हौ,  बेटवा  बेरोजगार  हौ
सुरसा सरिस, बढ़ल  महंगाई, बेईमान सरकार हौ

काटत-काटत, कटल जिंदगी, कटत  न  ई जंजाल बा
उठल डंड़ौकी, चलल हौ बुढ़वा, दिल में बड़ा मलाल बा।

हमके लागला दहेज में, बिक जाई सब आपन खेत
जिनगी फिसलत हौ मुठ्ठी से, जैसे गंगा जी कs रेत

मन ही मन ई सोंच रहल हौ, आयल समय अकाल बा
उठल डंड़ौकी, चलल हौ बुढ़वा, दिल में बड़ा मलाल बा।

कल  कह  देहलन, बड़कू हमसे, का  देहला  तू हमका ?
खाली आपन सुख की खातिर, पइदा कइला तू हमका !

सुन  के  भी  ई  माहुर बतिया,  काहे  अटकल प्रान बा!
उठल डंड़ौकी, चलल हौ बुढ़वा, दिल में बड़ा मलाल बा।

ठक-ठक, ठक-ठक, हंसल डंड़ौकी, अब त छोड़ा माया जाल
राम ही साथी, पूत न नाती, रूक के सुन लs, काल कs ताल

सिखा  के  उड़ना,  देखा  चिरई,  तोड़त  माया जाल बा
उठल डंड़ौकी, चलल हौ बुढ़वा, दिल में बड़ा मलाल बा।

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कठिन शब्द..
डंड़ौकी = लकड़ी की छड़ी जिसे लेकर बुजुर्ग टहलने जाते हैं। बच्चों को नींद से जगाने के लिए सोटे के रूप में भी इसका इस्तेमाल कर लेते हैं।

माहुर बतिया = जहरीली बातें।

माँ गंगे

कार्तिक मास में
बनारस के गंगातट पर
देखा है जितनीबार
सुंदर
और भी सुंदर
दिखी हैं
माँ गंगे।
करवा चौथ के बादसे 
रोज ही
लगने लगते हैंमेले
तट पर
कभी नाग नथैया
कभी डाला छठ
कभी गंगामहोत्सव
तो कभी
देव दीपावली।
स्वच्छ होनेलगते हैं
बनारस के घाट
उमड़ता है जनसैलाब
घाटों पर
कहीं तुलसी,पीपल के तले
तो कहीं  
घाटों के ऊपर भी
जलते हैं
मिट्टी के दिये
बनकर
आकाश दीप।
अद्भुत होती है
घाटों की छटा
कार्तिकपूर्णिमा के दिन।
कहते हैं
मछली बनकर जन्मेथे कृष्ण,
त्रिपुरासुर कावध किया था महादेवजी ने,
जन्मे थे गुरूनानक,
कार्तिकपूर्णिमा के ही दिन
तभी तो
उतरते हैं देवभी
स्वर्ग से
बनारस के घाटोंपर
मनाते हैं दिवाली
जिसे कहते हैंसभी
देव दीपावली।
माँ की सुंदरतादेख 
कभी कभी
सहम सा जाता है
मेरा अपराधी मन
यह सोचकर
कि कहीं
कार्तिक मास में
वैसे ही सुंदरतो नहीं दिखती माँ गंगे !
जैसे किसीत्योहार में
मेरे घर आने पर
मुझे आनंद में देख
खुश हो जाती थीं
और मैं समझता था
कि बहुत सुखी है
मेरी माँ।
…………………………….


(चित्र गूगल से साभार)

उल्लू

शहर में
या गांव में
कहीं नहीं दिखे
उल्लू
बिन लक्ष्मी के
फीकी रहीदीपावली
इस बार की भी।
सोचा था
दिख जायेंगे
तो अनुरोधकरूँगा
ऐ भाई !
उतार दे न इसबार
लक्ष्मी को
मेरे द्वार !
शहरों में
बाजार दिखा
पैसा दिखा
कारें दिखीं
महंगे सामानो कोखरीदते / घर ले जाते लोग दिखे
रिक्शेवान दिखे
और दिखे
अपना दिन बेचनेको तैयार
चौराहे पर खड़े
असंख्य मजदूर।
गांवों में
जमीन दिखी
जमींदार दिखे
भूख दिखी
और दिखे 
मेहनती किसान
सर पर लादे
भारी बोझ
भागते बदहवास
बाजार की ओर ।
न जाने क्यों
दूर-दूर तक
कहीं नहीं दिखे
लेकिन हर बार
ऐसा लगा
कि मेरे आस पासही हैं
कई उल्लू !
जब से सुना हैकि
लोभी मनुष्य
तांत्रिकों केकहने पर
लक्ष्मी के लिए
काट लेते हैं
उल्लुओं की गरदन
मेरी नींद
उड़ी हुई है।
…………………………….

कैद हैं परिंदे

आज एक कविता और पोस्ट कर रहा हूँ। इस वादे के साथ कि अब कुछ दिन चैन से टिपटिपाउंगा। सुरिया जाता हूँ तो लिखने से खुद को रोक नहीं पाता। इसे पोस्ट करने की जल्दी इसलिए कि जब से  श्री अरविंद मिश्र जी की बेहतरीन पोस्ट मोनल से मुलाकात पढ़ी तभी से यह कविता बाहर आने के लिए छटपटा रही थी।  प्रस्तुत है कविता …

कैद हैं परिंदे


मीठी जितनी बोली
ज़ख्म उतने गहरे
कैद हैं परिंदे
जिनके पर सुनहरे
चाहते पकड़ना
किरणों की डोरउड़कर
सूरज की पालकीके
ये कहार ठहरे
झील से भी गहरी
हैं कफ़स कीनज़रें
तैरते हैं इनमें
आदमी के चेहरे
वे भी सिखा रहेहैं
गोपी कृष्ण कहना
जानते नहीं जो
प्रेम के ककहरे
आदमी से रहना
साथी जरा संभलके
ये जिनसे प्यारकरते
उनपे इनके पहरे।
……………………………..

( चित्र भी वहीं से उड़ा लिया )