उल्लू

शहर में
या गांव में
कहीं नहीं दिखे
उल्लू
बिन लक्ष्मी के
फीकी रहीदीपावली
इस बार की भी।
सोचा था
दिख जायेंगे
तो अनुरोधकरूँगा
ऐ भाई !
उतार दे न इसबार
लक्ष्मी को
मेरे द्वार !
शहरों में
बाजार दिखा
पैसा दिखा
कारें दिखीं
महंगे सामानो कोखरीदते / घर ले जाते लोग दिखे
रिक्शेवान दिखे
और दिखे
अपना दिन बेचनेको तैयार
चौराहे पर खड़े
असंख्य मजदूर।
गांवों में
जमीन दिखी
जमींदार दिखे
भूख दिखी
और दिखे 
मेहनती किसान
सर पर लादे
भारी बोझ
भागते बदहवास
बाजार की ओर ।
न जाने क्यों
दूर-दूर तक
कहीं नहीं दिखे
लेकिन हर बार
ऐसा लगा
कि मेरे आस पासही हैं
कई उल्लू !
जब से सुना हैकि
लोभी मनुष्य
तांत्रिकों केकहने पर
लक्ष्मी के लिए
काट लेते हैं
उल्लुओं की गरदन
मेरी नींद
उड़ी हुई है।
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