चालाक बिल्ली

चालाक बिल्ली ने
सबसे सीधे चूहेको दिन दहाड़े पकड़कर कुर्सी पर बिठाया
और बोली
म्याऊँ-म्याऊँ !
बिल्ली के हटतेही चूहे के दोस्तों ने पूछा…
बधाई हो बधाई
यार !
तुमने तो ऊँचीकुर्सी पाई !
मैडम क्या कहतीहैं
यह तो बताओ ?
चूहा बोला
मैडम कहती हैं
म्याऊँ-म्याऊँ
इसका मतलब
यहां बहुत सेचूहे हैं
तुम बैठक बुलाओ
मैं खाऊँ।
………………………….


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मध्यम वर्गीय चरित्र

पिछले सप्ताह वाराणसी में पुस्तक मेला लगा था। मैं उस दिन गया जब वहाँढेर सारे उल्लू जमा थे। मेरा मतलब उस दिन उलूक महोत्सव भी था। कार्तिक मास मेंबनारस में यह घटना भी होती है । दूर-दूर के बड़े-बड़े हास्य-व्यंग्य के कवि उल्लूकहलाने में गर्व महसूस करते हैं। धूम धाम से उलूक महोत्सव मनाया जाता है। मंच परवही कवि श्रेष्ठ माना जाता है जो अपने उल्लूपने से, शेष जमा हुए उल्लुओं को ठहाकालगाने पर मजबूर कर दे। मैने पुस्तकें भी खरीदी और कविताओं का आनंद भी लिया।कविताएँ उल्लुओं की जमात में बैठकर सुनते वक्त तो अच्छी लगी होंगी तभी मैं भी हंसरहा था लेकिन इतनी अच्छी भी नहीं थीं कि अब तक याद रहें और टेप कर के आपको सुनायींजायं। ऐसी कविताएं उल्लुओं की जमात में बैठकर सामूहिक रूप से सुनते वक्त ही अच्छीलगती हैं। आप हड़बड़ी में सरसरी तौर पर नज़र डालेंगे तो वाहियात लगेंगी सो मैने नतो टेप किया न उसे यहां लिखकर आपका कीमती वक्त जाया करना चाहता हूँ। यहाँ तो उसपुस्तक मेला से लाई हरिशंकर परसाई के एक व्यंग्य संग्रह प्रेमचंद्र के फटे जूते सेएक छोटी सी व्यंग्य कथा पढ़ाना चाहता हूँ जिसे पढ़कर मैं सोचता हूँ कि परसाई जी जोलिख कर चले गये उसके सामने हम आज भी कितने बौने हैं ! न पढ़ी हो तो पढ़ हीलीजिए परसाई जी की यह छोटी सी व्यंग्य कथा जिसका शीर्षक है…एक मध्यम वर्गीयकुत्ता।
मध्यम वर्गीय कुत्ता
मेरे मित्र की कार बँगले में घुसी तो उतरते हुए मैने पूछा, इनके यहाँ कुत्ता तो नहींहै?”

मित्र ने कहा, तुम कुत्ते से बहुत डरते हो!”

मैने कहा, आदमी की शक्ल में कुत्ते से नहीं डरता। उनसे निपट लेता हूँ। पर सच्चेकुत्तों से बहुत डरता हूँ।

कुत्तेवाले घर मुझे अच्छे नहीं लगते। वहाँ जाओ तो मेजबान के पहलेकुत्ता भौंककर स्वागत करता है। अपने स्नेही से नमस्ते हुई ही नहीं कि कुत्तेने गाली दे दी-क्यों आया बे ? तेरेबाप का घर है ? भाग यहाँ से !”

फिर कुत्ते के काटने का डर नहीं लगता-चार बार काट ले। डर लगता है उनचौदह बड़े-बड़े इंजेक्शनों का जो डाक्टर पेट में घुसेड़ता है। यूँ कुछ आदमी कुत्तेसे अधिक जहरीले होते हैं। एक परिचित को कुत्ते ने काट लिया था। मैने कहा, इन्हें कुछ नहीं होगा।हालचाल उस कुत्ते के देखो और इंजेक्शन उसे लगाओ।

एक नये परिचित ने मुझे घर पर चाय के लिए बुलाया। मैं उनके बंगले परपहुँचा तो फाटक पर एक तख्ती टँगी दिखी-कुत्ते से सावधान!’ मैं फौरन लौटगया। कुछ दिनो बाद वे मिले तो शिकायत की, आप उस दिन चायपीने नहीं आये!” मैने कहा, माफ करें। मैं बंगले तक गया था।वहाँ तख्ती लटकी थी-कुत्ते से सावधान। मेरा खयाल था, उस बंगले में आदमी रहते हैं। पर नेमप्लेट कुत्ते की टँगीदीखी।

यूँ कोई-कोई आदमी कुत्ते से बदतर होता है। मार्क ट्वेन ने लिखा है-यदि आप भूखे मरते कुत्तेको रोटी खिला दें, तो वह आपको नहीं काटेगा। कुत्ते में और आदमी में यही मूल अंतरहै।

बँगले मे हमारे स्नेही थे। हमें वहाँ तीन चार दिन ठहरना था। मेरेमित्र ने घंटी बजायी तो जाली के अंदर से वही भौं-भौं की आवाज आयी।  मैं दो कदम पीछे हट गया। हमारे मेजबान आये।कुत्तों को डाँटा-टाइगर, टाइगर ! उनका मतलब था-शेर, ये लोग कोई चोर डाकू नहीं हैं। तू इतना वफादार मत बन।

कुत्ता जंजीर से बंधा था। उसने देख भी लिया था कि हमें उसके मालिक खुदभीतर ले जा रहे हैं पर वह भौंके जा रहा था। मैं उससे काफी दूर से लगभग दौड़ता हुआभीतर गया।

मैं समझा, यह उच्चवर्गीय कुत्ता है। लगता ऐसा ही है। मैं उच्चवर्गीयका बड़ा अदब करता हूँ। चाहे वह कुत्ता ही क्यों न हो। उस बंगले में मेरी अजबस्थिति थी। मैं हीन भावना से ग्रस्त था-इसी अहाते में एक उच्चवर्गीय कुत्ता और इसीमें मैं ! वह मुझे हीकारत की नजर सेदेखता।

शाम को हम लोग लॉन में बैठे थे। नौकर कुत्ते को अहाते में घुमा रहाथा। मैने देखा, फाटक पर आकर दो सड़किया आवारा कुत्ते खड़े हो गये। वे आते और इसकुत्ते को बड़े गौर से देखते। फिर यहाँ-वहाँ घूमकर लौट आते और इस कुत्ते को देखतेरहते। पर यह बंगलेवाला उन पर भौंकता था। वे सहम जाते और यहाँ-वहाँ हो जाते। पर फिरआकर इस कुत्ते को देखने लगते।

मेजबान ने कहा, यह हमेशा का सिलसिला है। जब भी यह अपना कुत्ता बाहर जाता है, वे दोनोकुत्ते इसे देखते रहते हैं।

मैने कहा, पर इसे इन पर भौंकना नहीं चाहिए। यह पट्टे और जंजीरवाला है। सुविधाभोगीहै। वे कुत्ते भुखमरे और आवारा हैं। इसकी और उनकी बराबरी नहीं है। फिर यह क्योंचुनौती देता है!”

रात को हम बाहर ही सोये। जंजीर से बंधा कुत्ता भी पास ही अपने तखत परसो रहा था। अब हुआ यह कि आसपास जब भी वे कुत्ते भौंकते, यह कुत्ता भी भौंकता। आखिरयह उनके साथ क्यों भौंकता है ? यह तो उन पर भौंकता है। जब वे मुहल्ले में भौंकते हैं तो यह भी उनकी आवाजमें आवाज मिलाने लगता है, जैसे उन्हें आश्वासन देता हो कि मैं यहाँ हूँ, तुम्हारेसाथ हूँ।

मुझे इसके वर्ग पर शक होने लगा है। यह उच्चवर्गीय नहीं है। मेरे पड़ोसमें ही एक साहब के पास थे दो कुत्ते। उनका रोब ही निराला ! मैने उन्हें कभी भौंकतेनहीं सुना। आसपास कुत्ते भौंकते रहते, पर वे ध्यान नहीं देते थे। लोग निकलते, परवे झपटते नहीं थे। कभी मैने उनकी एक धीमी गुर्राहट ही सुनी होगी। वे बैठे रहते याघूमते रहते। फाटक खुला होता, तो भी बाहर नहीं निकलते थे। बड़े रोबीले, अहंकारी औरआत्मतुष्ट।

यह कुत्ता उन सर्वहारा कुत्तों पर भौंकता भी है और उनकी आवाज में आवाजभी मिलाता है। कहता है-मैं तुममें शामिल हूँ। उच्चवर्गीय झूठा रोब भी और संकट केआभास पर सर्वहारा के साथ भी-यह चरित्र है इस कुत्ते का। यह मध्यम वर्गीय चरित्रहै। यह मध्यम वर्गीय कुत्ता है। उच्चवर्गीय होने का ढोंग भी करता है और सर्वहाराके साथ मिलकर भौंकता भी है।

तीसरे दिन रात को हम लौटे तो देखा, कुत्ता त्रस्त पड़ा है। हमारी आहटपर वह भौंका नहीं. थोड़ा सा मरी आवाज में गुर्राया। आसपास वे आवारा कुत्ते भौंकरहे थे, पर यह उनके साथ भौंका नहीं। थोड़ा गुर्राया और फिर निढाल पड़ गया।

मैने मेजबान से कहा, आज तुम्हारा कुत्ता बहुत शान्त है।

मेजबान ने बताया, आज यह बुरी हालत में है। हुआ यह कि नौकर की गफलत के कारण यह फाटक के बाहरनिकल गया। वे दोनो कुत्ते तो घात में थे ही। दोनो ने इसे घेर लिया। इसे रगेदा।दोनो इस पर चढ़ बैठे। इसे काटा। हालत खराब हो गयी। नौकर इसे बचाकर लाया। तभी से यहसुस्त पड़ा है और घाव सहला रहा है। डॉक्टर श्रीवास्तव से कल इसे इंजेक्शनदिलाउँगा।

मैने कुत्ते की तरफ देखा। दीन भाव से पड़ा था। मैने अन्दाज लगाया। हुआयों होगा-

यह अकड़ से फाटक के बाहर निकला होगा। उन कुत्तों पर भौंका होगा। उनकुत्तों ने कहा होगा -‘अबे, अपना वर्ग नहीं पहचानता। ढोंग रचता है। यो पट्टा और जंजीर लगाये है।मुफ्त का खाता है। लॉन पर टहलता है। हमें ठसक दिखाता है। पर रात को जब किसी आसन्नसंकट पर हम भौंकते हैं, तो तू भी हमारे साथ हो जाता है। संकट में हमारे साथ है,मगर यों हम पर भौंकेगा। हममें से है तो निकल बाहर। छोड़ यह पट्टा और जंजीर। छोड़आराम। घूरे पर पड़ा अन्न खा या चुराकर रोटी खा। धूल में लोट।

यह फिर भौंका होगा। इस पर वे कुत्ते झपटे होंगे। यह कहकर – अच्छा ढोंगी, दगाबाज, अभीतेरे झूठे वर्ग का अंहकार नष्ट किये देते हैं।

इसे रगेदा, पटका, काटा और धूल खिलायी।

कुत्ता चुपचाप पड़ा अपने सही वर्ग के बारे में चिन्तन कर रहा है।

………………………………………………………………. 

पत्नी और पति

कल मैने एक कविता पोस्ट की थी…पापा। जिसको आप सब ने खूब पसंद किया। उसी मूड में, उसी दिन, मैने दो कविताएँ और लिखी थीं। जिन्हें आज पोस्ट कर रहा हूँ।


पत्नी


प्रेशर कूकर सी
सुबह-शाम आँच परचढ़ती
हवा का रूख देख
खाना पकाती है
दबाव बढ़ते ही
चीखने-चिल्लानेलगती है
पहली सीटी देतेही
दबाव कम कर देनाचाहिए
अधिक हीट होनेपर
ऊपर का सेफ्टीवाल्ब उड़ जाने
या फट जाने काखतरा बना रहता है
पिचक जाने पर
मरम्मत के बजाय
दूसरे की तलाशकरना
अधिक बुद्धिमानीहै।

……………………….
पति

एक शर्ट
जो गंदा होने पर
धुल जाता है
सिकुड़ जाने पर
प्रेस हो जाताहै
बाहर स्मार्ट बनाघूमता है
घर में
हैंगर के प्रश्नचिन्ह की तरह चेहरा लिए
सर पर सवार रहताहै
प्रश्न चिन्ह कोपकड़ कर टांग दो
चुपचाप टंगारहता है
दुर्लभ नहीं है
पैसा हो
तो फट जाने पर
दूसरा
बाजार में
आसानी से मिलजाता है।
………………………………..देवेन्द्र पाण्डेय।

स्कूल चलें हम

यह व्यंग्य तब लिखा गया था जब दूरदर्शन में एक विज्ञापन आता था…स्कूल चलें हम। लिखकर भूल चुका था। दिसम्बर 2009 में रचनाकार द्वारा एक व्यंग्य लेखन प्रतियोगिता का आयोजन किया गया तो मैने इसे यूँ ही भेज दिया। मेरी खूशी का ठिकाना न रहा जब इस व्यंग्य को प्रतियोगिता में दूसरा स्थान मिला। दो हजार रूपये का पुरस्कार भी प्राप्त हुआ। सोचा था कभी ब्लॉग में प्रकाशित करूंगा लेकिन भूलता चला गया। इधर शिक्षक दिवस के अवसर पर ब्लॉग में प्रकाशित करने के लिए सामग्री तलाश रहा था तो अचानक से इस व्यंग्य की याद आई। मजे की बात यह है कि इसे मैने जिस पन्ने पर लिखा था उसे भी फेक चुका था। रचनाकार में कब प्रकाशित हुआ था इसे भी भूल चुका था। बड़ी मशक्कत से ढूँढ निकाला तो कट पेस्ट नहीं कर पा रहा था। मुझे इस बात की खुशी है कि काफी मेहनत से सही इसे यहां प्रकाशित कर पाया। प्रस्तुत है व्यंग्य …


स्कूल चलें हम

चिड़ा, बार-बार चिड़िया की पीठ पर कूदता, बार-बार फिसल कर गिर जाता।

“चिड़-पिड़, चिड़-पिड़, चिड़-पिड़, चिड़-पिड़” ….चिड़ा चिड़चिड़ाया।

“चूँ चूँ- चूँ चूँ, चूँ चूँ-चूँ चूँ”……चिड़िया कुनमुनाई।

“क्या बात है ? आज तुम्हारा मन कहीं और गुम है ? किसी खेल में तुम्हारा मन नहीं लगरहा ?” चिड़े ने चिड़िया को डांट पिलाई।

“हाँ बात ही कुछ ऐसी है कि आज सुबह से मेरा मन परेशान है। देखो, मध्यान्ह होने को आया अभी तक मैने दाल का एक दाना भी मुंह में नहीं डाला‍‍”….. चिड़िया झल्लाई।

“बात क्या है ?”

बात यह है कि आज सुबह-सुबह मैं रेडियो स्टेशन के पीछे बने एक दो पाए के घर में भूल से घुस गई थी। अरे, वहीऽऽ जहाँ युकेलिप्टस के लम्बे-लम्बे वृक्ष हुआ करते थे, याद आया ?

हाँ-हाँ याद है। तो क्या हुआ?

वहीं मैने देखा कि कमरे के एक कोने में एक बड़ा सा डिब्बा रखा हुआ था उसमें तरह-तरह के चित्र आ जा रहे थे गाना बजाना चल रहा था।

“हाँ-हाँ, दो पाए उसे टी०वी० कहते हैं चिड़ा हंसने लगा। इत्ती सी बात पर तुम इतनी परेशान हो !”

“नहींऽऽ बात कुछ और है। तुम जिसे टी०वी० कह रही हो उसमें एक बुढ्ढा दो पाया धीरे-धीरे चलकर आया, सब उसे देखकर खड़े हो गये और फिर वह सबसे हमारी बात कहने लगा।”



क्या ?


कह रहा था- बच्चे तैयार हैं। सुबह हो चुकी है। चिड़ियाँ अपने घोंसलों से निकल चुकी हैं। हम भी तैयार हैं। स्कूल चलें हम। इसका मतलब मेरी समझ में नहीं आया। यह स्कूल क्या होता है ? जैसे हम घोंसलों से निकलते हैं वैसे ही ये दो पायों के बच्चे घरों से निकलकर स्कूल जाने को तैयार हैं। हम तो कभीस्कूल नहीं गये। क्या तुम गये हो ?

चिड़-पिड़, चिड़-पिड़, चिड़-पिड़, चिड़-पिड़….चिड़ा खिलखिलाने लगा। तुम भी न, महामूर्ख हो। वे इन दो पायों के राजा हैं।



जैसे गिद्धराज !—- चिड़िया ने फटी आँखों से पूछा ?

हाँ। फिर समझाने लगा – ये दो पाये जीवन भर अपने बच्चों को अपनी छाती से लगाए रखते हैं। उन्हें खिलाते-पिलाते ही नहीं बल्कि अपने ही रंग में ढाल देतेहैं। इन्होंने अपने-अपने धर्म बना रखे हैं। प्रत्येक धर्म को मानने वाले भी कई भागों में बंटे हुए हैं। बाहर से देखने मे सब एक जैसे दिखते हैं मगर भीतर से अलग-अलग विचारों के होते हैं। जैसे हमारे यहाँ बाज और कबूतर को देखकर तुरंत पहचाना जा सकता है मगर इनको देखकर नहीं पहचाना जा सकता कि कौन हिंसक है कौन साधू।—चिड़े ने अपना ज्ञान बघारा।

हाँ हाँ, मैने बगुले को देखा है। एकदम शांत भाव से तालाब के किनारे बैठा रहता है और फिर अचानक गडुपसे एक मछली चोंच में दबा लेता है। वैसा ही क्या ! चिड़िया ने कुछ-कुछ समझते हुए कहा।

हाँ-हाँ, ठीक वैसा ही। तो ये लोग अपने बच्चों को स्कूल भेजते हैं-ताकि वहाँ जाकर एक दूसरे को जानने-पहचानने की कला सीख सकें, ताकि कोई उन्हें बाज की तरह झपट्टा मारकर खा न जाय।

अच्छा तो यह बात है। चलो हम भी स्कूल चलकर देखते हैं कि वहाँ क्या होता है।

ठीक है चलो। आखिर अपने देश के राजा की इच्छा का सम्मान करना हम चिड़िया प्रजाति का भी तो कुछ धर्म बनता है।

(चिड़पिड़ाते-चहचहाते दोनो एक सरकारी प्राइमरी पाठशाला में जाकर एक वृक्ष की डाल पर बैठ जाते हैं।)

अरे, यह क्या ! यहाँ तो बहुत कम बच्चेहैं –चिड़ा बोला।

जो हैं वे भी कैसे खेल रहे हैं !—-चिड़िया बोली।

लगता है यहाँ एक भी मास्टर नहीं है। अरे, वह देखो, वहाँ एक कुर्सी पर बैठकर कौन अखबार पढ़ रहा है ?

वे यहाँ के हेडमास्टर साहब लगते हैं।

तुम्हें कैसे मालूम ?

मैं जानता हूँ। जो हेड होते हैंवे मास्टर नहीं होते। मास्टर होते तो पढ़ाते नहीं ?

शायद तुम ठीक कहते हो। चलो हम कमरे में घुसकर देखते हैं -चिड़िया बोली।

चलो।

अरे, यहाँ तो ढेर सारे कबूतर हैं ! देखो-देखो प्रत्येक बेंच पर इन कबूतरों ने कितना बीट कर छोड़ा है ! पूरा कमरा गंदगी से भरा पड़ा है। दीवारों के प्लास्टर भी उखड़ चुके हैं।

हाँ हाँ, क्यों न यहीं घोंसला बना लें ?

हाँ, प्रस्ताव तो अच्छा है। स्कूल से अच्छा स्थान कौन हो सकता है एक पंछी को घोंसला बनाने के लिए ! तभी तो सीधे-सादे कबूतर यहाँ आकर रहते हैं।

चलो दूसरे कमरों में भी घूम लें।

अरे, यह कमरा तो और भी अच्छा है ! इसमें तो एक दीवार ही नहीं है !!

(तब तक बच्चों का झुण्ड चीखते-चिल्लाते, कूदते-फांदते, धूल उड़ाते कमरे में प्रवेश कर जाता है। मास्साब आ गए….. मास्साब आ गए…..।)

डर के मारे दोनों पंछी टूटे दीवार से उड़कर भाग जाते हैं और पुनः उसी स्थान पर जा कर बैठ जाते हैं जहाँ पहले बैठे थे। थोड़े समय बाद क्या देखते हैं कि मास्टर साहब कमरे से बाहर निकल रहे हैं। बाहर निकल कर एक लोटा पानी पीते हैं और बेंच पर बैठकर अपने एक हाथ के अंगूठे से दूसरे हाथ की हथेली को देर तक रगड़ते हैं। जोर-जोर से ताली पीटते हैं फिर रगड़ते हैं फिर ताली पीटते हैं। कुछ देर पश्चात अपने निचले ओंठ को खींचकर चोंच बनाते हैं कुछ रखते हैं और दोनो पैर फैलाकर सो जाते हैं। कमरे के भीतर से दो पायों के बच्चों के जोर-जोर से चीखने की आवाज आती रहती है।

बिचारे बच्चे ! चिड़िया को दया आ गई। इस आदमी ने बच्चों को जबरदस्ती कमरे में बिठा रखा है। देखो न, बच्चे कितने चीख-चिल्ला रहे हैं। क्या इसी को पढ़ाई कहते हैं ? क्या इन दो पायों के राजा को मालूम है कि स्कूल में क्या होता है ? क्या इसलिए सुबह-सबेरे सबसे कहता है कि हम भी तैयार हैं स्कूल चलें हम ! इनका राजा कहाँ है ? वह तो कहीं दिखाई नहीं देता !– बहुत देर बाद चिड़िया ने मौन तोड़ा।

राजा, राजा होता है। ताकतवर और ज्ञानी होता है। उसको स्कूल जाने की क्या जरूरत ? –चिड़ा बोला।

छिः। स्कूल तो बहुत गंदी जगंह होती है। यहाँ तो सिर्फ यातना दी जाती है।

नहीं-नहीं, ऐसी बात नहीं है। चिड़े ने समझाया-“यह गरीबों का स्कूल है। यहाँ मुफ्त शिक्षा दी जाती है। जो चीज मुफ्त में मिलती है वह अच्छी नहीं होती। टी०वी० में ऐसी बातें करके राजा जनता की सहानुभूति बटोरना चाहता है।”

अच्छा ! तो और भी स्कूल है ? यह गरीबों का स्कूल है तो अमीरों का स्कूल कैसा होता है ?—-चिड़िया ने पूछा।

चलो चलकर देखते हैं। चलो।

(दोनों पंछी उड़कर एक अंग्रेजी पब्लिक स्कूल में पहुंच जाते हैं जहाँ की दीवारें रंगी-पुती हैं, बड़ा सा मैदान है, सुंदर सी फुलवारी है और बड़े से लोहे के गेट के बाहर मूछों वाला चौकिदार बंदूक लिए पहरा दे रहा है।)

यह तो बहुत सुंदर जगह है !

मगर तुमने देखा ? उस दो पाये के हाथ में बंदूक है। वह हमें मार भी सकता है ! — चिड़िया एक आम्र वृक्ष की पत्तियों में खुद को छुपाते हुए डरते-डरते बोली।

नहीं-नहींss । डरने की कोई जरूरत नहीं है। यह चौकिदार है। दो पायों को हमसे नहीं अपने ही लोगों से ज्यादा खतरा है ! यह अमीरोंका स्कूल है। उनके बच्चे गरीबों की तरह सस्ते नहीं होते। यह उन्हीं की सुरक्षा केलिए है।

अच्छा ! मगर यहाँ तो एक बच्चा भी खेलते हुए नहीं दिखता। बच्चे कहाँ हैं ?

अभी तो तुमने स्कूल की बाहरी दीवार ही पार की है। बच्चों को देखने के लिए कमरों में घुसना होगा जहाँ एक दूसरा चौकिदार बैठा है।

चलो यहाँ से भाग चलें। यह जगह तो बड़ी भयानक है।

नहीं, जब आए हैं तो पूरा स्कूल देखकर ही चलेंगे, डरो मत।

चलो, उस दीवार के ऊपर की तरफ जो गोल सुराख दिखलाई पड़ रही है, वहीं से प्रवेश कर जाते हैं।

मुझे तो बड़ा डर लग रहा है–चिड़िया हिचकिचाई।

डरो मत। मेरे पीछे-पीछे आओ। इतना कहकर चिड़ा फुर्र से उड़कर रोशनदान में प्रवेश करता है। चिड़िया भी पीछे-पीछे रोशनदान में घुस जाती है। वहाँ से दोनो कमरों में देखने लगते हैं। नीचे कक्षा चल रही है मैडम पढ़ा रहीं हैं।

वाह ! क्या दृश्य है। देखो, सभी बच्चे एक जैसे साफ-सुथरे कपड़े पहने सुंदर-सुंदर कुर्सियों पर बैठे हैं।

इनके टेबल भी कितने सुंदर हैं !

दीवारें कितनी सुंदर हैं। जमीन कितनी साफ है।

वह देखो, हवा वाली मशीन ! यह अपने आप घूम रही है !!

वह देखो, रोशनी वाली डंडियाँ ! कितना प्रकाश है !!

अरे, वह देखो, वह मादा दोपाया एक कुर्सी में बैठकर जाने किस भाषा में बोल रही है ! उसके पीछे की दीवार में काले रंग की लम्बी चौड़ी पट्टी लगी है। लगता है यह मास्टरनी है !!

हाँ, कितनी सुंदर है !

(दोनों की चिड़-पिड़-चूँ-चूँ से बच्चों का ध्यान बटता है। बच्चे रोशनदान की ओर ऊपर देखने लगते हैं। शोर मचाने लगतेहैं।)

व्हाट ए नाइस बर्ड !

हाऊ स्वीट !

मैडम, चौकिदार को आवाज देती है और चौकिदार बंदूक लेकर आता है। बच्चों के शोर, मैडम की चीख, और चौकिदार की बंदूक देखकर दोनो पंछी मारे डर के भाग जाते हैं। कुछ देर तक हवा में उड़ते रहते हैं और एक तालाब के पास जाकर दम लेते हैं। चीड़िया ढेर सारा पानी पीती है देर तक हाँफती है और हाँफते-हाँफते चिड़े से कहती है—-

“जान बची लाखों पाए। अब हमें कभी स्कूल नहीं जाना। ये दो पाये तो दो रंगे होते हैं ! जैसे इनको देखकर समझना मुश्किल है कि कौन बाज है कौन कबूतर वैसे ही इनके स्कलों को देख कर समझना मुश्किल है कि कौन अच्छा है और कौन बुरा ! वह मास्टरनी क्या गिट-पिट गिट-पिट कर रही थी ?”

चिड़ा चिड़िया की बदहवासी देखकर देर तक खिलखिलाता रहा फिर बोला, “मेरी चिड़िया, ये दो पाये दो रंगे नहीं, रंग-बिरंगे होते हैं। जैसे इनके घर जैसे इनके कपड़े, जैसा इनका जीवन स्तर वैसे ही इनके स्कूल। जिसे तुम गिट-पिट गिट-पिटकह रही हो, वह श्वेत पंछियों की भाषा है। तुमने देखा होगा कि जब जाड़ा बहुत बढ़ जाता है तो वे पंछी उड़कर यहाँ आ जाते हैं। बहुत दिनों तक यह देश भी उनके देश का गुलाम था। इन लोगों ने उनको भगा दिया मगर उनकी गुलामी करते-करते यहाँ के लोगों ने उनकी भाषा में बात करना उसी भाषा में अपने बच्चों को पढ़ाना अपनी शान समझने लगे। इन दो पायों में जो पैसे वाले होते हैं यावे जो पैसे वाले दिखना बनना चाहते हैं, अपने बच्चों को अंग्रेजी स्कूलोंमें पढ़ाते हैं। यहाँ की शिक्षा बहुत मंहगी है। ये पैसे वाले हैं इसलिए इनके स्कूलभी अच्छे बने होते हैं। गावों में गरीब लोग रहते हैं, शहरों में अक्सर अमीर लोग रहतेहैं। हम भी गावों रहते हैं इसलिए गांव की भाषा ही जानते हैं। जैसे हम पंछियों की कई भाषाएँ होती हैं, वैसे ही इन दो पायों की भी कई भाषाएँ होती हैं।ये मात्र देखने में एक जैसे लगते हैं, भाषा के मामले में भी रंग-बिरंगे होते हैं। मेरी प्यारी चिड़िया अब मैं तुमको कितना समझाऊँ ? तुम तो एक ही दिन में दो पायों को पूरा समझ लेना चाहती हो जबकि गिद्धराज कहते हैं कि ये दो पाये बड़े अद्भुत प्राणी हैं। भगवान भी इन्हें पैदा करने के बाद इन्हें समझना नहीं चाहता !

“शायद तुम ठीक कहतेहो”–चिड़िया बोली, “हमें इनके धोखे में नहीं फंसना चाहिए। देखो शाम हो चुकी है, बच्चे स्कूलों से घरों की ओर लौट रहे हैं, हम भी तैयार हैं, घर चलें हम।

चिड़ा चिड़िया की बोली सुनकर भय खाता है कि एक दिन में ही इसकी बोली बदल गई। हड़बड़ा कर इतना ही कहता है “चलो चलें, घर चलें हम।”

चिड़-पिड़, चूँ-चूँ ..चिड़-पिड़, चूँ-चूँ ….करते, चहचहाते, दोनों पंछी अपने घोंसले में दुबक जाते हैं और देखते ही देखते शर्म से लाल हुआ सूरज अंधेरे के आगोश में गुम हो जाता है।

जाम झाम और बनारस की एक शाम ।

दफ्तर से घर जा रहा था। सावन की टिप-टिप और व्यस्त सड़क दोनो का मजा ले रहा था। सड़क जाम तो नहीं थी मगर सड़क पर हमेशा की तरह झाम अधिक था । सभी सवारी गाड़ियाँ एक समान रफ्तार से एक के पीछे एक चल रही थीं। बगली काट कर आगे निकलने की होड़ में दो दो रिक्शे अगल बगल आपस में सटकर चल रहे थे। सवारी गाड़ियाँ आगे निकलने की फिराक में चपाचपा रही थीं । न जाने वाले समझते थे कि आने वाले को आने देना चाहिए न आने वाले समझ रहे थे कि ये नहीं जायेंगे तो हम कैसे जा पायेंगे। एक साइकिल वाला जब मेरी बाइक को ओवरटेक कर आगे बढ़ा तो मुझे होश आया कि मैं भी सड़कर पर बाइक चला रहा हूँ। मेरे बाइक के अहम को गहरा धक्का लगा । मैंने भी एक्सलेटर तेज कर दिया। बनारस की सड़कों में सभी सवारियाँ सम भाव से चलती हैं। कोई किसी के भी पीछे चल सकता है, कोई किसी के भी आगे निकल सकता है। सभी प्रकार की वाहन पाये जाते हैं। साइकिल, बाइक, टैंपो, रिक्शा, इक्का, टांगा, कार, बस, ट्रक, ट्रैक्टर और बैलगाड़ी भी। सभी एक साथ चलते हैं। कुछ सड़कें तो ऐसी होती हैं जहाँ आप चलती बस से उतर कर, सब्जी खरीद कर, फिर वापस उसी में चढ़कर जा सकते हैं। सांड़, भैंस, गैये, आवारा कुत्ते और सड़क पर चलने वाले पद यात्रियों के लिए कोई पद मार्ग मेरा मतलब फुट पाथ नहीं बना है। कहीं है भी तो आसपास के दुकानदारों ने अतिक्रमण करके उसे अपना बना लिया है। बाइक के अहम को चोट लगते देख मैं जैसे ही ताव खा कर आगे बढ़ा तो सहसा ठहर सा गया । सामने एक बस खड़ी थी। जिसके पीछे नीचे की ओर लिखा था…कृपया उचित दूर बनाये रखिए। बाद में ऊपर देखा तो लिखा पाया….पुलिस ! मैने दोनो को मिलाकर पढ़ा…कृपया पुलिस से उचित दूरी बनाये रखिए। वह पुलिस की बस थी और अंदर ढेर सारे एक साथ बैठे थे । सहसा एहसास हुआ कि पुलिस लिखावट में कितनी विनम्रता बरतती है ! ट्रक वालों की तरह असभ्य होती तो लिख देती…सटला त गइला बेटा। वैसे मैने विनम्रता पूर्वक लिखे संदेश को भी गंभीरता से ही लिया। यह मेरे मन का आतंक हो सकता है। मुझे किसी ने बरगलाया हो सकता है। यह हो सकता है कि मैने समाचार पत्र पढ़-पढ़ कर या टी0वी0 की सनसनी देख देख कर पुलिस के बारे में नकारात्मक ग्रंथी पाल ली हो। वास्तविक अनुभव तो कभी बुरा नहीं रहा। पुलिस हमेशा मेरे साथ वैसे ही मिली जैसे एक सभ्य आदमी दूसरे सभ्य आदमी से मिलता है। वे खुद ही गलत होंगे जो पुलिस को गलत कहते हैं। गलत व्यक्ति से पुलिस अच्छा व्यवहार कैसे कर सकती है ! आप कह सकते हैं कि तुम मूर्ख हो तुम्हें मालूम नहीं कि कभी उसी बनारस में एक साधारण से सिपाही ने एक बड़े नेता को पीटा था। हो सकता है आप सही ही कह रहे हों मगर इससे यह तो सिद्ध नहीं होता कि हर बड़ा नेता अच्छा आदमी ही होता है। बड़ा नेता बनना और अच्छा आदमी बनना अलग भी हो सकता है। पुलिस की तुलना खुद अपने द्वारा चुने गये नेता जी से करिए तब आपको भी एहसास हो जायेगा कि पुलिस कितनी अच्छी है! नेता अच्छे लगे तो समझिये आप खुशकिस्मत हैं। मैं बस के पीछे-पीछे चल रहा था। बस को ओवरटेक कर सकता था पर पुलिस को ओवरटेक करने की हिम्मत नहीं जुटा पाया। कृपया उचित दूरी बनाये रखिये की चेतावनी सर पर हथोड़े की तरह बज रही थी। दरवाजे से एक पुलिस वाले ने अपना सर निकाला ही था कि बायें से तेजी से ओवर टेक करता एक युवा बाइक सवार उससे भिड़ते-भिड़ते बचा। किसी को कुछ नहीं हुआ मगर मैने पुलिस वाले को डंडा लहराते और मुंह चलाते जरूर देखा। क्या कहा सुन नहीं पाया। जरूरी नहीं कि गाली ही दे रहा हो। कानून भी समझा सकता है। सड़क पर कानून पुलिस से बढ़िया कोई नहीं समझा सकता। वकील भी नहीं।

गिरजा घर चौराहे के आगे गोदौलिया चौराहा है। बनारस का व्यस्ततम चौराहा। यहां जाम लगना बनारस वालों के लिए आम बात है। ट्रैफिक पुलिस डंडा भाज रही थी। उन्हें देख सुबह-सुबह घर से निकलते वक्त वास्तव जी के घर आई भांड़ मंडली जेहन में सहसा कौंध गई। वास्तव जी दुहाई दे रहे थे और वे जोर जोर से हाथ हिला कर भद्दे इशारे कर रहे थे। वास्तव जी को दूसरा पोता हुआ था । एक तो सभी को हो सकते हैं। वे दोहरी खुशी मना रहे थे। भांड़ सांड़ न हों तो रस नहीं बनता । बनारस बनारस नहीं लगता। अचानक बारिश तेज हो गई। एक रिक्शे पर एक अंग्रेज ( सभी गोरी चमड़ी वाले को हमारे जैसे आम बनारसी अंग्रेज ही समझते हैं फिर चाहे वह अमेरिकन ही क्यों न हो !) अपनी अंग्रेजन से बातें कर रहा था। अभी कुछ देर पहले उसने दुकान के भीतर बैठे गाय की तश्वीर उछल-उछल कर खींची थी। शायद उसी के बारे में दोनो आश्चर्य चकित हो बातें कर रहे थे। बीच सड़क पर बैठा एक विशालकाय सांड़ अचानक से खड़ा हो गया। कुछ तो तेज बारिश कुछ सांड़ का भय कि भीड़ अपने आप इधर उधर छितरा गई। मैने देखा कि अंग्रेज दंपत्ति रिक्शे से उतर कर गली में घुस रहे थे और गली के कुत्ते जोर जोर से उनको भौंक रहे थे। अंग्रेज बहादुर था इसमें कोई संदेह नहीं। यह मैं इस आधार पर कह सकता हूँ कि कुत्तों के भौंकने के बाद भी वह उनकी और हमारी तश्वीर खींचना नहीं छोड़ रहा था। आगे जा कर वह घाट पर बैठे भिखारियों की तश्वीर भी खींचेगा यह मैं जानता था। बारिश और तेज हो चुकी थी। रास्ता पूरी तरह साफ हो चुका था। मुझे भींगने के भय से अधिक घर पहुंचने की जल्दी थी। बारिश में रुक कर समय बर्बाद करना मुझे अच्छा नहीं लगता। शाम के समय घर लौटते वक्त सावन में बाइक चलाते हुए भींगने का अवसर कभी-कभी मिलता है। इसे मैं हाथ से जाने नहीं देता। भींगने के बाद घर पर पत्नी की सहानुभूति और गर्म चाय दोनो एक साथ मिल जाती है। घर आकर चाय पीते वक्त रास्ते के सफर के बारे में सोचते हुए एक बात का मलाल था कि हम जैसे हैं, हैं । अपना जीवन अपनी तरह से जी रहे हैं मगर वो अंग्रेज हमारी तश्वीर खींच कर ले गया । न जाने हमारे बारे में क्या-क्या उल्टा-पुल्टा लिखेगा ! जबकि दुनियाँ जानती है कि हम कितने सभ्य, सुशील, अनुशासन प्रिय और विद्वान हैं!

गिरगिट कहीं की….!

नदी
अब वैसी नहीं रही
जैसी बन गई थी तब
जब आई थी बाढ़

वैसी भी नहीं रही
जैसी हो गई थी तब
जब हुआ था
देश का विभाजन

वैसी भी नहीं
जब पड़ोसी देश से
एक मुठ्ठी भात के लिए
आए थे शरणार्थी

वैसी भी नहीं
जब लगा था आपातकाल
या चला था
ब्लू स्टार ऑपरेशन

और वैसी भी नहीं
जब हुआ था
सन 84 का कत्लेआम
या फिर
अयोध्या में
निर्माण के नाम पर विध्वंस

अब तो
पुल बनकर जमे हैं
नदी के हर घाट पर
इसके ही द्वार बहा कर लाये गये
बरगदी वृक्ष !

जिसके हाथ पैर की उँगलियों में फंसकर
सड़ रहे हैं
न जाने कितने
मासूम

भौंक रहे हैं
पास पड़ोस के कुत्ते
फैली है सड़ांध
रुक सी गई है
नदी की सांस

मगर भाग्यशाली है नदी
आ रहे हैं
आमरण अनशन का संकल्प ले
कुछ गांधीवादी

धीरे-धीरे
काटकर जड़ें
मुक्त कर देंगे नदी को
बह जायेंगे शव
लुप्त हो जायेंगे पापी
वैसे ही
जैसे लुप्त हो गये
गिद्ध

गहरी सांस लेकर
अपनी संपूर्ण निर्मलता लिए
बहने लगेगी नदी

मगर क्या
नहीं बन जायेगी वैसी ही
जैसी बन गई थी तब
जब आई थी बाढ़ ?
……….
गिरगिट कहीं की….!

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गंगा रोड…!

गंगा दशहरा पर विशेष……..

जून, 2111 की शाम । वाराणसी के गंगा रोड के किनारे बीयर बार की दुकान पर बैठे पाँच युवा मित्र। एक-एक बोतल पी लेने के बाद आपस में चहकते हुए………

तुमको पता है ? ये जो सामने 40 फुट चौड़ी गंगा रोड है न ! वहां आज से 100 साल पहले तक गंगा नदी बहती थी !

हाँ, हाँ पता है। आज भी बहती है। सड़क के नीचे नाले के रूप में।

सच्ची ! आज भी बहती है ? पहले नदी बहती थी तो उस समय पानी बीयर से सस्ता मिलता होगा !

बीयर से सस्ता ! अरे यार, बिलकुल मुफ्त मिलता था। चाहे जितना नहाओ, चाहे जितना निचोड़ो। और तो और मेरे बाबा कहते थे कि उस जमाने में यहाँ, जहाँ हम लोग बैठ कर बीयर पी रहे हैं, गंगा आरती हुआ करती थी।

ठीक कह रहे हो। मेरे बाबा कहते हैं कि यहां से वहाँ तक इस किनारे जो बड़े-बड़े होटल बने हैं न, लम्बे-चौड़े घाट हुआ करते थे और नदी में जाने के लिए घाट किनारे पक्की सीढ़ियाँ बनी थीं।

तब तो नावें भी चलती होगी नदी में ? गंगा रोड के उस किनारे जो लम्बा ब्रिज है वो दूसरा किनारा रहा होगा क्यों ?

और नहीं तो क्या दूर-दूर तक रेतीला मैदान हुआ करता था, जहाँ लोग नैया लेकर निपटने जाते थे और लौटते वक्त नाव में बैठ कर भांग बूटी छानते थे।

भांग-बूटी ? बीयर नहीं पीते थे !

चुप स्साले ! तब लोग गंगा नदी को माँ की तरह पूजते थे। नैया में बैठकर कोई बीयर पी सकता था भला ?

उहं ! बड़े आए माँ की तरह मानने वाले। क्या तुम यह कहना चाहते हो कि माँ मर गई और हमारे पूर्वज देखते रह गये ? कुछ नहीं किया ?

हमने इतिहास की किताब में पढ़ा है। राजा भगीरथ गंगा को धरती पर लाये थे।

यह नहीं पढ़ा कि हमारे दादाओं, परदादाओं ने पहले नदी में इतना मल-मूत्र बहाया कि वो गंदी नाली बन गई और बाद में गंदगी छुपाने के लिए लोक हित में उस पर चौड़ी सड़क बना दी !

बड़े शातिर अपराधी थे हमारे पुर्वज। माँ को मार कर अच्छे से दफन कर दिये।

अरे यार ! गंदी नाली को रखकर भी क्या करते ? अब तो ठीक है न। नाली नीचे, ऊपर सड़क। विज्ञान का चमत्कार है।

विज्ञान का चमत्कार ! इतना ही चमत्कारी है विज्ञान तो क्यों नहीं गंगा की तरह एक नदी निकाल देता ? बात करते हो ! पानी का बिल तुम्हीं देना मेरे पास पैसा नहीं है । बाबूजी से मुश्किल से दो हजार मांग कर लाया थो वो भी खतम हो गया। सौ रूपया गिलास पानी, वो भी खारा !

जानते हो ! मैने पढ़ा है कि सौ, दो सौ साल पहले गंगा नदी का पानी अमृत हुआ करता था। जो इसमें नहाता था उसको कोई रोग नहीं होता था। तब लोग नदी के पानी को गंगाजल कहते थे। पंडित जी, गंगा स्नान के बाद कमंडल या तांबे-पीतल के गगरे में भरकर ठाकुर जी को नहलाने के लिए या पूजा-आचमन के लिए ले जाते थे। सुना है दूर-दूर से तीर्थ यात्री आते और गंगाजल को बड़ी श्रद्धा से प्लास्टिक के बोतल में रख कर ले जाते।

हा…हा…हा…दूर के यात्री ! प्लास्टिक के बोतल में गंगाजल घर ले जाते थे ! घर ले जाकर सड़ा पानी पीते और मर जाते थे । क्या बकवास ढील रहे हो ! एक बोतल बीयर ही फुल चढ़ गई क्या ?

पागल हो ! जब कुछ पता न हो तो दूसरे की बात को ध्यान से सुननी चाहिए। तुम्हे जानकर आश्चर्य होगा कि गंगाजल कभी सड़ता ही नहीं था। उसमें कभी कीड़े नहीं पड़ते थे।

क्या बात करते हो ! गंगाजल में कभी कीड़े नहीं पड़ते थे ? इसी पानी को घर ले जाओ तो फ्रेशर से फ्रेश किये बिना दूसरे दिन पीने लायक नहीं रहता और तुम कह रहे हो कि गंगाजल में कभी कीड़ा नहीं पड़ता था !

हाँ मैं ठीक कह रहा हूँ। गंगा में पहाड़ों से निकलने वाली जड़ी-बूटियाँ इतनी प्रचुर मात्रा में घुल जाती थीं कि उसका पानी कभी सड़ता ही नहीं था। माँ के जाने के बाद यह धरती अनाथ हो गई है।

इससे भी दुःख की बात तो यह है कि हम अपन संस्कृति को इतनी जल्दी भूल चुके हैं !

ठीक कह रहे हो। हमारी सरकारों ने भी संस्कृति को मिटाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी। तुम्हें पता है एक समय था जब वाराणसी में तीन-तीन नदियाँ बहती थीं। वरूणा, अस्सी और गंगा।

हाँ मैने सुना है। बनारस का नाम वाराणसी इसीलिए पड़ा कि यह वरूणा और अस्सी नदी के बीच बसा था। दायें बायें अस्सी-वरूणा और सामने गंगा नदी।

कल्पना करो…. तब यह कितना रमणीक स्थल रहा होगा !

पहले अस्सी नदी के ऊपर लोगों ने अपने घर बनाये फिर वरूणा नदी को पाट कर लिंक रोड निकाल दिया। गंगा नदी तो तुम्हारे सामने है ही….गंगा रोड।

इस सड़क का नाम क्यों गंगा रोड रख दिया ?

हा हा हा…हमारी सरकार चाहती है कि है जब लोग यहाँ बैठें तो बीयर पी कर थोड़ी देर इस नाम पर सोंचे और अपनी संस्कृति के विषय में आपस में चर्चा करें।

हाँ। सरकारें, संस्कृति की रक्षा ऐसे ही किया करती हैं।

……………………….

(चित्र गूगल से साभार)